"हमने भरपूर कोशिश की कि हमें इंडिया गठबंधन में शामिल कर लिया जाये ताकि अकलियत और तरक्कीपसंद लोगों के वोट न बंटे. मगर हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद उन्होंने हमारी पार्टी को इंडिया गठबंधन में शामिल नहीं किया. मजबूरन अपने कार्यकर्ताओं के हित में हमें बिहार की ग्यारह लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला लेना पड़ा है."
इंडिया टुडे ने जब बिहार में एआईएमआईएम के प्रमुख अख्तरुल ईमान से बात की तो उन्होंने पहला रिएक्शन यही दिया. पार्टी ने बुधवार को राज्य की 11 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है. इन सीटों में एआईएमआईएम की गढ़ समझी जाने वाली सीमांचल की चार सीटें तो हैं ही इसके अलावा पूरे राज्य के अलग-अलग इलाकों से पार्टी ने सीटें चुनी हैं. दिलचस्प है कि इन सीटों में ऐसी सीटें भी हैं, जो मुस्लिम बहुल सीटें नहीं मानी जाती हैं.
पार्टी ने जिन ग्यारह सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है, उनके नाम और वहां के मुस्लिम मतदाताओं का प्रतिशत निम्न है-
1. किशनगंज- 67 फीसदी
2. कटिहार- 38 फीसदी
3. अररिया- 32 फीसदी
4. पूर्णिया- 30 फीसदी
5. दरभंगा- 22 फीसदी
6. मुजफ्फरपुर- 15.4 फीसदी
7. भागलपुर- 15 फीसदी
8. गया- 15 फीसदी
9. उजियारपुर- 10 फीसदी के करीब
10. काराकाट- 10 फीसदी के करीब
11. बक्सर- 10 फीसदी के करीब
गौरतलब है कि एआईएमआईएम ने 2015 में बिहार विधानसभा की छह सीटों पर चुनाव लड़ा था और एक भी सीट नहीं जीत पाई. 2019 में उसने बिहार के एक लोकसभा सीट किशनगंज से चुनाव लड़ा, जिसमें पार्टी के प्रत्याशी अख्तरुल ईमान तीसरे स्थान पर रहे थे. बाद में 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 20 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे. इनमें 14 सीटें सीमांचल और छह मिथिलांचल की थीं. पार्टी ने पांच सीटों पर चुनाव जीता और ग्यारह सीटों पर इसने महागठबंधन के प्रत्याशी का खेल बिगाड़ा. इस तरह महागठबंधन सत्ता के करीब आते-आते रह गया. हालांकि बाद में पार्टी के पांच में से चार विधायक राजद में शामिल हो गये. अख्तरुल ईमान पार्टी के इकलौते विधायक रह गये.
इस बार भी अख्तरुल किशनगंज लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं. पार्टी की तरफ से अभी जिन दो प्रत्याशियों के नाम घोषित हुए हैं, उनमें एक वो हैं, दूसरा कटिहार से आदिल हुसैन.
ऐसा माना जाता है कि मुसलमानों के हक की बात करने वाली यह पार्टी अमूमन मुसलमान बहुल सीटों पर चुनाव लड़ती है. मगर इस बार पार्टी छह ऐसे सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है, जिसमें मुसलमानों की संख्या राज्य के औसत 17 फीसदी से भी कम है. इनमें मुजफ्फरपुर, गया, बक्सर, काराकाट, उजियारपुर और भागलपुर जैसी सीटें हैं. बक्सर, उजियारपुर और काराकाट में तो मुसलमान वोटरों की संख्या दस फीसदी के आसपास ठहरती है.
जबकि पार्टी ने मधुबनी, सीतामढ़ी, पश्चिम और पूर्वी चंपारण जैसी मुस्लिम बहुल वोटरों वाली सीटों पर कोई प्रत्याशी नहीं दिया है. इन सीटों में मुस्लिम वोटरों की संख्या 20 फीसदी से अधिक है.
दिलचस्प है कि पार्टी जिन कम मुस्लिम वोटरों वाली सीट पर चुनाव लड़ रही है, उन सीटों पर एनडीए के दिग्गजों के चुनाव लड़ने की संभावना है. बक्सर से भाजपा के फायरब्रांड अश्विनी चौबे, मुजफ्फरपुर से गिरिराज सिंह, उजियारपुर से नित्यानंद राय के चुनाव लड़ने की बात चर्चा में है. जानकारों का मानना है कि इन सीटों पर उम्मीदवार उतार कर पार्टी इन एनडीए नेताओं को पोलराइजेशन में मदद कर सकती है.
हालांकि पार्टी 2020 वाला करिश्मा फिर से दुहरा पायेगी यह कहना मुश्किल है. 2020 के बाद सीमांचल और पूरे बिहार में पार्टी के बारे में राय बनी कि भाजपा विरोधी वोटों में बंटवारा कर वह एक तरह से एनडीए और भाजपा की मदद करती है. पार्टी के विधायकों के राजद में जाने को इसी रूप में लिया जा रहा है.
हालांकि पार्टी के बिहार प्रमुख इस बात से इनकार करते हैं. वे बार-बार कहते हैं कि हम इंडिया गठबंधन के साथ लड़ना चाहते हैं, मगर हमें गठबंधन में शामिल नहीं किया जा रहा है.

