उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं, लेकिन हाल के कुछ मामलों ने “मेडिकल नेग्लिजेंस” यानी चिकित्सकीय लापरवाही की गंभीरता को नए सिरे से उजागर कर दिया है.
वाराणसी की बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (BHU) के ट्रॉमा सेंटर में हुई एक घटना और बांदा के सरकारी मेडिकल कॉलेज का मामला इस बात का संकेत हैं कि समस्या केवल संसाधनों की कमी तक सीमित नहीं है, बल्कि सिस्टम की खामियां, जवाबदेही का अभाव और प्रोटोकॉल के उल्लंघन भी इसके पीछे बड़ी वजह हैं.
एक नाम, दो मरीज और मौत तक पहुंची चूक
BHU के ट्रॉमा सेंटर में जो हुआ, वह किसी भी मरीज और उसके परिवार के लिए डरावना सपना हो सकता है. यहां राधिका नाम की दो महिलाओं की अदला-बदली के कारण 71 वर्षीय राधिका देवी का गलत ऑपरेशन कर दिया गया. राधिका देवी को स्पाइनल कॉर्ड ट्यूमर की समस्या थी. उन्हें फरवरी के अंत में ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया था और 7 मार्च को उनकी न्यूरोसर्जरी तय थी. लेकिन ऑपरेशन के दिन उन्हें गलती से ऑर्थोपेडिक ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया. वहां डॉक्टरों की टीम ने बिना मरीज की पहचान की अंतिम पुष्टि किए उनके कूल्हे (हिप) का ऑपरेशन शुरू कर दिया.
ऑपरेशन के दौरान जब डॉक्टरों को अपेक्षित फ्रैक्चर या समस्या नहीं मिली, तब उन्हें शक हुआ कि कहीं कुछ गड़बड़ है. तब जाकर पता चला कि गलत मरीज को ऑपरेशन टेबल पर लिटा दिया गया है. इसके बाद हड़बड़ी में सर्जरी रोक दी गई, घाव को बंद किया गया और महिला को वापस वार्ड भेज दिया गया.
सबसे गंभीर बात यह रही कि इस पूरी घटना की जानकारी तत्काल परिजनों को नहीं दी गई. बाद में 18 मार्च को उनकी सही सर्जरी की गई, लेकिन तब तक स्थिति बिगड़ चुकी थी. ऑपरेशन के बाद उन्हें जटिलताएं होने लगीं और 28 मार्च को उनकी मौत हो गई.
पीड़िता के पोते मृत्युंजय पाल ने इस मामले की शिकायत BHU के अधिकारियों से की. इसके बाद जांच के लिए चार सदस्यीय कमेटी बनाई गई. लेकिन यहां भी एक चौंकाने वाली बात सामने आई. जिस डॉक्टर की टीम पर लापरवाही का आरोप था, उसी विभाग के डॉक्टर को जांच कमेटी का अध्यक्ष बना दिया गया. जब इस पर आपत्ति जताई गई, तब जाकर अध्यक्ष बदला गया. इस पूरे घटनाक्रम ने जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए. BHU के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “यह एक स्पष्ट प्रोटोकॉल फेल्योर है. मरीज की पहचान सुनिश्चित करना सबसे बुनियादी प्रक्रिया है, जिसमें इस स्तर की चूक अस्वीकार्य है.”
इलाज में देरी और एक बच्ची की जिंदगी बदल गई
वाराणसी की घटना के समानांतर बांदा जिले से भी एक दर्दनाक मामला सामने आया. यहां सरकारी रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज में इलाज में कथित लापरवाही के चलते पांच साल की बच्ची को अपना पैर गंवाना पड़ा. बच्ची मानवी 23 दिसंबर को छत से गिर गई थी. उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया, जहां एक्स-रे में जांघ की हड्डी में फ्रैक्चर की पुष्टि हुई. परिजनों का आरोप है कि इसके बाद छह दिनों तक न तो सर्जरी की गई और न ही उचित निगरानी.
यह बच्ची एक निम्न-मध्यम परिवार की है. उसके पिता अनिल कुमार सब्जी बेचते हैं. वे बताते हैं, “हम बार-बार डॉक्टर से कहते रहे कि हमारी बेटी की हालत खराब हो रही है, लेकिन किसी ने गंभीरता से नहीं लिया. पैर को गलत तरीके से बांध दिया गया, जिससे हालत और बिगड़ गई.” 29 दिसंबर को जब सर्जरी की तैयारी की गई, तब तक पैर का रंग बदल चुका था. डॉक्टरों ने मामला अपनी क्षमता से बाहर बताते हुए बच्ची को लखनऊ रेफर कर दिया. बाद में संक्रमण इतना फैल गया कि 7 जनवरी को उसका पैर काटना पड़ा. इस मामले में पुलिस ने संबंधित डॉक्टर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 125-B के तहत एफआईआर दर्ज की है.
सिस्टम की विफलता पर उठे सवाल
लखनऊ के वरिष्ठ स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ डॉ. आर.के. मिश्रा कहते हैं, “ये दोनों मामले दिखाते हैं कि समस्या केवल संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि सिस्टम की विफलता है. मरीज की पहचान, ऑपरेशन से पहले की चेकलिस्ट और टीम के बीच समन्वय- ये बुनियादी चीजें हैं, जिनमें किसी भी हालत में चूक नहीं होनी चाहिए.” इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) से जुड़े एक वरिष्ठ डॉक्टर का कहना है,
“सरकारी अस्पतालों में काम का दबाव बहुत ज्यादा है. कई बार एक डॉक्टर को एक साथ कई मामलों को संभालना पड़ता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि प्रोटोकॉल को नजरअंदाज किया जाए. SOP का पालन अनिवार्य होना चाहिए.”
उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं पर नजर डालें तो स्थिति कई स्तरों पर चुनौतीपूर्ण है. बड़ी आबादी, सीमित संसाधन और डॉक्टरों की कमी के कारण सरकारी अस्पतालों पर अत्यधिक दबाव है. ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी है, जिससे मरीज बड़े शहरों के अस्पतालों की ओर रुख करते हैं. इससे ट्रॉमा सेंटर और मेडिकल कॉलेजों में भीड़ बढ़ती है और व्यवस्थाएं चरमरा जाती हैं. स्वास्थ्य विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी मानते हैं, “स्टाफ की कमी और मरीजों की अधिक संख्या एक बड़ी समस्या है, लेकिन हम यह नहीं कह सकते कि इसी वजह से ऐसी गंभीर गलतियां हो जाएं. इसके लिए जिम्मेदारी तय होनी चाहिए.”
कानूनी पहलू : न्याय पाना क्यों मुश्किल?
मेडिकल नेग्लिजेंस के मामलों में पीड़ितों के लिए न्याय पाना आसान नहीं होता. कानूनी प्रक्रिया लंबी और जटिल होती है. मेडिकल लॉ के जानकार अधिवक्ता अभिनव सिंह बताते हैं, “किसी डॉक्टर के खिलाफ लापरवाही साबित करना आसान नहीं है. पीड़ित को यह साबित करना होता है कि डॉक्टर ने स्थापित मानकों का उल्लंघन किया और उसी के कारण नुकसान हुआ. सरकारी अस्पतालों में यह और मुश्किल हो जाता है क्योंकि रिकॉर्ड और जांच प्रक्रिया अक्सर पारदर्शी नहीं होती.”
वाराणसी और बांदा, इन दोनों मामलों में एक समानता साफ दिखती है यहा जवाबदेही में कमी बरती गई. वाराणसी में गलत ऑपरेशन के बाद भी परिजनों को तुरंत जानकारी नहीं दी गई. बांदा में छह दिनों तक इलाज में देरी के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई. स्वास्थ्य अधिकार कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव कहती हैं, “जब तक अस्पतालों में जवाबदेही तय नहीं होगी और मरीजों के अधिकारों को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी, तब तक ऐसी घटनाएं होती रहेंगी. हर अस्पताल में पेशेंट सेफ्टी प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन होना चाहिए.”
विशेषज्ञों का मानना है कि इस समस्या का समाधान बहुस्तरीय होना चाहिए. पहला, सभी अस्पतालों में मरीज की पहचान सुनिश्चित करने के लिए डिजिटल और बायोमेट्रिक सिस्टम लागू किए जाएं. दूसरा, ऑपरेशन से पहले ‘सर्जिकल सेफ्टी चेकलिस्ट’ का अनिवार्य पालन हो. तीसरा, मेडिकल स्टाफ के लिए नियमित प्रशिक्षण और ऑडिट की व्यवस्था हो. चौथा, जांच प्रक्रियाओं को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो. स्वास्थ्य विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, “राज्य सरकार डिजिटल हेल्थ सिस्टम और अस्पताल प्रबंधन को मजबूत करने पर काम कर रही है लेकिन असली चुनौती इन योजनाओं को जमीन पर लागू करना है.”

