भारत इतिहास संशोधक मंडल (BISM) ने अपने पास मौजूद करीब 10 लाख दस्तावेजों का डिजिटलीकरण कर लिया है. इससे शोधकर्ताओं, लेखकों और इतिहास प्रेमियों के लिए मराठा इतिहास के अनछुए पहलुओं तक पहुंच बहुत आसान हो गई है.
BISM ने बताया है कि जल्द ही ये दस्तावेज सभी के लिए ऑनलाइन उपलब्ध कराए जाएंगे. पुणे स्थित यह मंडल मध्यकालीन महाराष्ट्र, मराठा युग और औपनिवेशिक काल के अध्ययन के लिए प्रमुख केंद्र है. BISM के सचिव और इतिहासकार पांडुरंग बलकवडे ने कहा है, "हमारे संग्रह में लगभग 20 से 25 लाख ऐतिहासिक दस्तावेज हैं. इनमें से करीब 10 लाख का डिजिटलीकरण हो चुका है."
इनमें 16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध से लेकर छत्रपति शिवाजी महाराज, मुगल काल, आदिलशाही, कुतुबशाही, छत्रपति संभाजी महाराज और पेशवाओं के दौर के दस्तावेज शामिल हैं. BISM के पास मोदी लिपि और फारसी भाषा में लिखे दस्तावेज भी हैं.
पांडुरंग बलकवडे के मुताबिक शोधकर्ताओं की सुविधा के लिए इन दस्तावेजों को ऑनलाइन अपलोड किया जाएगा. डिजिटलीकरण परियोजना तीन साल पहले शुरू की गई थी. इस योजना के लिए श्री रेणुका शुगर्स लिमिटेड के नरेंद्र मुरकुंबी ने दान दिए हैं. उन्होंने कहा, “ये दस्तावेज मराठा काल पर आम लोगों के लिए आसानी से सुलभ होंगे. साथ ही 300-400 साल पुराने होने के कारण इन दस्तावेजों को संरक्षित करना आवश्यक है. ”
पुणे से BJP के पूर्व सांसद और BISM के अध्यक्ष प्रदीप रावत ने कहा, “डिजिटलीकरण परियोजना का पहला चरण पूरा हो चुका है और जल्द ही इसे आमलोगों के लिए ऑनलाइन कर दिया जाएगा.” उन्होंने आगे बताया कि इन सभी दस्तावेजों को मंडल की वेबसाइट पर अपलोड किया जा रहा है. अगर कोई इन डॉक्यूमेंट्स को डाउनलोड करना चाहता है, तो इसके बदले उसे ऑनलाइन कुछ पेमेंट करनी होगी. हालांकि, इन्हें देखने के लिए पैसा नहीं देना होगा. मंडल ने इन सदियों पुराने दस्तावेजों के संरक्षण के लिए एक संरक्षण प्रयोगशाला भी शुरू की है.
BISM के न्यासी मंदार लवाटे ने कहा कि मंडल से जुड़े शोधकर्ताओं ने दस्तावेज इकट्ठा करने में बहुत मेहनत की है. कुछ दस्तावेज पुणे के नेनेघाट स्थित कूड़ेदान और कबाड़ की दुकानों से प्राप्त किए गए हैं. इन इतिहासकारों और शोधकर्ताओं ने विस्तृत टिप्पणियों के साथ उन्हें प्रकाशित किया है. उन्होंने कहा, " साल 1540 से 1900 के बीच मराठा इतिहास पर मूल स्रोत सामग्री की तलाश करने वालों के पास मंडल में आने के अलावा कोई विकल्प नहीं है."
लॉवेट ने आगे कहा, “कागज की एक निश्चित आयु होती है. डिजिटलीकरण से इसे संरक्षित करने में मदद मिलेगी और यह दुनिया भर के शोधकर्ताओं के लिए सुलभ हो जाएगा.” इतिहास पर शोध करने वाले यानी 'इतिहासाचार्य' विश्वनाथ काशीनाथ राजवाडे और खंडेराव चिंतामन मेहेंदले ने 7 जुलाई, 1910 को BISM की स्थापना की थी. तब BISM का पता पुणे के अप्पा बलवंत चौक स्थित मेंहदेले के आवास था . बाद में इसे सदाशिव पेठ स्थित अपने वर्तमान पते पर स्थानांतरित कर दिया गया.
मंडल के संस्थापक राजवाडे (1863-1926) मराठा इतिहास में अपने महत्वपूर्ण योगदान के लिए जाने जाते हैं. राजवाडे ने पूरे महाराष्ट्र में घूमकर ऐतिहासिक दस्तावेज और अभिलेख एकत्र किए, जैसे कि 'महिकावतीची बखर.' इस दस्तावेज में मध्ययुग में उत्तरी कोंकण और मुंबई का इतिहास है. उन्होंने 1924 में इस बखर का संपादन और प्रकाशन किया.
'राधामाधव विलास चंपू' नाम के काव्य को जयराम पिंड्ये ने संस्कृत में लिखा है. इसमें गद्य और पद्य दोनों का मिश्रण है. मुख्य रूप से यह छत्रपति शिवाजी महाराज के पिता शाहजी महाराज की वीरता और उनके कारनामों पर केंद्रित है. राजवाडे ने इसे 1922 में प्रकाशित किया. पिंड्ये नासिक के रहने वाले थे और उन्हें संस्कृत सहित 12 भाषाओं में महारत हासिल थी. वे शाहजी राजे के दरबार में रहे थे और उन्होंने यह रचना 1653 से 1658 के बीच की थी, इसलिए उनकी इस कथा में प्रामाणिकता की मजबूत झलक मिलती है.
राजवाडे को यह पांडुलिपि पुणे के पास चिंचवड में विष्णुपंत राबडे के घर में मिली थी. उन्होंने मराठा इतिहास पर आधारित 22 खंडों की स्रोत सामग्री (मराठींच्या इतिहासाची साधना) का संपादन और प्रकाशन भी किया.
BISM के जरिए1976 में प्रकाशित राजवाडे की स्मृति में प्रकाशित एक पुस्तक में लेखक और शोधकर्ता श्री रा टिकेकर ने उल्लेख किया है कि राजवाडे किस प्रकार गांव-गांव घूमकर दस्तावेज एकत्र करते थे. इनमें से कुछ कागजात तो गांव वालों ने कबाड़ के रूप में किराना दुकानदारों को अपना सामान पैक करने के लिए बेच भी दिए थे.
राजवाडे को अपनी यात्राओं के लिए कर्ज लेना पड़ता था. 'राधामाधव विलास चंपू' में राजवाडे के जरिए 203 पृष्ठों की प्रस्तावना लिखी गई थी. प्रतिभाशाली लेकिन अस्थिर स्वभाव वाले राजवाडे का 1917 में BISM के प्रशासकों से मतभेद हो गया और वे उत्तरी महाराष्ट्र के धुले चले गए.
इतिहास लेखन में उनके महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद, राजवाडे के लेखन पर ब्राह्मण-समर्थक या ब्राह्मणवादी झुकाव होने और शिवाजी महाराज के जीवन और कार्यकाल में संत रामदास जैसे व्यक्तियों की भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने के आरोप लगे. इसके अलावा, उनपर एक वर्ग को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने का आरोप लगाया गया.
मंडल के संग्रह में मौजूद दुर्लभ ऐतिहासिक दस्तावेजों में शिवाजी महाराज की माता राजमाता जीजाबाई यानी शिवाजी की मां के जरिए 1652 में लिखा गया एक 'खुर्दखात' भी है. यह खुर्दखात येरवडा (पुणे) में गणो गाबाजी तबिब को दिया गया इनाम (जमीन या वतन) से संबंधित है. बता दें कि खुर्दखत एक ऐसा दस्तावेज़ होता है, जिसके जरिए इनाम या वतन दिया जाता है या नवीनीकृत किया जाता है.
इसके अलावा संग्रह में मुगल सम्राट औरंगजेब के अपने हाथ से लिखे दस्तावेज, उनके बेटे का हाथ का निशान (हस्ताक्षर के बजाय हाथ का छाप), शाहजी महाराज का एक पत्र, मुगल निशान और फरमानों का संग्रह और बीजापुर के आदिलशाह की सेवा में रहे अफगान सेनापति अब्दुल करीम बेहलोल खान के हाथ का निशान शामिल है.
BISM के पुस्तकालय में 30,000 पुस्तकों का संग्रह, 40,000 पोथियां (पांडुलिपियां या धार्मिक ग्रंथ/शास्त्र), और 25 समाचार पत्रों और पत्रिकाओं की प्रतियां भी हैं, जो 1842 और 1947 के बीच प्रकाशित हुई थीं. इनमें ज्ञानसिंधु (1844), ज्ञानप्रकाश (1849-1865), इंदुप्रकाश (1863-64, 1867, 1869, 1871), और सूर्योदय (1867) जैसी पत्र-पत्रिकाएं शामिल हैं.

