उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में आत्महत्या के ताजा आंकड़ों ने एक ऐसे सामाजिक संकट की ओर इशारा किया है, जिसे लंबे समय तक निजी मामला मानकर नजरअंदाज किया जाता रहा. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के 2024 के शहर-वार आंकड़ों के मुताबिक, शहर में शादी से जुड़े कारणों के चलते आत्महत्या के मामलों में सबसे बड़ा कारण ‘शादी का तय न होना (Non-settlement of marriage)’ रहा.
इस श्रेणी में अकेले 75 लोगों ने आत्महत्या की, जिनमें 46 पुरुष और 29 महिलाएं शामिल थीं. यह यूपी के किसी भी शहर में शादी से जुड़ी आत्महत्याओं की श्रेणियों में यह आंकड़ा सबसे ज्यादा था. खास बात यह भी है कि आत्महत्या करने वालों में पुरुषों की संख्या महिलाओं की तुलना में कहीं ज्यादा है.
यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि तेजी से बदलते शहरी समाज में रिश्तों, पारिवारिक अपेक्षाओं और मानसिक दबावों की जटिल तस्वीर है. विशेषज्ञों का मानना है कि शादी अब सिर्फ सामाजिक संस्था नहीं रह गई बल्कि प्रतिष्ठा, आर्थिक स्थिति, भावनात्मक सुरक्षा और पारिवारिक दबावों का ऐसा मिश्रण बन चुकी है जिसमें असफलता कई लोगों को मानसिक रूप से तोड़ रही है.
लखनऊ में 2024 में कुल 389 आत्महत्या के मामले दर्ज हुए. देश के 53 बड़े शहरों में यह संख्या लखनऊ को 20वें स्थान पर रखती है. हालांकि प्रति एक लाख आबादी पर आत्महत्या की दर 13.4 रही जो राष्ट्रीय शहरी औसत 16.3 से कम है, लेकिन शादी और रिश्तों से जुड़े कारणों का बढ़ता अनुपात विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय बन गया है.
‘शादी का तय न होना’ आखिर क्यों बन रहा जानलेवा?
NCRB की श्रेणी ‘Non-settlement of marriage’ उन परिस्थितियों को दर्शाती है जब तय रिश्ते टूट जाते हैं, शादी टल जाती है, या लंबे समय तक विवाह न होने के कारण व्यक्ति मानसिक दबाव में आ जाता है. मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, उत्तर भारतीय समाज में शादी को अब भी व्यक्ति की 'सामाजिक सफलता' से जोड़कर देखा जाता है. खासकर युवाओं पर यह दबाव बहुत अधिक होता है कि एक निश्चित उम्र तक उनका विवाह हो जाए. जब ऐसा नहीं होता तो व्यक्ति खुद को असफल, अपमानित या अस्वीकृत महसूस करने लगता है.
क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. देवाशीष शुक्ल कहते हैं कि लखनऊ जैसे शहरों में पारंपरिक सोच और आधुनिक जीवनशैली के बीच टकराव तेजी से बढ़ा है. एक ओर युवा अपने करियर, व्यक्तिगत पसंद और स्वतंत्रता को महत्व दे रहे हैं, दूसरी ओर परिवार अब भी जाति, आर्थिक स्थिति और सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर रिश्ते तय करना चाहते हैं. जब इन दोनों के बीच संतुलन नहीं बनता, तो भावनात्मक तनाव गहरा हो जाता है. उनके अनुसार, कई मामलों में रिश्ता टूटना केवल निजी असफलता नहीं माना जाता बल्कि परिवार और समाज की नजर में 'अपमान' की तरह देखा जाता है. यही सामाजिक शर्म कई युवाओं को अवसाद की ओर धकेल देती है.
पुरुषों में ज्यादा मामले क्यों?
डेटा यह भी दिखाता है कि शादी से जुड़े व्यापक विवादों में पुरुषों की हिस्सेदारी अधिक रही. ‘शादी का तय न होना’ श्रेणी में भी पुरुषों की संख्या महिलाओं से ज्यादा है. समाजशास्त्रियों का कहना है कि भारतीय समाज में पुरुषों से आर्थिक स्थिरता, करियर सफलता और परिवार चलाने की क्षमता की अपेक्षा की जाती है.
बेरोजगारी या आर्थिक अस्थिरता के दौर में जब शादी टूटती है या रिश्ता तय नहीं होता तो पुरुष खुद को असफल मानने लगते हैं. लखनऊ विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग से जुड़े विश्लेषक प्रो. पी. के मिश्र के मुताबिक, “उत्तर भारत में विवाह केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि सामाजिक दर्जे का प्रतीक भी है. कई बार नौकरी, वेतन, घर और सामाजिक स्थिति को लेकर दबाव इतना अधिक होता है कि युवक खुद को लगातार तुलना और अस्वीकृति के दौर में पाता है.” वे बताते हैं कि डिजिटल मैट्रिमोनियल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया ने भी इस दबाव को बढ़ाया है. लगातार तुलना, बार-बार रिश्ते टूटना और ऑनलाइन रिजेक्शन युवाओं में आत्मसम्मान की गंभीर समस्या पैदा कर रहा है.
महिलाओं पर अलग तरह का दबाव
हालांकि कुल मामलों में पुरुष अधिक हैं लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि महिलाओं की मानसिक पीड़ा अलग रूप में सामने आती है. महिला मनोचिकित्सक डॉ. नीलिमा सक्सेना कहती हैं कि कई युवतियां शादी न होने को लेकर परिवार और रिश्तेदारों के लगातार सवालों का सामना करती हैं. 'उम्र निकल रही है', 'अब रिश्ता मुश्किल होगा' जैसी बातें लंबे समय तक सुनना मानसिक आघात बन जाता है.
कई मामलों में लड़कियों पर समझौता करने का दबाव डाला जाता है. रिश्ते टूटने पर उन्हें दोषी ठहराया जाता है, जिससे आत्मग्लानि और अवसाद बढ़ता है. विशेषज्ञों का कहना है कि महिलाओं में भावनात्मक शोषण और सामाजिक दबाव अक्सर दिखाई नहीं देता लेकिन उसका असर बेहद गंभीर होता है.
NCRB डेटा के मुताबिक, लखनऊ में 'शादी से जुड़े अन्य मुद्दों' के तहत 60 आत्महत्याएं दर्ज हुईं. विवाहेतर संबंधों से जुड़े मामलों में 10 मौतें हुईं जबकि तलाक से जुड़े कारणों से दो लोगों ने आत्महत्या की. यह संकेत है कि शहरी रिश्तों में भावनात्मक अस्थिरता बढ़ रही है. मनोचिकित्सकों के अनुसार, आज के शहरी जीवन में रिश्तों से जुड़ी अपेक्षाएं बहुत बढ़ गई हैं लेकिन संवाद और भावनात्मक सहनशीलता कम हो रही है. विशेषज्ञों का कहना है कि कई लोग रिश्तों को अपनी पूरी पहचान बना लेते हैं. जब रिश्ता टूटता है तो उन्हें जीवन निरर्थक लगने लगता है. यही स्थिति आत्मघाती विचारों को जन्म देती है.
क्या शहरों में अकेलापन बढ़ रहा है?
मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि शहरीकरण ने लोगों को भौतिक रूप से करीब लेकिन भावनात्मक रूप से दूर कर दिया है. पहले संयुक्त परिवारों और सामाजिक नेटवर्क में लोगों को भावनात्मक सहारा मिल जाता था. अब युवा नौकरी, पढ़ाई या करियर के कारण अकेले रह रहे हैं. सोशल मीडिया पर 'परफेक्ट लाइफ' देखने के बाद वे अपनी जिंदगी को और ज्यादा असफल महसूस करने लगते हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक, अवसाद और चिंता के शुरुआती संकेतों को परिवार अक्सर 'कमजोरी' या 'ओवररिएक्शन' कहकर टाल देते हैं. इसी वजह से कई लोग समय पर मदद नहीं ले पाते.
हालांकि लखनऊ में आत्महत्या की दर कई बड़े शहरों से कम है लेकिन उत्तर भारत के अन्य शहरों की तुलना में संख्या काफी अधिक है. मेरठ में 73, गाजियाबाद में 122, पटना में 90 और श्रीनगर में 40 आत्महत्याएं दर्ज हुईं, जबकि लखनऊ में यह संख्या 389 रही. उत्तर प्रदेश के शहरों में कानपुर 687 मामलों के साथ सबसे ऊपर रहा. विशेषज्ञ मानते हैं कि बड़े शहरों में मानसिक स्वास्थ्य संकट अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहा. अर्ध-शहरी और तेजी से विकसित हो रहे शहरों में भी सामाजिक बदलावों का दबाव तेजी से दिखाई दे रहा है.
रोकथाम के लिए क्या किया जाना चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि आत्महत्या को केवल कानून-व्यवस्था या व्यक्तिगत विफलता का मामला मानना गलत होगा. इसके लिए बहुस्तरीय सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य रणनीति की जरूरत है. मनोवैज्ञानिक रमेश अवस्थी के मुताबिक सरकारी अस्पतालों, कॉलेजों और सामुदायिक केंद्रों में काउंसलिंग सेवाओं को बढ़ाना जरूरी है. मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की संख्या अभी बेहद कम है.
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि परिवारों को शादी को 'प्रतिष्ठा' की बजाय व्यक्तिगत निर्णय के रूप में स्वीकार करना होगा. युवाओं पर लगातार दबाव डालना खतरनाक साबित हो सकता है. इसके अलावा भावनात्मक स्वास्थ्य, रिश्तों में असफलता और तनाव प्रबंधन पर नियमित सत्र आयोजित किए जाने चाहिए ताकि युवा मानसिक दबाव से निपटना सीख सकें. विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल दुनिया में तुलना और रिजेक्शन मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहे हैं. युवाओं को ऑनलाइन और वास्तविक जीवन के अंतर को समझाने की जरूरत है. यहीं नहीं मानसिक संकट से गुजर रहे लोगों के लिए 24 घंटे हेल्पलाइन और त्वरित काउंसलिंग सेवाएं उपलब्ध कराना जरूरी है. कई लोग सिर्फ इसलिए मदद नहीं लेते क्योंकि उन्हें पता नहीं होता कि कहां जाएं.

