
राजस्थान की सियासत में शाही घरानों की अपनी अलग पहचान रही है. विधानसभा और लोकसभा में भी इन घरानों का दबदबा और वर्चस्व हमेशा नजर आया है. राजस्थान के पूर्व राजघरानों और ठिकानेदारों की न केवल सियासत, बल्कि इनके पारिवारिक विवाद भी हमेशा सुर्खियां बटोरते रहे हैं. इन दिनों बाड़मेर के जसोल ठिकाने और भरतपुर के पूर्व राजपरिवार के बीच पनपी आपसी कलह ने इन दोनों परिवारों के सियासी भविष्य पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है.
शुरुआत बाड़मेर के जसोल ठिकाने के ताजा विवाद से करते हैं. इस परिवार की पहचान भारत के पूर्व विदेश मंत्री रहे जसवंत सिंह से जुड़ी रही है. करीब पांच दशकों तक राजस्थान की सियासत में इस परिवार का खास दबदबा रहा, मगर 21वीं सदी के पहले दशक के बाद से जसोल घराने के सियासी भविष्य पर ऐसा ग्रहण लगा कि यह परिवार आज तक उससे उबर नहीं पाया है.
जसवंत सिंह के 60 वर्षीय बेटे मानवेंद्र सिंह की कथित दूसरी शादी से जुड़े हालिया विवाद ने इस कलह को सार्वजनिक कर दिया है.
हाल ही में मानवेंद्र सिंह की मां शीतल कंवर ने उन्हें घर से बेदखल कर दिया. बताया जा रहा है कि मानवेंद्र सिंह अपनी दूसरी पत्नी और पुलिस के साथ वहां आए थे, मगर शादी से नाराज उनके बेटे हमीर सिंह, बेटी और मां ने उन्हें घर के भीतर दाखिल नहीं होने दिया. उनकी इस कथित शादी को लेकर राजपूत समाज में भी तीखी प्रतिक्रिया देखी गई है.
हालांकि, मानवेंद्र ने अब तक खुलकर अपनी दूसरी शादी की बात स्वीकार नहीं की है. गौरतलब है कि उनकी पहली पत्नी चित्रा सिंह की 30 जनवरी 2024 को दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे पर एक कार दुर्घटना में मौत हो गई थी. चित्रा सिंह राजस्थान के भैंसरोरगढ़ ठिकाने से ताल्लुक रखती थीं.
राजनीति की बात करें तो मानवेंद्र सिंह पिछले दो दशकों से कोई चुनाव नहीं जीत पाए हैं, हालांकि थार की सियासत में जसोल ठिकाने का प्रभाव कायम है. इस परिवार के सियासी भविष्य को सबसे बड़ा नुकसान पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के साथ हुई अदावत से हुआ. 20 साल पहले शुरू हुआ यह गतिरोध जसोल परिवार के लिए बड़ा सियासी संकट साबित हुआ. वर्ष 2005-06 में राजे सरकार के खिलाफ BJP के ही कुछ मंत्रियों और बड़े नेताओं ने मोर्चा खोल दिया था, जिनमें एक नाम जसवंत सिंह जसोल का भी था.
अपनी ही सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाने वाले ये नेता राजे के निशाने पर आ चुके थे. दो साल बाद वह वक्त भी आया जब राजे सरकार ने उनके खिलाफ खड़े नेताओं पर नशीले पदार्थों के सेवन का मुकदमा दर्ज कर लिया. दरअसल, बाड़मेर के जसोल गांव में जसवंत सिंह के परिवार के एक सदस्य की मृत्यु पर वसुंधरा विरोधी खेमा जुटा था. थार के पारंपरिक रीति-रिवाज के अनुसार, शोक व्यक्त करने आए लोगों का स्वागत 'रियाण' (अफीम से सत्कार) से किया जाता है. जसवंत सिंह के घर जुटे BJP नेताओं- घनश्याम तिवाड़ी, कैलाश मेघवाल, नरपत सिंह राजवी, ललित किशोर चतुर्वेदी, महावीर जैन और रघुवीर कौशल के स्वागत में भी रियाण हुई थी. जैसे ही इसकी तस्वीरें बाहर आईं, सरकार ने सभी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया.

1960 में सेना के मेजर पद से इस्तीफा देकर राजनीति में आए जसवंत सिंह पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और भैरोंसिंह शेखावत के करीबी थे. उन्हें जनसंघ से जोड़ने का श्रेय भैरोसिंह शेखावत को ही जाता है. सियासत में उन्हें वाजपेयी का 'हनुमान' कहा जाता था. 1998 से 2004 के बीच वाजपेयी सरकार में उन्होंने वित्त, रक्षा और विदेश मंत्रालय की कमान संभाली. 1980 में वे पहली बार राज्यसभा पहुंचे और BJP के केंद्रीय नेतृत्व की मजबूत धुरी बने. 2009 तक वे संसद के दोनों सदनों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे.
2009 में प्रकाशित अपनी किताब "जिन्ना: इंडिया, पार्टिशन, इंडिपेंडेंस" में जसवंत सिंह ने मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ की. BJP में इसको लेकर आक्रोश देखा गया. परिणामस्वरूप उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया गया. हालांकि बाद में उनकी वापसी हुई, लेकिन 2014 में बाड़मेर से BJP उम्मीदवार के खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ना उनकी बड़ी भूल साबित हुई. इसके बाद उन्हें पार्टी से निकाल दिया गया.
वहीं मानवेंद्र सिंह 2004 से 2009 के बीच लोकसभा सांसद थे. इसके अलावा वे राजस्थान विधानसभा के सदस्य भी रहे. लेकिन 2014 में अपने पिता का साथ देने की वजह से उन्हें भी BJP से बाहर कर दिया गया था. 2018 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले मानवेंद्र सिंह ने कांग्रेस का दामन थाम लिया. कांग्रेस ने उन्हें वसुंधरा राजे के खिलाफ झालरापाटन से उतारा, जहां उन्हें हार का सामना करना पड़ा. 2023 में उन्हें सिवाना सीट से मौका मिला, मगर वहां भी वे शिकस्त झेल गए. 2024 के लोकसभा चुनाव के समय वे कांग्रेस छोड़कर फिर BJP में आ गए, लेकिन हालिया पारिवारिक विवाद ने उनके सियासी भविष्य की राह और मुश्किल कर दी है.
अब बात भरतपुर के पूर्व राजघराने की. महाराजा सूरजमल की 14वीं पीढ़ी के वंशज विश्वेंद्र सिंह और उनके बेटे अनिरुद्ध सिंह के बीच पिछले दो-तीन वर्षों से गंभीर विवाद चल रहा है. विश्वेंद्र सिंह की पत्नी दिव्या सिंह भी इस लड़ाई में अपने बेटे के साथ हैं. शाही संपत्ति पर मालिकाना हक और वर्चस्व को लेकर शुरू हुआ यह विवाद कई बार सार्वजनिक मंचों तक पहुंचा है. मामला इतना बढ़ गया कि अनिरुद्ध और दिव्या सिंह ने विश्वेंद्र सिंह को उनके पैतृक मोती महल से बाहर निकाल दिया, जिसके बाद उन्होंने कानूनी लड़ाई भी लड़ी.

विश्वेंद्र सिंह ने पत्नी और बेटे पर बिना अनुमति महल के लॉकर से 10 किलोग्राम सोना और पुश्तैनी जेवर चोरी करने तथा मारपीट कर बेदखल करने का आरोप लगाया है. वहीं, अनिरुद्ध सिंह ने अपने पिता पर पारिवारिक संपत्तियों को अवैध रूप से बेचने और मां के साथ दुर्व्यवहार करने के आरोप मढ़े हैं. हाल ही में मोती महल के झंडे को लेकर भी विवाद गहराया था. अनिरुद्ध ने रियासतकालीन झंडे को बदलकर पचरंगा झंडा लगा दिया था, जो विश्वेंद्र सिंह और उनके समर्थकों को नागवार गुजरा. इस तकरार और सियासी उलटफेर का ही नतीजा रहा कि विश्वेंद्र सिंह को पिछले विधानसभा चुनाव में डीग-कुम्हेर सीट से हार का सामना करना पड़ा.
आपसी विवादों के कारण राजस्थान की सियासत के ये दिग्गज घराने अब ढलान की ओर नजर आ रहे हैं. सवाल यह है कि क्या यह अंतर्कलह उनकी राजनीति को और गहरी खाई में ले जाएगी, या आपसी समझौते की कोई किरण उनके भविष्य में उजाला भर पाएगी.

