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विदेशी मछलियों से देसी प्रजातियों को बचाने के लिए बनाया अनोखा प्लान!

महाराष्ट्र सरकार उजनी बांध जलाशय में दक्कन महसीर जैसी देशी मीठे पानी की मछली प्रजातियों के पालन को बढ़ावा देना चाहती है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 15 मई , 2026

महाराष्ट्र सरकार ने उजनी बांध जलाशय से अफ्रीकी कैटफिश, तिलापिया और सकरमाउथ कैटफिश जैसी विदेशी (आक्रामक) मछलियों को हटाने का फैसला लिया है. इनकी जगह दक्कन महसीर जैसी देशी मीठे पानी की मछली प्रजातियों के पालन और संरक्षण को बढ़ावा दिया जाएगा.

किसी पारिस्थितिकी तंत्र से आक्रामक मछली प्रजातियों को हटाने का यह महाराष्ट्र सरकार का पहला बड़ा प्रयास है. सोलापुर जिले में भीमा नदी पर स्थित उजनी बांध की कुल भंडारण क्षमता 117 TMC (हजार मिलियन घन फीट) है. यह घरेलू उपयोग और सिंचाई के लिए पानी का एक प्रमुख स्रोत है.

उजनी बांध के बैकवाटर में भिगवण पक्षी अभयारण्य है और यह भी काफी प्रसिद्ध जगह है. यह पूरा जलाशय मछली का एक प्रमुख स्रोत भी है. हालांकि, बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) के अध्ययनों से पता चला है कि सीवेज और रासायनिक कचरे के कारण बांध के पानी की गुणवत्ता में काफी गिरावट आई है.

साथ ही, इस क्षेत्र में तिलापिया, अफ्रीकन कैटफिश और सकरमाउथ कैटफिश जैसी आक्रामक विदेशी मछली प्रजातियों की मौजूदगी से स्थानीय मछली प्रजातियां बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं. इनमें कोवरा शिवदा, शेंगल, सुम्भर, वलंज, सलात, फेख, अम्बाली, गुगली, शिलान और अहेर जैसी देशी मछली प्रजातियां शामिल हैं. इन देशी मछलियों के प्रभावित होने के कारण स्थानीय मछुआरों की आजीविका संकट में है.

सकरमाउथ मछली एक एक्वैरियम प्रजाति है. यानी इसे किसी ने घर के एक्वेरियम में रखा होगा और धीरे-धीरे किसी तरह से ये मछलियां यहां जलाशय में पहुंच गईं. वहीं, अफ्रीकी कैटफिश और तिलापिया को अंतर्देशीय मछली पालन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से जानबूझकर पानी में छोड़ा गया था. इन दोनों मछलियों की संख्या में भारी वृद्धि के कारण देशी मछलियों पर खतरा मंडराने लगा है.

इसकी बड़ी वजह यह है कि पपड़ीदार और कांटेदार शरीर वाली सकरमाउथ मछली बाजार में बेची-खरीदी नहीं जाती. यह एक शिकारी मछली के रूप में जानी जाती है जो अन्य मछलियों और उनके अंडों को खाती है.

सोलापुर जिले के कलेक्टर कार्तिकेयन एस. ने बताया कि बांध से विदेशी मछली प्रजातियों को हटाने और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करने के लिए एक परियोजना शुरू की गई है. उनके मुताबिक यह जरूरी है क्योंकि इनकी वजह से लगभग 85 फीसद देसी प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं.

कार्तिकेयन ने कहा, “आमतौर पर मछुआरे इन मछलियों को जाल में फंसने पर वापस पानी में फेंक देते हैं. हम मछुआरों के लिए एक ऐसा सेंटर तैयार कर रहे हैं, जहां वे इन मछलियों को जमा करा सकते हैं. इन मछलियों का उपयोग पोटेशियम से भरपूर मछली खाद बनाने में किया जाएगा.” जिला प्रशासन सोलापुर में महाराष्ट्र औद्योगिक विकास निगम (MIDC) क्षेत्र में उर्वरक इकाइयों को अपने उत्पादन संयंत्र स्थापित करने के लिए आमंत्रित कर रहा है.

दूसरे चरण में AI पर आधारित टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके आक्रामक मछली प्रजातियों को समाप्त किया जाएगा. यह तकनीक नॉर्वे से आयात की जाएगी. इसके बाद के चरणों में तिलापिया जैसी प्रजातियों को समाप्त करना और दक्कन महसीर को जलक्षेत्र में छोड़ना शामिल होगा. 'जल का बाघ' के नाम से प्रसिद्ध दक्कन महसीर दक्कन पठार की मूल मछली है. यह एक बहुमूल्य मछली है. इससे स्थानीय मछुआरों की आय में वृद्धि होने की उम्मीद है.

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