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लखनऊ में ‘दो लाख घुसपैठिए’ लेकिन मिलता एक भी नहीं!

डेढ़ साल से चल रहे सत्यापन अभियानों, झुग्गियों पर छापों और राजनीतिक दावों के बावजूद लखनऊ पुलिस अब तक एक भी पक्के अवैध बांग्लादेशी नागरिक की पहचान नहीं कर सकी है

Lucknow mayor Sushma Kharakwal
लखनऊ की मेयर सुषमा खर्कवाल झुग्गी-झोपड़ियों का निरीक्षण करती हुईं
अपडेटेड 12 मई , 2026

लखनऊ में ‘दो लाख अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या’ होने का दावा पिछले डेढ़ साल से राजनीतिक और प्रशासनिक बातचीत का हिस्सा बना हुआ है. लेकिन सवाल अब भी वहीं खड़ा है कि अगर राजधानी में इतनी बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी मौजूद हैं तो फिर एक भी ‘पक्का’ बांग्लादेशी अब तक क्यों नहीं मिला? यही वह सवाल है जो हाल के महीनों में नगर निगम, पुलिस और स्थानीय राजनीति के बीच सबसे बड़ा विरोधाभास बनकर उभरा है.

9 मई की सुबह जब मेयर सुषमा खर्कवाल निशातगंज पेपर मिल कॉलोनी के पास बनी झुग्गियों में पहुंचीं और वहां रह रहे लोगों को एक हफ्ते के भीतर जगह खाली करने का निर्देश दिया तो एक बार फिर यह मुद्दा सुर्खियों में आ गया. मेयर ने बिजली कनेक्शनों की जांच कराने और अवैध पाए जाने पर कार्रवाई की चेतावनी भी दी.

लेकिन इस कार्रवाई के दौरान भी प्रशासन किसी ऐसे व्यक्ति की पहचान सार्वजनिक रूप से नहीं कर पाया जिसे आधिकारिक तौर पर अवैध बांग्लादेशी नागरिक कहा जा सके. असल में यही इस पूरे अभियान का सबसे बड़ा विरोधाभास है. जनवरी 2025 में जब मेयर ने पहली बार सार्वजनिक रूप से दावा किया था कि लखनऊ में करीब दो लाख अवैध बांग्लादेशी और रोहिंग्या रह रहे हैं तब यह बयान राजनीतिक रूप से बेहद असरदार साबित हुआ था.

इसके बाद पुलिस कमिश्नरेट, नगर निगम और स्थानीय प्रशासन ने शहर के कई इलाकों में लगातार सत्यापन अभियान चलाए. निशातगंज, ठाकुरगंज, गुडम्बा, ऐशबाग, दुबग्गा, इंदिरा नगर और मजदूर बस्तियों में रहने वाले लोगों के दस्तावेज खंगाले गए. सफाईकर्मियों की कॉलोनियों तक में जांच हुई. लेकिन महीनों की कार्रवाई के बावजूद पुलिस अब तक किसी बड़े नेटवर्क या संगठित अवैध बांग्लादेशी बस्ती का खुलासा नहीं कर सकी.

यही वजह है कि अब विपक्ष इस मुद्दे को ‘राजनीतिक नैरेटिव’ और ‘चुनावी ध्रुवीकरण’ से जोड़कर देखने लगा है. विपक्षी दलों का आरोप है कि प्रशासनिक कार्रवाई का बड़ा हिस्सा गरीब झुग्गीवासियों और प्रवासी मजदूरों पर केंद्रित है जबकि वास्तविक अवैध नागरिकों की पहचान को लेकर सरकार के पास ठोस आंकड़े नहीं हैं. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के स्थानीय नेताओं का कहना है कि अगर दो लाख लोगों का दावा किया गया था तो फिर इतने लंबे समय में एक भी प्रमाणित मामला सामने क्यों नहीं आया.

दूसरी तरफ नगर निगम के अधिकारियों का कहना है कि सत्यापन अभियान महज ‘रूटीन सुरक्षा प्रक्रिया’ का हिस्सा है और शहर में अवैध घुसपैठ को लेकर सतर्क रहना प्रशासन की जिम्मेदारी है. मेयर सुषमा खर्कवाल का कहना है कि उनकी भूमिका सिर्फ संदिग्ध इलाकों का निरीक्षण करने और नगर निगम से जुड़ी अनियमितताओं को देखने तक सीमित है. उनके मुताबिक, किसी व्यक्ति की नागरिकता की पुष्टि करना पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों का विषय है.

यही कारण है कि जब पत्रकारों द्वारा उनसे पूछा गया कि पिछले एक साल में एक भी अवैध बांग्लादेशी क्यों नहीं मिला तो उन्होंने सीधे कहा कि यह पुलिस का विषय है. उन्होंने यह भी कहा कि 9 मई का निरीक्षण किसी विशेष अभियान का हिस्सा नहीं था बल्कि वह इलाके से गुजर रही थीं और झुग्गियों को देखकर वहां चली गईं. लेकिन प्रशासनिक स्तर पर यह मामला इतना सरल नहीं दिखता.

पुलिस अधिकारियों का कहना है कि किसी व्यक्ति को ‘अवैध बांग्लादेशी’ साबित करना बेहद जटिल प्रक्रिया है. केवल भाषा, पहनावे या स्थानीय संदेह के आधार पर किसी को विदेशी घोषित नहीं किया जा सकता. इसके लिए दस्तावेजों की जांच, मूल निवास की पुष्टि, सीमा पार रिकॉर्ड और कई स्तरों की कानूनी प्रक्रिया जरूरी होती है. कई बार मजदूरों या कबाड़ बीनने वालों के पास वैध भारतीय दस्तावेज नहीं होते लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे विदेशी नागरिक हैं.

दरअसल, यही वह कानूनी पेच है जिसने लखनऊ में चल रहे अभियानों को राजनीतिक बयानबाजी और वास्तविक कार्रवाई के बीच फंसा दिया है. नगर निगम और स्थानीय नेताओं के बयान लगातार सुर्खियां बनाते हैं लेकिन जब मामला कानूनी पहचान तक पहुंचता है, तो प्रशासन बेहद सतर्क दिखाई देता है.
दिसंबर 2025 में गुडम्बा के फूलबाग इलाके में मेयर का निरीक्षण इसका बड़ा उदाहरण था. वहां करीब 70 परिवार झुग्गियों में रह रहे थे और उन पर बांग्लादेशी तथा रोहिंग्या होने का संदेह जताया गया था. कई दिनों तक सत्यापन चला लेकिन कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई. स्थानीय लोगों का कहना था कि इनमें ज्यादातर लोग पश्चिम बंगाल, असम और बिहार से आए मजदूर थे जो वर्षों से शहर में रहकर दिहाड़ी मजदूरी और कबाड़ का काम कर रहे हैं.

अब तक सामने आया सबसे चर्चित मामला दिसंबर 2025 में ठाकुरगंज से जुड़ा था जहां आतंकवाद निरोधक दस्ता यानी ATS ने एक महिला को कथित फर्जी पहचान पत्रों के साथ गिरफ्तार किया था. लेकिन वह मामला भी व्यापक ‘दो लाख अवैध बांग्लादेशियों’ के दावे को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं माना गया. पुलिस सूत्रों का कहना है कि फर्जी दस्तावेजों के मामले और विदेशी नागरिक होने के मामले अलग-अलग हैं. कई बार भारतीय नागरिक भी फर्जी पहचान पत्रों का इस्तेमाल करते पाए जाते हैं.

विशेषज्ञों के मुताबिक शहरी गरीब बस्तियों को ‘संदिग्ध’ बताना राजनीतिक रूप से आसान नैरेटिव बन जाता है क्योंकि इन इलाकों में रहने वाले लोगों के पास अक्सर स्थायी दस्तावेज, नियमित रोजगार या राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं होता. इससे सत्यापन अभियानों को ‘सुरक्षा कार्रवाई’ के रूप में प्रस्तुत करना सरल हो जाता है. हालांकि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे गरीब प्रवासी समुदायों में डर और असुरक्षा बढ़ती है.  राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मुद्दा स्थानीय निकाय राजनीति से भी जुड़ा है. नगर निगम लगातार शहर की झुग्गियों, अतिक्रमण और अवैध निर्माणों पर कार्रवाई को ‘सिटी मैनेजमेंट’ के तौर पर पेश करता है लेकिन जब इन्हें ‘अवैध बांग्लादेशी’ के मुद्दे से जोड़ा जाता है तो इसका राजनीतिक असर कई गुना बढ़ जाता है.

दिलचस्प यह भी है कि जिन इलाकों में बार-बार अभियान चलाए गए वहां बड़ी संख्या में पूर्वी भारत के प्रवासी मजदूर रहते हैं. बंगाली भाषा बोलने वाले कई मजदूरों को स्थानीय स्तर पर संदेह की नजर से देखा गया. सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि बंगाली बोलना या मुस्लिम होना किसी को बांग्लादेशी साबित नहीं करता लेकिन स्थानीय स्तर पर अक्सर यही धारणाएं जांच का आधार बन जाती हैं. लखनऊ नगर निगम के भीतर भी इस मुद्दे पर दो तरह की राय दिखाई देती है. कुछ अधिकारी मानते हैं कि झुग्गियों में रहने वाले लोगों का सत्यापन जरूरी है क्योंकि कई बार अपराधी तत्व भी ऐसे इलाकों में छिप जाते हैं. वहीं कुछ अधिकारी निजी तौर पर स्वीकार करते हैं कि ‘दो लाख’ जैसी संख्या का कोई आधिकारिक आधार कभी सार्वजनिक नहीं किया गया.

पुलिस की मुश्किल यह है कि अगर वह किसी को विदेशी घोषित करती है तो उसे अदालत और केंद्रीय एजेंसियों के सामने ठोस सबूत पेश करने पड़ते हैं. यही वजह है कि बड़े-बड़े दावों के बावजूद अब तक कार्रवाई अधिकतर दस्तावेज सत्यापन, बिजली कनेक्शन जांच और झुग्गियों को हटाने तक सीमित रही है.

फिलहाल स्थिति यह है कि शहर में अभियान जारी हैं झुग्गियों में रहने वाले लोग लगातार सत्यापन और बेदखली के डर में जी रहे हैं और राजनीतिक बयानबाजी भी जारी है. लेकिन प्रशासनिक रिकॉर्ड अब भी उसी बुनियादी सवाल का स्पष्ट जवाब नहीं दे पा रहे कि आखिर लखनऊ में कथित ‘दो लाख अवैध बांग्लादेशी’ हैं कहां?

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