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भवानीपुर से उत्तर बंगाल तक 'मारवाड़ी मॉडल' ने कैसे बनाया BJP की जीत का रास्ता?

BJP ने भवानीपुर समेत पश्चिम बंगाल की कई सीटों पर मारवाड़ियों को संगठित करने के लिए राजस्थान के नेताओं और कार्यकर्ताओं की खास टीम मैदान में उतारी थी

suvendu adhikari
सुवेंदु अधिकारी ने भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी को हराया है
अपडेटेड 5 मई , 2026

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की ऐतिहासिक जीत के साथ ही सबसे ज्यादा चर्चा उस भवानीपुर सीट की हो रही है, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को 15 साल बाद शिकस्त का सामना करना पड़ा. साल 2011 से ममता बनर्जी यहां लगातार विधायक थीं.

भवानीपुर की इस ऐतिहासिक जीत के बाद BJP नेता सुवेंदु अधिकारी का वह बयान भी सुर्खियों में है, जिसमें उन्होंने कहा था कि यह जीत राजस्थान के नेता राजेंद्र राठौड़ और उनकी टीम की मेहनत का परिणाम है.

सुवेंदु अधिकारी के इस बयान के मायने भवानीपुर के प्रवासी वोट बैंक में छिपे हैं. यही वजह है कि इस सीट की लड़ाई केवल BJP और तृणमूल कांग्रेस के बीच का चुनावी मुकाबला नहीं रही, बल्कि बंगाल की राजनीति में प्रवासी और हिंदी भाषी मतदाताओं के बढ़ते प्रभाव की कहानी भी बन गई. खास तौर पर मारवाड़ी समाज इस चुनाव में ‘साइलेंट वोटर’ की भूमिका से निकलकर निर्णायक ताकत के रूप में उभरा.

BJP ने भवानीपुर समेत कई सीटों पर इसी वर्ग को संगठित करने के लिए राजस्थान के नेताओं और कार्यकर्ताओं की विशेष टीम मैदान में उतारी थी. राजस्थान के पूर्व नेता प्रतिपक्ष राजेंद्र राठौड़ को भवानीपुर सीट का प्रभारी बनाया गया था. वहीं, श्रीगंगानगर जिले के सादुलशहर विधानसभा क्षेत्र से मौजूदा विधायक गुरवीर सिंह, पूर्व विधायक बिहारीलाल बिश्नोई और BJP नेता वासु चावला, अशोक सैनी और राजेश बाबल को इस सीट का जिम्मा सौंपा गया.

राजेंद्र राठौड़ के नेतृत्व में राजस्थान के इन नेताओं ने भवानीपुर में बूथ स्तर तक माइक्रो मैनेजमेंट किया और मारवाड़ी व हिंदी भाषी वोटरों की गोलबंदी के जरिए चुनाव का रुख बदल दिया.

राजेंद्र राठौड़ दावा करते हैं, “जब हमने यहां काम शुरू किया तब इस इलाके में दहशतगर्दी का आलम था. हमने सबसे पहले डरे हुए लोगों को आवाज दी. राजस्थानी और गुजराती मतदाताओं को लामबंद किया. हमने हर वार्ड और हर गली में जाकर महिलाओं, व्यापारियों और युवा मतदाताओं से सीधा संवाद स्थापित किया. ममता सरकार ने इस क्षेत्र में सड़क, नाली जैसे विकास कार्यों की खूब अनदेखी की है. हमने इन सवालों को भी उठाया.”

देखा जाए तो भवानीपुर अकेली सीट नहीं रही जहां मारवाड़ी असर दिखाई दिया. कोलकाता की जोड़ासांको, बड़ा बाजार, हावड़ा, बैरकपुर, भाटपाड़ा, जगदल, टीटागढ़, श्रीरामपुर और आसनसोल-दुर्गापुर बेल्ट तक हिंदी भाषी और प्रवासी वोटर्स इस बार निर्णायक फैक्टर बनकर उभरे हैं.

इन इलाकों में वर्षों से बसे मारवाड़ी, गुजराती, पंजाबी, भोजपुरी और उत्तर भारतीय समुदाय का सामाजिक और आर्थिक प्रभाव पहले से मजबूत रहा है, मगर इस बार उन्होंने खुलकर अपनी राजनीतिक ताकत दिखाई.

राजस्थान और गुजरात से प्रभारी बनकर यहां पहुंचे BJP नेताओं ने चुनाव के दौरान व्यापारिक सुरक्षा, कानून व्यवस्था, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस, रोजगार और उद्योग जैसे मुद्दे उठाए जिससे कारोबारी समुदाय प्रभावित हुआ. BJP ने इन मुद्दों को आक्रामक तरीके से उठाया, जबकि तृणमूल कांग्रेस लगातार ‘बंगाली अस्मिता’ और बाहरी बनाम स्थानीय राजनीति के नैरेटिव पर जोर देती रही. इस चुनाव ने यह भी साबित कर दिया कि पश्चिम बंगाल के कई शहरी और औद्योगिक क्षेत्रों में सालों से रह रहे प्रवासी मतदाता अब केवल संख्या भर नहीं हैं, बल्कि सत्ता का समीकरण बदलने वाली ताकत बन चुके हैं.

इस चुनाव में प्रवासी राजस्थानियों की भूमिका पर भी खूब चर्चा हो रही है. BJP ने इस बार पश्चिम बंगाल में 9 प्रवासी राजस्थानी चेहरों को मैदान में उतारा था, जिनमें से पांच उम्मीदवार जीत दर्ज करने में सफल रहे. जोड़ासांको विधानसभा क्षेत्र से विजय ओझा, बेलडांगा से भरत कुमार झंवर, कुल्टी से अजय कुमार पोद्दार, जगदल से राजेश कुमार और बनगांव उत्तर से अशोक कीर्तनिया जैसे प्रवासी राजस्थानी चेहरों की जीत को BJP के लिए बड़ा सियासी संदेश माना जा रहा है. इन चेहरों ने वर्षों पहले राजस्थान से बंगाल जाकर अपनी राजनीतिक और सामाजिक पहचान बनाई और अब विधानसभा तक पहुंचने में सफल रहे.

उत्तर बंगाल में भी BJP की रणनीति काफी आक्रामक रही. केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को कूचबिहार, दार्जिलिंग और सिलीगुड़ी समेत कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों की जिम्मेदारी दी गई थी. BJP नेताओं का दावा है कि शेखावत की रणनीति का असर यह रहा कि उनकी जिम्मेदारी वालीं 28 में से 26 सीटों पर पार्टी को सफलता मिली.

राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी, हावड़ा उत्तर और बैरकपुर में प्रचार और चुनावी रणनीति में अहम भूमिका निभाई. वहीं केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने बंगाल के मुख्य चुनाव अभियान प्रभारी के तौर पर अपनी छाप छोड़ी. BJP के राष्ट्रीय महामंत्री सुनील बंसल ने पश्चिम बंगाल प्रदेश चुनाव प्रभारी के तौर पर सांगठनिक ढांचा तैयार किया और चुनावी अभियान का संचालन किया. इसके अलावा केंद्रीय मंत्री कैलाश चौधरी, राज्य वित्त आयोग के अध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी और BJP के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी सहित कई नेताओं ने पश्चिम बंगाल में मोर्चा संभाला.

बंगाल के इस चुनाव ने एक और बड़ा संकेत दिया है कि राज्य की राजनीति अब केवल क्षेत्रीय भावनाओं तक सीमित नहीं रह गई है. कोलकाता और औद्योगिक क्षेत्रों में बसे हिंदी भाषी और प्रवासी समुदाय अब चुनावी रणनीति के केंद्र में आ चुके हैं. BJP की इस ऐतिहासिक जीत ने यह तय कर दिया है कि पश्चिम बंगाल का प्रवासी और हिंदी भाषी फैक्टर अब इसी चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बंगाल की राजनीति में अब यह कारक स्थाई रूप से सत्ता का नया गणित तय करता रहेगा.

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