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महाराष्ट्र: शिंदे ने क्यों दी 'तांगा पलटने' की धमकी; फडणवीस से बढ़ रहे टकराव की क्या है असल वजह?

महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार में सबकुछ ठीक नहीं चल रहा. इसके संकेत उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के हालिया बयानों और सीएम देवेंद्र फडणवीस के फैसलों से देखने को मिलते हैं

एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस (फाइल फोटो)
एकनाथ शिंदे और देवेंद्र फडणवीस (फाइल फोटो)
अपडेटेड 24 फ़रवरी , 2025

फरवरी की 21 तारीख को महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे नागपुर पहुंचे थे. इस दौरान मीडिया से बातचीत में उपमुख्यमंत्री शिंदे ने कहा, “मैं एक कार्यकर्ता हूं, सामान्य कार्यकर्ता हूं. लेकिन बाला साहेब और दिघे साहेब का कार्यकर्ता हूं. सबको इस बारे में समझना चाहिए. 2022 में जब मुझे हल्के में लिया तो तांगा पलटी कर दिया था.”

शिवसेना नेता यहीं नहीं रुके. इसके आगे उन्होंने कहा, “तब हमने सरकार को बदल दिया और हम आम जनता की इच्छाओं की सरकार लाए. इसलिए मुझे हल्के में मत लेना, ये इशारा जिन्हें समझना है वे समझ लें.” इस बयान के बाद से ही मुख्यमंत्री फडणवीस और उपमुख्यमंत्री शिंदे के बीच टकराव की चर्चा तेज हो गई है.

क्या सच में महाराष्ट्र के इन दो बड़े नेताओं के बीच सबकुछ सही नहीं है, इस टकराव की क्या वजह है और सरकार की सेहत पर इसका कितना असर पड़ सकता है?

17 फरवरी को महाराष्ट्र के सीएम देवेंद्र फडणवीस ने एकनाथ शिंदे सरकार के एक और फैसले पर रोक लगा दी. मुख्यमंत्री फडणवीस ने किसानों के फसल को न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP पर खरीदे जाने वाली एजेंसियों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा है कि इन एजेंसियों का गलत तरीके से सिलेक्शन हुआ है. सरकार ने इसपर जांच करने और नई नीति तैयार बनाने के लिए एक 6 सदस्यों का पैनल बनाया है.

यह पहला मौका नहीं है, जब फडणवीस सरकार ने इस तरह का फैसला लिया है. इससे पहले भी अपने 4 बड़े फैसलों से सीएम फडणवीस ने शिंदे सरकार के फैसले को पलटने का काम किया था. माना जा रहा है कि इसके बाद से ही महाराष्ट्र के दोनों बड़े नेताओं के बीच टकराव की संभावना जताई जा रही है.

फडणवीस ने शिंदे सरकार के किन बड़े फैसलों को पलटा?

जालना खारपुडी परियोजना की जांच: ₹900 करोड़ की इस परियोजना को शिंदे सरकार के दौरान मंजूरी दी गई थी, वो अब रोक दी गई है. शिंदे द्वारा अनुमोदित जालना जिले की इस परियोजना पर अब मुख्यमंत्री फडणवीस ने जांच बिठा दी है. सिडको के प्रबंध निदेशक इस परियोजना की जांच कर रहे हैं. फडणवीस के इस फैसले के बाद शिवसेना और बीजेपी के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो गई है.  

शिंदे सरकार के 1310 बसों का कॉन्ट्रैक्ट भी रद्द किया: शिंदे सरकार के दौरान एक निजी कंपनी के साथ राज्य परिवहन निगम के लिए 1310 बसों का कॉन्ट्रैक्ट किया गया था. सरकार में आते ही सीएम फडणवीस ने शिंदे सरकार पर कुछ खास कॉन्ट्रैक्टर्स के लिए टेंडर प्रक्रिया में बदलाव करने का आरोप लगाया. इसकी वजह से राज्य परिवहन निगम को कम से कम 2000 करोड़ रुपये के नुकसान का अंदाजा था.

आरोप है कि एकनाथ शिंदे ने मुख्यमंत्री रहते अपने करीबी महाड के विधायक भरत गोगावले को निगम का अध्यक्ष बनाया था. भरत गोगावले ने 1310 बस कॉन्ट्रैक्ट पर लेने का निर्णय लिया था. लेकिन सीएम फडणवीस ने कॉन्ट्रैक्ट रद्द करने के साथ नए सिरे से और पारदर्शिता के साथ पूरी प्रक्रिया फिर से शुरू करने का निर्देश​ दिया.

'शिवभोजन थाली' योजना की हो रही समीक्षा: मुख्यमंत्री बनने के बाद 26 जनवरी 2020 को एकनाथ शिंदे ने इस योजना की शुरुआत की थी. इस योजना के तहत 10 रुपये में दो चपाती, सब्जी, चावल और दाल के साथ पूर्ण भोजन की थाली दी जाती है. लॉन्च होने के बाद से ही इसके मेनू में कोई बदलाव नहीं किया गया है. स्थानीय कैंटीन ठेकेदार यह तय कर सकता है कि थाली में कौन सी सब्जी परोसी जाए. शुरुआत में शिवभोजन थालियों की संख्या दो लाख रखी गई थी. शिंदे सरकार ने जल्द ही इसे बढ़ाकर प्रतिदिन 10 लाख करने का प्रस्ताव अधिकारियों से मांगा था. अब देवेंद्र फडणवीस की सरकार इस योजना की समीक्षा कर रही है.

'आनंदाचा शिधा' राशन योजना: महाराष्ट्र की शिंदे सरकार ने राज्य के उन 14 जिलों में गरीबी रेखा से नीचे और नारंगी कार्ड धारकों को 'आनंद शिधा' योजना के तहत राशन देने का फैसला किया था, जहां ज्यादा किसान आत्महत्याएं हुई हैं.

इस योजना के तहत 1.66 करोड़ लाभार्थियों को गणपति उत्सव के लिए और दीवाली के लिए अलग से एक किलो रवा, चना दाल और चीनी और एक लीटर खाद्य तेल के साथ प्रति किलो 100 रुपए देने का प्रावधान था. अब फडणवीस सरकार इस योजना की भी समीक्षा कर रही है. फडणवीस सरकार अगर इन दोनों योजनाओं को बंद कर देती है तो सरकारी खजाने पर 500 करोड़ रुपये का बोझ कम हो जाएगा.

ये वो चार फैसले हैं, जिसकी वजह से महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे के बीच तकरार बढ़ने की संभावना जताई जा रही है.

वो संकेत जो दोनों नेताओं के बीच बढ़ते टकराव की ओर इशारा कर रहा..

हालांकि, देवेंद्र फडणवीस और शिंदे दोनों ने अपने बीच किसी भी तरह के मतभेद से इनकार किया है. इसके बावजूद पांच वजहें दोनों के बीच बढ़ रहे टकराव की ओर इशारा कर रहे हैं..
1. मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर तारीख पर तारीख: विधानसभा के शीतकालीन सत्र से पहले एकनाथ शिंदे से मंत्रिमंडल विस्तार की बात कही गई थी. हालांकि, तारीख पर तारीख देने के बावजूद मंत्रिमंडल विस्तार नहीं हो रहा है. सूत्रों का कहना है कि मंत्रिमंडल विस्तार और पोर्टफोलियो के बंटवारे पर हो रही देरी  सहयोगियों के बीच बढ़ते तनाव की ओर इशारा करती है.

2. रायगढ़ और नासिक जिले में संरक्षक मंत्रियों की नियुक्ति तक नहीं: NCP विधायक अदिति तटकरे और भाजपा नेता गिरीश महाजन की क्रमश: रायगढ़ और नासिक के संरक्षक मंत्री के रूप में नियुक्ति से शिवसेना नाराज थी. टकराव बढ़ने पर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इन दोनों नियुक्तियों को रोक लगा दी और अब तक इन दोनों जिलों में संरक्षक मंत्री नहीं नियुक्ति हुई है.

3. फडणवीस और शिंदे का अलग-अलग वॉर रूम: मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने राज्य की प्रमुख परियोजनाओं की निगरानी के लिए 'वॉर रूम' बनाया. इसके समांतर फडणवीस के अलावा उनके दोनों डिप्टी सीएम- अजीत पवार और एकनाथ शिंदे ने भी परियोजनाओं पर नजर रखने के लिए अपने अलग वॉर रूम स्थापित किए हैं. आपसी टकराव की वजह से ही एक की जगह अब तीन-तीन वॉर रूम से कामकाज की निगरानी रखी जा रही है.

4. फडणवीस की मीटिंग में शामिल नहीं हुए एकनाथ शिंदे: 2027 में गोदावरी नदी के किनारे नासिक में कुंभ मेला लगना है. इसकी तैयारियों पर चर्चा के लिए सीएम फडणवीस ने नासिक क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण (एनआरडीए) सहित बाकी अधिकारियों और मंत्रियों के साथ बैठक की. शिंदे इन बैठकों से दूर रहे.

5. शिवसेना विधायकों की सुरक्षा घटाई गई: राज्य पुलिस ने थ्रेट परसेप्शन एनालिसिस की और इसके बाद 20 शिवसेना विधायकों की सुरक्षा कम कर दी गई और कुछ की हटा ली है. पुलिस ने फडणवीस सरकार से अनुमति लेने के बाद ही ये फैसला लिया है.

इस टकराव से महाराष्ट्र सरकार की सेहत पर कितना असर पड़ेगा?

पॉलिटिकल एक्सपर्ट रशीद किदवई के मुताबिक महाराष्ट्र विधानसभा में कुल 288 सीटें (बहुमत के लिए 145) हैं. इनमें से 132 सीटों पर बीजेपी को जीत मिली है, जबकि 57 पर एकनाथ शिंदे की शिवसेना और 41 पर अजित पवार की NCP को जीत मिली है. ऐसे में साफ है कि भले ही तकरार कितना भी बढ़ जाए, लेकिन सरकार की सेहत पर ज्यादा असर नहीं पड़ने वाला है.

अगर इसी तरह दोनों बड़े नेताओं के बीच तकरार जारी रहा तो जनता के बीच इसका गलत मैसेज जाएगा. 5 साल बाद महायुती को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है. शिंदे का ये कहना कि पहले भी हमने तांगा पलटा है, ये दोनों के बीच बड़े टकराव को दिखाता है. तांगे में तीन पहिए होते हैं और इस सरकार में बीजेपी, NCP और शिवसेना तीनों दल शामिल हैं. इस टकराव को रोका नहीं गया तो सरकार चलाने में मुश्किलें होंगी और इससे जनता का नुकसान होगा.

अब देखने वाली बात ये है कि बीजेपी आलाकमान इसमें दखल देता या नहीं. दूसरे राज्यों में इस तरह के टकराव को रोकने के लिए बीजेपी एक नेता को केंद्र में ले आती है. हालांकि, देखने वाली बात ये होगी कि बीजेपी इस फॉर्मूला से महाराष्ट्र में अपने ही घर में जारी ये सियासी लड़ाई रोक पाती है या नहीं.
 

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