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मलिहाबाद के दशहरी आम पर दोहरा संकट; मौसम के साथ ईरान युद्ध की आफत!

मौसम के उतार-चढ़ाव, बेमौसम बारिश और ईरान संकट के बीच मलिहाबाद के दशहरी आम के उत्पादन, गुणवत्ता और निर्यात को लेकर किसानों-व्यापारियों की बढ़ी चिंता

लखनऊ के मलिहाबाद में स्थित बागों में आम के पेड़ बौर से लदे हुए हैं. (फोटो-किसान तक)
सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 6 अप्रैल , 2026

मलिहाबाद, काकोरी और माल का इलाका हर साल इस वक्त तक आम के बौर की खुशबू और किसानों की उम्मीदों से भरा रहता है. लेकिन इस बार तस्वीर अलग है. बागों में हरियाली तो है, पेड़ों पर बौर भी आए हैं, मगर किसानों के चेहरों पर वह आत्मविश्वास नहीं दिखता जो आमतौर पर इस मौसम की पहचान होता है. 

वजह है मौसम का अनिश्चित मिज़ाज. फूल आने के अहम दौर में तापमान में लगातार उतार-चढ़ाव और बीच-बीच में हुई बेमौसम बारिश ने फसल के शुरुआती चरण को ही प्रभावित कर दिया. आम की फसल के लिए यह समय बेहद संवेदनशील होता है, क्योंकि इसी दौरान फूल के फल में बदलने की प्रक्रिया यानी ‘फ्रूट सेटिंग’ होती है. इस प्रक्रिया में हल्की सी गड़बड़ी भी पूरे सीजन के उत्पादन पर असर डाल सकती है. 

स्थिर मौसम की कमी सबसे बड़ी समस्या

लखनऊ में रहमानखेड़ा स्थित ICAR-सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर सबट्रॉपिकल हॉर्टिकल्चर (CISH) के वैज्ञानिक पी.के. शुक्ला बताते हैं कि इस बार समस्या सिर्फ बारिश नहीं है. वे कहते हैं, “बारिश ने सीधे तौर पर बौर को नुकसान नहीं पहुंचाया, लेकिन तापमान में हो रहे उतार-चढ़ाव ने फल बनने की प्रक्रिया को प्रभावित किया है. कुछ बागों में फल लग गए हैं, जबकि कई जगहों पर अभी भी सेटिंग नहीं हुई है.” 

CISH के पूर्व निदेशक शैलेंद्र राजन भी इसी बात पर जोर देते हैं. उनके मुताबिक, “आम के फूल बेहद नाजुक होते हैं और तापमान में अचानक बदलाव उन्हें प्रभावित करता है. खासकर रात का तापमान 15 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाए, तो भ्रूण विकास रुक सकता है. इस बार यही स्थिति कई जगह देखने को मिली है.” 

मलिहाबाद के गांवों में जाकर बात करने पर किसानों की चिंता और स्पष्ट हो जाती है. किसान संजीत सिंह बताते हैं कि इस बार बौर की स्थिति शुरू से ही कमजोर थी. वे कहते हैं, “फूल तो आए, लेकिन उनकी पकड़ मजबूत नहीं थी. अब बारिश और नमी ने स्थिति और बिगाड़ दी है.” पास ही के एक बाग में खड़े रामगोपाल कहते हैं, “आम के लिए इस समय तेज धूप जरूरी होती है. अगर अगले एक-दो दिन में धूप नहीं निकली, तो 25-30 फीसदी तक फसल का नुकसान हो सकता है.” किसान सुभाष मिश्र भी इसी चिंता को दोहराते हैं. उनके मुताबिक, “नमी बढ़ने से बौर पर फंगस लगने का खतरा बढ़ गया है. अगर मौसम साफ नहीं हुआ, तो फूल झड़ने लगेंगे और फल बनने की प्रक्रिया रुक जाएगी.”

कीट, रोग और नमी : बढ़ती समस्याओं का त्रिकोण

इस बार की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ फूल झड़ना नहीं, बल्कि उससे जुड़ी दूसरी समस्याएं भी हैं. अधिक नमी ने बागों में फंगस और रोगों के लिए अनुकूल वातावरण बना दिया है. औद्यानिक विशेषज्ञ कृष्ण मोहन चौधरी बताते हैं, “इस समय पाउडरी मिल्ड्यू, दहिया और खर्रा जैसे रोग तेजी से फैल सकते हैं. इसके अलावा भुनगा, रुजी और गुझिया जैसे कीट भी सक्रिय हो जाते हैं, जो सीधे बौर और छोटे फलों को नुकसान पहुंचाते हैं.” किसानों के लिए यह स्थिति दोहरी मार जैसी है. अगर वे कीटनाशकों का ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, तो मित्र कीट- जैसे मधुमक्खियां- प्रभावित होती हैं, जो परागण के लिए जरूरी हैं. और अगर छिड़काव कम करते हैं, तो रोग और कीट फसल को नुकसान पहुंचाते हैं. 

विशेषज्ञों के मुताबिक, इस बार एक बड़ी समस्या परागण करने वाले जीवों की कमी भी है. मधुमक्खियों और अन्य कीटों की गतिविधि कम होने से प्राकृतिक परागण प्रभावित हुआ है. पी.के. शुक्ला बताते हैं, “मित्र कीटों की कमी से फल बनने की प्रक्रिया पर सीधा असर पड़ा है. मौसम का असंतुलन और कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, दोनों इसके लिए जिम्मेदार हैं.” यह एक ऐसा संकट है, जो दिखाई नहीं देता, लेकिन इसका असर पूरे उत्पादन चक्र पर पड़ता है. कई बागों में फूल तो हैं, लेकिन वे फल में तब्दील नहीं हो पा रहे.

बाग प्रबंधन की खामियां भी आईं सामने

इस पूरे संकट के बीच बागों के प्रबंधन पर भी सवाल उठ रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि मलिहाबाद क्षेत्र में पारंपरिक तरीकों से खेती अब चुनौती बन रही है. शैलेंद्र राजन कहते हैं, “पेड़ों की छंटाई, कैनोपी मैनेजमेंट और पोषण प्रबंधन पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश और बाराबंकी में इन तकनीकों का बेहतर इस्तेमाल हो रहा है, जिससे वहां उत्पादकता ज्यादा है.” कई बागों में पेड़ बहुत घने हो चुके हैं, जिससे हवा और धूप का सही प्रवाह नहीं हो पाता. इसका असर सीधे फूलों और फलों की गुणवत्ता पर पड़ता है. 

मलिहाबाद में करीब 30 हजार हेक्टेयर में आम की खेती होती है और पिछले साल यहां करीब 1.25 लाख मीट्रिक टन उत्पादन हुआ था. लेकिन इस बार हालात को देखते हुए उत्पादन में गिरावट की आशंका जताई जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मौसम जल्दी स्थिर नहीं हुआ, तो न सिर्फ उत्पादन घटेगा, बल्कि फलों की गुणवत्ता भी प्रभावित होगी. छोटे आकार, कम मिठास और दाग-धब्बों वाले फल बाजार में कम कीमत पर बिकते हैं, जिससे किसानों को नुकसान होता है. 

निर्यात पर मंडराता संकट : ईरान युद्ध का असर

मौसम की मार के साथ-साथ इस बार एक और बड़ा संकट सामने है- अंतरराष्ट्रीय हालात. पश्चिम एशिया में जारी तनाव, खासकर ईरान से जुड़े घटनाक्रम, ने निर्यात को लेकर चिंता बढ़ा दी है. मलिहाबाद का दशहरी आम अब सिर्फ स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है. पिछले कुछ सालों में इसका निर्यात तेजी से बढ़ा है. दुबई, अमेरिका और यूरोप के बाजारों में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है. 

पिछले वर्ष जून में आम के सीजन के दौरान उत्तर प्रदेश का मलिहाबादी दशहरी अब सीधे दुबई की बाजारों भेजा गया था. उद्यान, कृषि विपणन व कृषि निर्यात राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिनेश प्रताप सिंह ने रहमानखेड़ा स्थित मैंगो पैक हाउस से 1200 किलोग्राम दशहरी आम के पहले अंतरराष्ट्रीय कन्साइनमेंट को हरी झंडी दिखाकर दुबई रवाना किया था. यह पहला मौका था जब यूपी के एफपीओ (किसान उत्पादक संगठन) को सीधे विदेश से ऑर्डर मिला था. इस खेप का मूल्य 2992 अमेरिकी डॉलर यानी लगभग ₹2.5 लाख रुपए था. 

अब इस वर्ष इस व्यापार पर खाड़ी युद्ध की काली छाया मंडरा रही है. ईरान युद्ध के लंबा खिंचने का असर मलिहाबाद के दशहरी आम के विदेशी व्यापार पर दिख सकता है. पुणे के निर्यातक अभिजीत भोंसले, जो पिछले 15 साल से आम का निर्यात कर रहे हैं, कहते हैं, “अंतरराष्ट्रीय बाजार बहुत संवेदनशील होता है. युद्ध या तनाव का सीधा असर एयर कार्गो, शिपिंग और मांग पर पड़ता है. अगर स्थिति बिगड़ती है, तो निर्यात कम हो सकता है.” वे बताते हैं कि पिछले साल भारत से 3000-3200 मीट्रिक टन आम का निर्यात हुआ था, लेकिन इस बार अनिश्चितता ज्यादा है. अगर निर्यात घटता है, तो इसका असर घरेलू बाजार पर भी पड़ेगा. ज्यादा आपूर्ति से कीमतें गिर सकती हैं, जिससे किसानों को नुकसान होगा. वहीं अगर उत्पादन भी कम हुआ, तो कीमतें बढ़ सकती हैं लेकिन इसका फायदा किसानों तक कितना पहुंचेगा, यह सवाल बना रहेगा.

मलिहाबाद का दशहरी आम सिर्फ एक फसल नहीं, बल्कि एक ब्रांड है, जिसे जीआई टैग मिला हुआ है. इसकी खास पहचान इसके स्वाद, खुशबू और गुणवत्ता से जुड़ी है. लेकिन अगर लगातार मौसम और प्रबंधन की समस्याएं बनी रहीं, तो इस पहचान पर भी असर पड़ सकता है. फिलहाल मलिहाबाद के बागों में इस वक्त सिर्फ आम नहीं पक रहे, बल्कि उम्मीद और चिंता का मिश्रण भी पल रहा है. आने वाले हफ्ते तय करेंगे कि इस बार यह ‘मीठा सोना’ किसानों के लिए कितनी मिठास लेकर आता है और दुनिया के बाजारों में अपनी चमक कितनी बरकरार रख पाता है.

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