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BJP के साथ भी, खिलाफ भी! महिला आरक्षण पर मायावती ने क्या दांव चला?

मायावती ने महिला आरक्षण के मुद्दे पर जो रुख अपनाया है, वह BSP की खोई राजनीतिक जमीन फिर हासिल करने की रणनीति का भी हिस्सा है

BSP प्रमुख मायावती (फाइल फोटो)
अपडेटेड 15 अप्रैल , 2026

बहुजन समाज पार्टी (BSP) की प्रमुख मायावती ने महिला आरक्षण विधेयक पर जो रुख अपनाया है, वह सिर्फ समर्थन या विरोध की सामान्य राजनीतिक स्थिति नहीं है, बल्कि इसके भीतर एक गहरी सामाजिक और चुनावी रणनीति छिपी हुई है.

केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की तरफ से महिला आरक्षण पर विशेष सत्र बुलाने और 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाने का मायावती ने स्वागत किया है, लेकिन साथ ही उन्होंने इस पूरे विमर्श को एक नए कोण से मोड़ने की कोशिश भी की है.

15 अप्रैल को लखनऊ में मीडिया से बातचीत करते हुए BSP प्रमुख ने साफ कहा कि उनकी पार्टी लंबे समय से संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग करती रही है. हालांकि उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर सरकार फिलहाल 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना चाहती है तो BSP उसका समर्थन करेगी. यह बयान पहली नजर में सहयोगी रुख दिखाता है, लेकिन इसके भीतर एक स्पष्ट राजनीतिक संकेत भी छिपा है कि BSP अपने एजेंडे से पीछे नहीं हट रही, बल्कि उसे बड़े फ्रेम में स्थापित करने की कोशिश कर रही है.

समर्थन के साथ शर्तें

मायावती का सबसे ज्यादा जोर इस बात पर रहा कि महिला आरक्षण के भीतर अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) की महिलाओं के लिए अलग कोटा होना चाहिए. उन्होंने कहा कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो यह आरक्षण अपने मूल उद्देश्य को पूरा नहीं कर पाएगा और वंचित वर्ग की महिलाएं फिर से हाशिए पर चली जाएंगी.

हालांकि यह मांग कोई नई नहीं है. BSP लंबे समय से “कोटे में कोटा” की वकालत करती रही है. लेकिन मौजूदा राजनीतिक संदर्भ में इसे दोबारा जोर देकर उठाना यह दिखाता है कि पार्टी महिला आरक्षण को केवल लैंगिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के व्यापक ढांचे में देख रही है. मायावती ने यहां तक कहा कि अगर SC/ST और OBC महिलाओं के लिए अलग प्रावधान नहीं होगा तो यह उनके साथ अन्याय होगा.

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह रुख BSP की पारंपरिक राजनीति के अनुरूप है. लखनऊ में बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और राजनीतिक विश्लेषक सुशील पांडेय कहते हैं, “मायावती महिला आरक्षण के बहाने अपनी मूल ‘बहुजन’ राजनीति को फिर से केंद्र में ला रही हैं. यह कदम उन्हें दलित और पिछड़े वोटरों के बीच प्रासंगिक बनाए रखने की कोशिश भी है.”

50 प्रतिशत आरक्षण की मांग : प्रतीक या रणनीति?

मायावती ने एक बार फिर महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की मांग दोहराई. उन्होंने कहा कि महिलाओं की आबादी के अनुपात के हिसाब से उन्हें बराबर प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए. हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि फिलहाल कोई अन्य राजनीतिक दल इस मांग के समर्थन में नहीं दिख रहा. यहां सवाल उठता है कि क्या यह मांग व्यावहारिक राजनीति है या सिर्फ नैतिक दबाव बनाने की रणनीति? राजनीतिक विश्लेषक अर्चना सिंह का कहना है, “50 प्रतिशत आरक्षण की मांग एक तरह से नैरेटिव सेट करने का प्रयास है. इससे BSP यह दिखाना चाहती है कि वह महिलाओं के अधिकारों को लेकर सबसे आगे है, भले ही व्यावहारिक रूप से 33 प्रतिशत पर सहमति बन रही हो.”

मायावती ने इस मुद्दे पर कांग्रेस पर भी तीखा हमला भी बोला. उन्होंने कहा कि कांग्रेस को अब SC/ST महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की बात याद आ रही है, जबकि अपने शासनकाल में उसने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया. यह हमला केवल अतीत की आलोचना नहीं है, बल्कि वर्तमान राजनीतिक समीकरणों में कांग्रेस की स्थिति को कमजोर करने की कोशिश भी है.

BSP ने खुद को न तो सत्तारूढ़ NDA के साथ जोड़ा है और न ही विपक्षी INDIA गठबंधन का हिस्सा बनाया है. मायावती लगातार “बराबर दूरी” की नीति पर जोर देती रही हैं. महिला आरक्षण पर उनका रुख भी इसी रणनीति का विस्तार माना जा सकता है, जहां वे सरकार के कदम का समर्थन तो करती हैं लेकिन अपनी अलग पहचान भी बनाए रखती हैं.

नीति और इच्छाशक्ति पर सवाल

मायावती ने महिला सशक्तिकरण को लेकर सरकारों पर गंभीर सवाल भी उठाए. उन्होंने कहा कि महिलाओं के अधिकारों पर बहुत बातें होती हैं, लेकिन जमीन पर उनका असर बहुत कम दिखता है. उन्होंने इसे “नीति की स्पष्टता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी” का परिणाम बताया. उनका यह बयान केवल केंद्र सरकार पर नहीं, बल्कि समूचे राजनीतिक वर्ग पर आरोप है. उन्होंने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अपराध, जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न लगातार बढ़ रहे हैं, जो इस बात का संकेत है कि सशक्तिकरण की नीतियां प्रभावी नहीं हैं. सामाजिक कार्यकर्ता और विश्लेषक नीलम वर्मा कहती हैं, “मायावती का यह तर्क काफी हद तक सही है. कानून बनाना एक बात है, लेकिन उसका प्रभावी क्रियान्वयन दूसरी. महिला आरक्षण भी तभी सफल होगा जब इसके साथ संस्थागत सुधार और सामाजिक बदलाव जुड़े होंगे.”

मायावती ने अपने बयान में भीमराव आंबेडकर का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने महिलाओं को पुरुषों के समान मताधिकार देकर एक मजबूत नींव रखी थी. यह संदर्भ केवल श्रद्धांजलि नहीं है, बल्कि BSP की वैचारिक जड़ों को याद दिलाने का प्रयास भी है. BSP की राजनीति हमेशा से आंबेडकर विचारधारा पर आधारित रही है, जिसमें सामाजिक समानता और प्रतिनिधित्व को केंद्रीय महत्व दिया गया है. महिला आरक्षण पर मायावती का रुख भी उसी विचारधारा का विस्तार है.

खोई जमीन पाने का प्रयास

दिलचस्प बात यह है कि समर्थन के बावजूद मायावती ने इस कानून के प्रभाव को लेकर संदेह भी जताया. उन्होंने कहा कि यह देखना होगा कि क्या वास्तव में पिछड़े वर्ग की महिलाओं को इसका पूरा लाभ मिलेगा या नहीं. यह बयान एक तरह से चेतावनी भी है और राजनीतिक संकेत भी. BSP यह बताना चाहती है कि वह केवल समर्थन करने वाली पार्टी नहीं है, बल्कि निगरानी करने वाली भी है. इससे वह भविष्य में किसी भी असंतोष को अपने पक्ष में भुना सकती है.

उत्तर प्रदेश की राजनीति में BSP पिछले कुछ चुनावों में कमजोर हुई है. ऐसे में महिला आरक्षण जैसे मुद्दे पर सक्रिय भूमिका लेना पार्टी के लिए अपनी खोई जमीन वापस पाने का प्रयास भी हो सकता है. 

राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि BSP इस मुद्दे के जरिए तीन स्तरों पर काम कर रही है. पहला दलित और पिछड़े वर्ग की महिलाओं को सीधे संबोधित करना, दूसरा, खुद को सामाजिक न्याय की सबसे मजबूत आवाज के रूप में पेश करना और तीसरा राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना. सुशील पांडेय कहते हैं, “मायावती जानती हैं कि महिला वोट बैंक तेजी से निर्णायक बन रहा है. ऐसे में वह इस मुद्दे पर स्पष्ट और अलग रुख लेकर अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रही हैं.”

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