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पटना में रसोई गैस की किल्लत से परेशान हजारों छात्र घर लौटने को मजबूर

पटना में अलग-अलग प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग के लिए दो से ढाई लाख स्टूडेंट रहते हैं

Cooking gas shortage in Patna
पटना में रसोई गैस की किल्लत के चलते गैस एजेंसी काउंटरों के सामने लाइनें दिख रही हैं
अपडेटेड 13 मार्च , 2026

पिछले दो-तीन दिन से राजधानी पटना के मुसल्लहपुर हाट मोहल्ले में भारी बेचैनी दिख रही है. “हमारे मोहल्ले से कई लड़के पटना छोड़कर घर लौट गए हैं. हमारे जैसे कुछ लोग जो बचे हैं, वे इसलिए बचे हैं क्योंकि हमारे सिलिंडर में गैस बची है. संयोग है कि हमने होली से पहले ही गैस भरवा लिया था.” इस मोहल्ले के एक कमरे में किराए पर रहने वाले अभयानंद पाठक इन दिनों LPG गैस की किल्लत के बारे में पूछने पर यह बात कहते हैं.

दरभंगा के अभयानंद पिछले तीन साल से पटना में रहकर बीपीएससी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं. निम्न मध्यवर्गीय परिवार के अभयानंद इस महंगाई के दौर में सिर्फ साढ़े पांच हजार रुपए में पूरा महीना गुजार देते हैं. वे अपना हिसाब उंगलियों पर गिनाते हैं, “2700 रुपए कमरे का किराया. एक हजार रुपए खाने-पीने का और फिर नेट रिचार्ज, किताब-कॉपी और दूसरे खर्चे.”

“एक हजार रुपए में पूरे महीने का खाना हो जाता है?” इस सवाल पर अभयानंद कहते हैं, “हां, इसलिए कि महीने में सिर्फ तीन किलो गैस खर्च होती है, जो 90-95 रुपए प्रति किलो की दर से मिल जाती है. मगर अब जो गैस की किल्लत हुई है, उससे एक तो हमारे इलाके में कहीं गैस मिल नहीं रही और जहां मिल भी रही है, वहां रेट 350 रुपए प्रति किलो तक चला गया है.”
इसी लॉज में रहने वाले एक छात्र अजीत बताते हैं कि वे पांच सौ रुपए प्रति किलो की दर से गैस भरवाकर कल ही लाए हैं.

दरअसल, ये छात्र अब तक एक छोटे से सिलिंडर में गैर-कानूनी तरीके से भरी जाने वाली गैस की मदद से खाना बनाते थे. अब पूरे भारत में घरेलू गैस की किल्लत के बीच इनका यह सहारा छिन गया है. इसलिए पटना में रहकर प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्र मजबूरन अपने घर लौट रहे हैं.

पटना के कॉलेज और कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई करने वाले छात्रों की अनुमानित संख्या ढाई लाख के करीब है. इनमें से बड़ी संख्या ऐसे छात्रों की है जो छोटे सिलिंडर में गैस भरवाकर खुद खाना पकाते हैं, क्योंकि इनकी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि ये टिफिन सर्विस ले सकें या किसी होटल या मेस में खाना खा सकें.

अभयानंद कहते हैं, “सस्ते से सस्ते मेस में खाना 2500 रुपए प्रति माह की दर से मिलता है. हम लोग एक हजार में दो वक्त का खाना और चाय भी मैनेज कर लेते हैं.” ऐसे में मौजूदा गैस किल्लत की सबसे बुरी मार ये छात्र झेल रहे हैं.

अभयानंद पाठक अपने कमरे में छोटे गैस सिलेंडर के साथ
अभयानंद पाठक अपने कमरे में छोटे गैस सिलेंडर के साथ

जहां सरकार घरेलू उपभोक्ताओं को गैस दिलवाने के प्रयास में है, वहीं इन छात्रों को गैस कब और कैसे मिलेगी, इसका कोई ठिकाना नहीं है. इसकी वजह यह है कि ये अवैध गैस सिलिंडर इस्तेमाल करते हैं और गैर-कानूनी वेंडरों से इसे भरवाते हैं.

राजधानी पटना के स्टूडेंट बहुल इलाकों में ऐसे कई दुकानदार हैं, जो बड़े घरेलू सिलिंडर से गैस निकालकर इन छोटे सिलिंडरों में रिफिल करते हैं. मगर इस वक्त बाजार समिति, मुसल्लहपुर हाट, महेंद्रू और छात्रों के किसी अन्य इलाके में ऐसे दुकानदार नहीं दिख रहे हैं. ये दुकानें बंद करके घर में बैठे हैं, क्योंकि सिलिंडर की कालाबाजारी रोकने के लिए पुलिस लगातार छापामारी कर रही है.

अभयानंद कहते हैं, “कल तक ये लोग चोरी-छिपे गैस रिफिल कर रहे थे, मगर कल किसी ने एक ऐसे दुकानदार का वीडियो बना लिया और फिर पता चला कि पुलिस उसे ढूंढ रही है. ऐसे में कल तक जो इस इलाके में 350 रुपए प्रति किलो गैस मिल रही थी, अब वह भी नहीं मिल रही. अब लोग स्टेशन, कंकड़बाग और दूसरे इलाकों में भटक रहे हैं.”

गैस रिफिलिंग बंद होने की स्थिति में कुछ छात्रों ने होटलों और मेस में खाना शुरू किया है, मगर मेस वाले भी इस बात की गारंटी नहीं दे रहे कि वे कब तक खाना दे पाएंगे. ऐसे ही एक छात्र रोहित, जो मेस में खाना खाते हैं, कहते हैं, “मेस वाले का कहना है कि जब तक चल रहा है, चल रहा है. कमर्शियल सिलिंडर की सप्लाई में भी काफी दिक्कत है.” दिक्कत यह भी है कि इन चक्करों में मेस वालों ने खाने का रेट बढ़ा दिया है.

रोहित बताते हैं, “बड़ी संख्या में स्टूडेंट घर लौट रहे हैं. इस इलाके में आप जो घूम रहे हैं, यह इतना सूना नहीं रहता था. यहां खूब भीड़ होती थी, लेकिन अभी तो लड़के ही नजर नहीं आते.” अभयानंद कहते हैं, “दिक्कत यह है कि यह परीक्षाओं का महीना है. ज्यादातर परीक्षाएं इन्हीं महीनों में होती हैं, फिर भी छात्रों को पटना छोड़कर जाना पड़ रहा है.”

“अवैध सिलिंडर क्यों? गैस एजेंसी वाले तो छोटे सिलिंडर का कनेक्शन भी देते हैं, वह क्यों नहीं लेते?” इस सवाल पर अभयानंद कहते हैं, “दरअसल गैस कनेक्शन के लिए आवासीय पते की जरूरत होती है, मगर कोई भी लॉज मालिक आपको अपने लॉज का आवासीय प्रमाणपत्र बनवाने नहीं देगा. वैसे भी स्टूडेंट यहां तीन-चार साल के लिए आते हैं और समय-समय पर कमरा बदलते रहते हैं. ऐसे में कोई क्यों लॉज के पते पर प्रमाणपत्र बनवाएगा. इसलिए ये छोटे सिलिंडर सबसे सहज हैं.”

“और इंडक्शन?”

“इसका भी वही कारण है. कोई लॉज मालिक आपको इंडक्शन चलाने नहीं देगा क्योंकि उससे बिजली बिल बढ़ेगा.”

अभयानंद की बातों में पटना के ढाई लाख छात्रों की वह कहानी छिपी है, जिसके कारण वे अब तक अवैध छोटा सिलिंडर इस्तेमाल करते आए हैं. मगर मौजूदा गैस संकट उनकी इस सुविधा को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है. अगर संकट बढ़ा, तो पटना से छात्रों का बड़े पैमाने पर पलायन तय है. यह पलायन छात्रों को तो प्रभावित करेगा ही, इन मोहल्लों में छात्रों की वजह से आजीविका चला रहे हजारों लोगों के लिए भी संकट लाने वाला है.

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