
साल 2025 में एंटी नक्सल ऑपरेशन के तहत सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में 256 नक्सलियों को मार गिराने में सफलता मिली है और 1500 से अधिक नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ सरकार के पुनर्वास नीति के तहत आत्म-समर्पण किया है. ये बात किसी और ने नहीं, खुद सीएम विष्णुदेव साय ने कही है.
केंद्र और राज्य सरकार के लिए ये आंकड़े उत्साहजनक हैं. लेकिन बस्तर इलाके में रह रहे स्थानीय आदिवासियों के साथ दोतरफा मार की अंतहीन पीड़ा अब भी जारी है. बीते 12 जनवरी को बस्तर के कांकेर जिले के घने जंगलों से एक बार फिर ऐसी ही खबर आई, जिसने नक्सलवाद, पुलिसिया अभियान और इन सब के बीच पिसते हुए आदिवासी समाज के सच को उजागर कर दिया है.
बस्तर में इन दिनों वन विभाग की ओर से बांस कटाई चल रही है. इस काम में वन विभाग के कर्मियों के अलावा स्थानीय आदिवासियों को भी लगाया जाता है. मिली जानकारी के मुताबिक छोटेबेठिया थाना क्षेत्र के आलदंड गांव के आदिवासी दसरू पद्दा इसी पुलिसिया दमन के शिकार हुए हैं.
आलदंड गांव के समाजसेवी अजीत नुरूती ने बताया कि इलाके में अभी वन विभाग की ओर से ही बांस काटने का काम चल रहा है. बस्तर के स्थानीय आदिवासियों को भी वन विभाग इस काम में लगाता है. गांव और जंगल में जिस जगह बड़ी संख्या में बांस हैं, वहां तीन चार किलोमीटर की दूरी है. ऐसे में लोग जहां बांस है, वहीं झोपड़ी बनाकर रह रहे हैं, जहां दिन को बांस काटने और फिर रात आराम करते हैं. 40 साल के दसरू भी वन विभाग की ओर बांस काट रहे थे और जंगल में ही रह रहे थे.

दसरू बताते हैं कि वे चावल लाने अपने गांव गए थे और वहीं से लौट रहे थे. रास्ते में डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड (DRG) के जवानों ने उनको रोका और पूछताछ की. इसी दौरान उन्हें माओवादियों का सहयोगी बताकर पहले तो बेरहमी से पीटा गया. जब वे बेहोश गए तो नाक में पानी डाल कर होश में लाया गया. इसके बाद पुलिस उन्हें उस झोपड़ी के पास ले गई जहां वे रह रहे थे. यहां भी उनके साथ मारपीट की गई. वे दावा करते हैं कि यहां भी उनकी नाक में पानी डाला और इस दौरान पत्थर से उनके हाथ कूचे गए और फिर अंडकोश पर डंडे से मारा गया.
आलदंड गांव गंदारी ग्राम पंचायत का हिस्सा है. गंदारी की सरपंच मैनी कचलाम ने अस्पताल जाकर दसरू पद्दा से मुलाकात की. उन्होंने बताया, "जब मैं उनसे मिली तो उनका पूरा हाथ पैर सूजा हुआ था. शरीर पर खून के निशान थे.’’
पुलिस इनकार कर रही
अजीत बताते हैं कि मामले की जानकारी जब गांव के लोगों को हुई तो यह बात मीडिया तक पहुंचाई गई. जिसके बाद दबाव में आकर स्थानीय पुलिस ने दसरू पद्दा को स्थानीय प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया. इस आदिवासी के साथ हुई बर्बरता ने पूरे इलाके के आदिवासियों में गुस्सा भड़का दिया है. आसपास के कंदारी, आलदंड, आमाटोला, हिदूर, घोरिया, खैरीपदर, कोपिनगुंडा, राजामुंडा, कपलर सहित अन्य गांवों के आदिवासियों ने दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए आंदोलन शुरू कर दिया है. उनका कहना है कि जंगल में बांस कटाई चल रही है. सभी लोग इस काम में लगे हुए हैं. ऐसे में वे माओवाद के नाम पर पुलिस की प्रताड़ना नहीं सहेंगे.
दसरू पद्दा के घर में उनकी पत्नी, मां, एक बेटा और बेटी हैं. बड़ी बेटी की शादी हो गई है. हालांकि पूरे मामले में अभी तक एफआईआर दर्ज नहीं कराई गई है. 14 जनवरी को कांकेर में ही बस्तर पंडुंग सांस्कृतिक महोत्सव का आयोजन किया जा रहा है. इन गांवों के लोग भी इसमें शामिल होने जा रहे हैं. यहां वे कांकेर सांसद भोजराज नाग और अंतःगढ़ के विधायक विक्रम उसेंडी से मिलकर उनके सामने पूरा मामला उठाएंगे.
पूरे घटनाक्रम पर पुलिस ने भी अपना पक्ष रखा है. कांकेर जिले के पखांजुर तहसील के एसडीपीओ रवि कुजूर ने बताया "परतापुर एरिया में नक्सलियों को होने की सूचना पर हमारी टीम सर्च ऑपरेशन के लिए आलदंड, आमाटोला में गई थी. वहां कुछ ग्रामीणों से पुलिस ने पूछताछ की. यह भी सूचना थी कि वहां नक्सली ग्रामीणों के सहयोग से उन इलाकों में रुके हुए थे. उनसे खाद्य सामग्री ले रहे थे. इसी संबंध में पूछताछ की गई थी, लेकिन पुलिस ने किसी के साथ मारपीट नहीं की है.”
दसरू पद्दा ने जो आरोप लगाए हैं और उन्हें पुलिस ने ही अस्पताल में भर्ती, वह मामला क्या है? रवि कुजूर इस सवाल का सीधा जवाब नहीं देते और पुलिस के ऊपर लगे आरोप को सिरे से खारिज करते हैं. वे दावा करते हैं, "कई बार माओवादी ग्रामीणों पर दबाव डालकर ऐसा कहने के लिए मजबूर करते हैं, ताकि पुलिस उन इलाकों में न जा पाए. जिस दिन पुलिस सर्च ऑपरेशन के लिए गई थी, हमारी सूचना के मुताबिक मुठभेड़ तय थी.’’
चाहे नक्सलवादियों की तरफ से हो, पुलिस की तरफ से या फिर दबंगों की तरफ से, आदिवासियों के दमन की घटनाएं रुकती नहीं दिखतीं. छत्तीसगढ़ में आदिवासियों के साथ ऐसी हिंसक घटनाओं की लंबी लिस्ट है. साल 2019 से 2023 तक में पूरे राज्य में कुल 2,287 मामले दर्ज के गए थे.
बीते 17 दिसंबर 2025 को संसद में केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री रामदास अठावले की ओर से दिए गए आंकड़ों के मुताबिक साल 2019 से 2023 तक में देशभर में आदिवासियों के साथ हुई प्रताड़ना के कुल 47,659 मामले दर्ज किए गए हैं. जिसमें साल 2019 में 7567, साल 2020 में 8270, साल 2021 में 8799, साल 2022 में 10,064 और साल 2023 में 12,959 मामले दर्ज हुए हैं. यानी साल-दर-साल यह आंकड़ा बढ़ता ही गया है. इन दिनों आदिवासियों में भी काफी हद तक राजनीतिक जागरूकता आ चुकी है और जाहिर है कि ऐसी किसी भी घटना पर वह आंदोलन करने में देर नहीं करता और इस समय यही छत्तीसगढ़ में हो रहा है.

