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ममता बनर्जी SIR की लड़ाई अब सड़कों पर लड़ेंगी; क्या है TMC की तैयारी?

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बार-बार साबित किया है कि वे प्रशासनिक विवादों को धरना-प्रदर्शन के जरिए निर्णायक राजनीतिक मोड़ में बदलने में माहिर हैं

ममता बनर्जी (फाइल फोटो)
ममता बनर्जी (फाइल फोटो)
अपडेटेड 3 मार्च , 2026

तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चुनाव आयोग (EC) के साथ अपने टकराव को तेज कर दिया है. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 6 मार्च से इस पूरे अभियान को जनता के बीच लाकर राजनीतिक पड़ाई बनाने का फैसला किया है.

इसके लिए राज्यव्यापी विरोध प्रदर्शन व अन्य राजनीतिक कार्यक्रमों की घोषणा की गई है. 1 मार्च को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में TMC के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने चुनाव आयोग पर BJP के दबाव में काम करने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि ममता बनर्जी 6 मार्च से कोलकाता में एस्प्लेनेड मेट्रो स्टेशन के पास धरना-प्रदर्शन का नेतृत्व करेंगी.

आंदोलन की वजह यह है कि 28 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की गई. मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के मुताबिक, 16 दिसंबर 2025 को प्रकाशित ड्राफ्ट रोल में 7 करोड़ 8 लाख 16 हजार 630 मतदाता थे. अब अंतिम रोल में 7 करोड़ 4 लाख 59 हजार 284 मतदाता हैं.

ऐसा इसलिए क्योंकि फॉर्म 6 और 6A से 1 लाख 82 हजार 36 नए मतदाता जोड़े गए और फॉर्म 7 से 5 लाख 46 हजार 53 नाम हटाए गए. सबसे अहम बात यह है कि 60 लाख 6 हजार 675 मतदाताओं के नाम को न्यायिक प्रक्रिया के अंतर्गत विचाराधीन रखा गया है. TMC का कहना है कि यह आंकड़ा पूरी चुनावी प्रक्रिया की वैधता पर ही सवाल उठाता है.

चुनाव आयोग की SIR के बाद की अंतिम सूची से यह भी पता चलता है कि मतदाता सूची से करीब 63 लाख नाम हटा दिए गए थे, जिनमें 58 लाख नाम अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत और डुप्लीकेट मतदाताओं के नाम शामिल हैं.

अभिषेक ने आरोप लगाया कि प्रक्रियात्मक हेरफेर के जरिए काफी सारे लोगों का नाम सूची से बाहर किया गया है. CEO कार्यालय के जरिए 19 और 20 जनवरी को जारी बुलेटिनों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि 19 जनवरी को फॉर्म 7 की संख्या 41,961 थी. अब जारी हुई अपडेट के मुताबिक, फॉर्म 7 की संख्या 546,053 है. उन्होंने कहा कि फॉर्म 7 में ये अतिरिक्त 5,00,000 कैसे जुड़ गए?

उन्होंने स्वीकृत फॉर्म 6 आवेदनों में आई भारी गिरावट पर भी सवाल उठाया. उन्होंने कहा कि 19 और 20 जनवरी को जारी अधिसूचनाओं में 6,33,762 फॉर्म 6 आवेदन दर्ज किए गए थे, लेकिन 28 फरवरी को जारी अंतिम आंकड़े में केवल 1,82,036 आवेदन ही जोड़े गए. अभिषेक ने आरोप लगाया, “ करीब 5 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए और 4 लाख लोगों के फॉर्म 6 आवेदन स्वीकार नहीं किए गए. इसका मतलब है कि 9 लाख वोटों में हेराफेरी की गई.”  

SIR प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करते हुए TMC नेता अभिषेक ने कहा कि चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया में 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' (तार्किक असंगति) और 'अनमैप्ड' (अमान्य) जैसी नई कैटेगरी शुरू की गईं है. यह कैटेगरी SIR की मूल अधिसूचना (27 अक्टूबर 2025) में कहीं नहीं थीं. अभिषेक ने आरोप लगाते हुए कहा कि कई BJP नेताओं ने 1 करोड़ से लेकर 1.2 करोड़ तक नाम सूची से हटाने के दावे किए थे. ऐसा लगता है कि EC ने 'लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी' कैटेगरी के जरिए उनकी इसी इच्छा को पूरी की है. इस कैटेगरी में राज्य के करीब 1.2 करोड़ लोगों के नाम रखे गए हैं.

TMC के जरिए जारी की गई सूची में शामिल जिलावार आंकड़ों ने पार्टी के इस तर्क को आधार बनाया कि SIR प्रक्रिया में कुछ खास क्षेत्रों को टारगेट किया गया है. इन आंकड़ों के मुताबिक, कूच बिहार में 238,000 मतदाता, उत्तर दिनाजपुर में 480,000, मालदा में 828,000 से ज्यादा, मुर्शिदाबाद में 11 लाख, उत्तर 24 परगना में लगभग 600,000 और दक्षिण 24 परगना में 522,000 मतदाताओं के नाम न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में हैं.

तृणमूल नेताओं का तर्क है कि मालदा और मुर्शिदाबाद में 20 से 40 फीसद मतदाताओं को न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में रखा गया है. इस कारण निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया होना अब पूरी तरह से असंभव लगता है.  

अभिषेक ने कहा, "अगर किसी विधानसभा क्षेत्र में औसतन 200,000 मतदाता रहते हैं और 80 फीसद मतदान होता है, यानी 160,000 वोट डाले जाते हैं, तो 150,000 मतदाताओं को न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में रखना निष्पक्ष चुनाव के विचार को ही नष्ट कर देता है." उन्होंने मांग की है कि चुनाव आयोग सार्वजनिक रूप से यह खुलासा करे कि उसने वास्तव में कितने रोहिंग्या या बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान की है.

उन्होंने बार-बार इन आंकड़ों को BJP नेताओं के जरिए पहले दिए गए राजनीतिक बयानों से जोड़ा है. उन्होंने कहा, “मैं आपको कुछ घटनाक्रम समझाता हूं. पहले मसौदा सूची से 58 लाख नाम हटाए गए. फिर फॉर्म 7 के माध्यम से लगभग 6 लाख नाम हटाए गए. कुल मिलाकर 64 लाख हो जाते हैं. इसमें विचाराधीन 6,006,675 नाम जोड़ दें तो संख्या 124 लाख हो जाती है. सुवेंदु अधिकारी ने 125 लाख की बात की थी. शांतनु ठाकुर ने 12 लाख की बात की थी. ये लक्ष्य पहले से ही निर्धारित थे.”

अभिषेक ने कहा कि SIR प्रक्रिया के दौरान 160 लोगों की मौत हो गई. कुछ घटनाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने पूछा, “एक गर्भवती महिला को आठ से नौ घंटे तक लाइन में खड़ा रखा गया. बुजुर्गों और बीमार लोगों को स्ट्रेचर पर सुनवाई केंद्रों तक लाया गया. CEO ने कहा कि नाम हटाना एक मामूली मुद्दा है. क्या ये मामूली मुद्दे हैं?”उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्हें ऐसे 243 लोगों के फोन आए हैं जिन्हें जीवित होने के बावजूद मृत घोषित कर दिया गया था.

इस प्रक्रिया की मनमानी को सामने लाते हुए अभिषेक ने विश्व कप विजेता क्रिकेटर ऋचा घोष, नोबेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन, भारतीय तेज गेंदबाज मोहम्मद शमी, राज्य मंत्री शशि पांजा और यहां तक ​​कि पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव सहित कई प्रमुख नामों का हवाला दिया, जिनके नामों को जांच के दायरे में रखा गया था. उन्होंने पूछा, “क्या यह इलेक्शन कमीशन के CEO के लिए कोई मामूली मुद्दा है?”

TMC नेताओं का तर्क है कि सुप्रीम कोर्ट ने उनकी बात मान ली है. अब मतदाता सूची के विवादित और जांच के दायरे में आए या हटाए गए नामों की सुनवाई राज्य के अलग-अलग जगहों पर होगी, इसके लिए चुनाव आयोग को ज्यादा केंद्र बनाने के आदेश दिए गए हैं और विसंगति सूचियों के प्रकाशन का भी आदेश दिया गया है. फिर भी, ममता दीदी 6 मार्च से सड़कों पर उतर रही हैं ताकि यह मुद्दा सिर्फ कोर्ट-कचहरी की लड़ाई न रहे, बल्कि लोगों की बड़ी भीड़ वाली राजनीतिक जंग बन जाए.

ममता का राजनीतिक करियर सड़क आंदोलनों से आकार लेता रहा है. सिंगूर और नंदीग्राम से लेकर NRC और CAA के विरोध प्रदर्शनों तक. तृणमूल के भीतर यह स्पष्ट धारणा है कि जब कानूनी तर्कों को प्रत्यक्ष जन दबाव का समर्थन मिलता है, तभी वह सबसे अधिक प्रभावी होती हैं. 6 मार्च के धरने का नेतृत्व स्वयं करके, वह यह संकेत दे रही हैं कि मतदाता सूची का मुद्दा एक लोकतांत्रिक संकट है.

अभिषेक ने इस मुद्दे को पहचान और गरिमा के मुद्दे के रूप में प्रस्तुत किया. उन्होंने कहा, “बंगाल के लोगों को बांग्लादेशी करार दिया गया. बंगाली बोलने पर उन्हें प्रताड़ित किया गया और कहा गया कि बंगाली कोई भाषा नहीं है.” उन्होंने केंद्र सरकार के जरिए केरल का नाम बदलकर केरलम करने की स्वीकृति और आठ साल बाद भी बंगाल के नाम बदलकर बांग्ला करने के प्रस्ताव को अस्वीकार करने के बीच तुलना करते हुए पूछा कि ऐसी शत्रुता केवल बंगाल के लिए ही क्यों है?

TMC नेता ने चुनाव आयोग पर सुप्रीम कोर्ट के सामने भी अपनी विश्वसनीयता खोने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा, “खुद कोर्ट ने कहा है कि चुनाव आयोग पर भरोसा नहीं है. अगर कोर्ट को चुनाव आयोग पर भरोसा होता तो वह न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति नहीं करता.”

अभिषेक ने कहा, “मैं वही दोहराता हूं जो मैंने एक साल पहले कहा था. 2026 में BJP की सीटों की संख्या 50 से नीचे गिर जाएगी. आप चाहें तो SIR या FIR दर्ज करा सकते हैं. आपकी योजना अदालत में विफल हो चुकी है और जनता की अदालत में भी विफल होगी.”

ममता बनर्जी के विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व करने की तैयारी के साथ, TMC यह स्पष्ट कर रही है कि मतदाता सूचियों को लेकर लड़ाई केवल हलफनामों और सुनवाई के माध्यम से नहीं लड़ी जाएगी, बल्कि रैलियों, धरना-प्रदर्शनों और मार्चों  के माध्यम से लड़ी जाएगी. यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहां मुख्यमंत्री ने बार-बार यह दिखाया है कि वह प्रशासनिक विवादों को निर्णायक राजनीतिक मुद्दों में बदलने में माहिर हैं.

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