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केरल में हार के साथ ही वाम मोर्चे के सामने खड़ी हुई नई मुसीबत!

केरल में वामपंथी कार्यकर्ता अपनी पार्टी से दूरी बना रहे हैं. वाम दलों को डर है कि कहीं इसी परिस्थिति का फायदा उठाकर BJP यहां अपनी पकड़ मजबूत करने में सफल न हो जाए

LDF घोषणा पत्र जारी करने के वक्त पिनाराई विजयन
LDF घोषणा पत्र जारी करने के वक्त पिनाराई विजयन
अपडेटेड 12 मई , 2026

करीब 50 साल में पहली बार देश के किसी भी राज्य में वामपंथी सरकार नहीं बची है. केरल में मिली करारी हार का गहरा असर पिनराई विजयन के नेतृत्व वाले वाम गठबंधन (LDF) पर साफ दिख रहा है.

2011 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने पश्चिम बंगाल में वामपंथियों को सत्ता से बेदखल कर दिया था और 2018 में BJP ने त्रिपुरा में सरकार बना ली थी. इसके बाद केवल केरल ही वाम दलों का अंतिम गढ़ बचा था.

इस बार इस राज्य के भी वामपंथी दलों के हाथ से निकल जाने के बाद अब पूरे देश में कहीं भी उनकी सरकार नहीं रही. केरल में 2016 से वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) लगातार दो कार्यकाल सत्ता में रहा लेकिन 2026 में उसे करारी हार का सामना करना पड़ा.

140 सदस्यीय विधानसभा में CPI(M) के नेतृत्व वाले LDF की सीटें घटकर मात्र 35 रह गईं, जो 2021 की तुलना में लगभग एक तिहाई हैं. LDF का वोट शेयर 37.64 फीसद रहा, जो पिछले चुनाव की तुलना में करीब 8 फीसद की गिरावट है. वहीं कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (UDF) को 102 सीटें और 46.54 फीसद वोट मिले.

बाकी तीन सीटें BJP को मिलीं. LDF की इस भारी हार के साथ ही वाम दलों के बचे हुए गढ़ों में भी सेंध लगने की आशंकाएं बढ़ गई हैं. एक दशक के शासन के बाद सत्ता-विरोधी लहर कोई आश्चर्य की बात नहीं थी. हालांकि, अल्पसंख्यक वोटों के कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF के पीछे एकजुट हो जाने से LDF को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा.

वामपंथी समर्थकों का मानना था कि हार के पीछे और भी गहरे कारण थे. तिरुवनंतपुरम की 54 वर्षीय सरिता मोहन ने कहा, “महिलाओं और युवाओं ने वामपंथी सरकार के सत्ता में आने के बाद बढ़े अहंकार के कारण उनके खिलाफ मतदान किया.”

सरिता का इशारा पिछले साल विजयन सरकार के ASHA स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के विरोध प्रदर्शन को संभालने के तरीके की ओर था. ये कार्यकर्ता अधिक वेतन और अन्य लाभों की मांग कर रहे थे. सरिता ने आगे कहा कि सरकार की असंवेदनशीलता तब साफ दिखी, जब मुख्यमंत्री ने सचिवालय के ठीक सामने महीनों से चल रहे आंदोलन को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया.

केरल आशा स्वास्थ्य कार्यकर्ता संघ ने एक बयान में कहा कि LDF की हार में सरकार की श्रमिक-विरोधी नीतियों का भी बड़ा योगदान रहा. यहां तक कि CPI के राज्य सचिव बिनॉय विश्वम ने भी स्वीकार किया कि विजयन सरकार ने विरोध प्रदर्शन को गलत तरीके से संभाला.

CPI(M) को कई सीटों पर अपने ही बागी नेताओं से हार का सामना करना पड़ा. इनमें प्रमुख नाम हैं- टी.के. गोविंदन (तालीपरम्बा), वी. कुन्हीकृष्णन (पय्यानूर) और जी. सुधाकरन (अंबलप्पुझा). UDF के खुले समर्थन से चुनाव लड़ने वाले इन बागी नेताओं की जीत ने असंतुष्ट कार्यकर्ताओं और नेताओं को नियंत्रित करने में CPI(M) की संगठनात्मक अक्षमता को साफ उजागर कर दिया.

पूर्व लोकसभा सांसद और CPI(M) के पूर्व विधायक डॉ. सेबेस्टियन पॉल ने कहा, “LDF को कई कारणों से हार मिली. इनमें प्रमुख हैं- अति आत्मविश्वास, UDF को कम आंकना, कार्यकर्ताओं से जमीनी संबंधों का टूटना और सरकार व पार्टी के भीतर एक दशक के शासनकाल में विकसित हुई चाटुकारिता की संस्कृति."

कन्नूर और कोझिकोड की उत्तर और दक्षिण सीटों की तरह ही, वामपंथी दल कासरगोड जिले के त्रिकारीपुर में भी अपना गढ़ खो बैठा. वायनाड, मलप्पुरम, एर्नाकुलम, कोट्टायम और इडुक्की जिलों में LDF को एक भी सीट नहीं मिली. विजयन ने धर्मदम सीट 19,000 से अधिक वोटों से जीती लेकिन मतगणना के छह दौर में वह पीछे चल रहे थे.

वडाकारा के विधायक और भारतीय क्रांतिकारी मार्क्सवादी पार्टी के नेता केके रेमा ने कहा, “केरल में वामपंथी दल अपनी राजनीतिक चेतना खो चुके हैं और इसके लिए पिनराई विजयन जिम्मेदार हैं. उन्हें अपनी पार्टी के हित में सेवानिवृत्त हो जाना चाहिए.”

अपने गढ़ों में भी कार्यकर्ताओं की पार्टी से दूरी को देखते हुए, चुनाव के बाद केरल में वामपंथी दलों के सामने कई चिंताएं हैं. एक प्रमुख आशंका यह है कि उनका यह समर्थन आधार अब BJP को मजबूत कर सकता है, जिससे राज्य की दो दलीय राजनीति में बड़ा असर पड़ सकता है.

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