पिछले महीने जब राजस्थान के कृषि मंत्री किरोड़ी लाल मीणा ने बीज, खाद और कीटनाशक बनाने वाली फैक्ट्रियों, गोदामों और डीलरों पर अचानक छापेमारी शुरू की तो कृषि क्षेत्र से जुड़े कई लोग हैरान रह गए. जल्द ही इन छापों में वही बात सामने आने लगी जिसका किसानों को लंबे समय से शक था. बाजार में बिक रहे कृषि उत्पादों का एक बड़ा हिस्सा मिलावटी, घटिया या नकली था.
नकली कृषि उत्पादों के खिलाफ शुरू हुई यह कार्रवाई अब बड़े राजनीतिक विवाद में बदल गई है. राजस्थान के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो यानी ACB ने बीज कंपनियों के खिलाफ नियामकीय कार्रवाई से जुड़े कथित रिश्वतखोरी के एक रैकेट का खुलासा किया है. इस मामले ने विपक्ष के उन सवालों को फिर जिंदा कर दिया है कि क्या मंत्री का खुद छापेमारी करना उचित था और क्या किसानों की सुरक्षा के लिए बनी व्यवस्था में ही भ्रष्टाचार घुस चुका है.
नकली कृषि उत्पादों की छिपी कीमत
भारत में कृषि उत्पादकता पर होने वाली बहस आमतौर पर पुरानी खेती तकनीकों, बंटी हुई जोतों, अपर्याप्त सिंचाई और मशीनीकरण की कमी पर केंद्रित रहती है. लेकिन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग एक बड़ा सवाल यह भी है कि भारत में खेती की लगातार कमजोर उत्पादकता के लिए किसानों की खेती के तरीके ज्यादा जिम्मेदार हैं या फिर खराब गुणवत्ता वाले कृषि उत्पाद?
खपत और बाजार कीमतों के अनुमान के आधार पर राजस्थान के किसान हर साल बीज, खाद और कीटनाशकों पर करीब 6,100 करोड़ रुपए खर्च करते हैं. इसमें लगभग 3,200 करोड़ रुपए खाद पर, करीब 2,150 करोड़ रुपए बीज पर और लगभग 750 करोड़ रुपए कीटनाशकों पर खर्च होते हैं. अगर इन उत्पादों का थोड़ा-सा हिस्सा भी घटिया गुणवत्ता का हो तो इसके आर्थिक और कृषि दोनों स्तरों पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं.
जांच के दौरान अधिकारियों को कथित तौर पर ऐसी खाद मिली जिनमें संगमरमर की स्लरी, रेत, काली कपास वाली मिट्टी और यहां तक कि सीमेंट भी मिलाया गया था. ऐसी खाद ठीक से घुलती नहीं हैं और फसलों को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पाते. बीजों के नमूनों में कथित तौर पर सामान्य अनाज को पैक करके प्रमाणित बीज बताकर बेचा जा रहा था. इससे अंकुरण कमजोर हुआ और फसल की बढ़वार प्रभावित हुई. कीटनाशकों में भी कथित तौर पर सक्रिय रसायनों की मात्रा कम या रासायनिक संरचना मानकों के अनुरूप नहीं थी. इससे कीट और बीमारियों पर उनका असर घट गया.
एक निरीक्षण के दौरान मीणा ने दावा किया कि उनकी मौजूदगी में जांचे गए 57 में से 56 नमूने गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे. बाद में विभाग ने हजारों नमूनों की जांच की. इसमें बीज, खाद और कीटनाशकों के करीब 200 नमूने फेल पाए गए. इन निष्कर्षों से एक पुराने सवाल का जवाब मिल सकता है कि आखिर राजस्थान में फसल की पैदावार अब भी पीछे क्यों है?
राज्य की सख्त जलवायु का असर खेती पर पड़ना तय है. यहां 70 प्रतिशत से अधिक खेती वर्षा पर निर्भर है इसलिए कृषि काफी हद तक मानसून पर टिकी रहती है. लेकिन जलवायु की इन सीमाओं को ध्यान में रखने के बाद भी कई फसलों की पैदावार राष्ट्रीय औसत से काफी कम है.
राजस्थान में बाजरे की औसत पैदावार लगभग 400 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है जबकि राष्ट्रीय औसत करीब 1,558 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है. मक्का की उत्पादकता लगभग 1,100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है जबकि राष्ट्रीय औसत 3,800 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से अधिक है.
विशेषज्ञ आमतौर पर इस अंतर के लिए सूखा, मिट्टी की लवणता, भूजल की गुणवत्ता और तकनीकी सीमाओं को जिम्मेदार मानते हैं. लेकिन अगर किसान अनजाने में बेअसर खाद, घटिया बीज और मिलावटी कीटनाशक खरीद रहे हैं तो उत्पादकता का यह अंतर समझना आसान हो जाता है.
कार्रवाई से भ्रष्टाचार के आरोप तक
हालांकि अब यह अभियान भ्रष्टाचार के आरोपों में उलझ गया है. विवाद तब शुरू हुआ जब ACB ने उन आरोपों की जांच शुरू की कि नियामकीय निरीक्षण से जुड़े अधिकारी जांच के दायरे में आई कंपनियों से पैसे मांग रहे थे. जांच के बाद कई लोगों को गिरफ्तार किया गया. इनमें राजस्थान स्टेट सीड्स कॉरपोरेशन के नामित निदेशक जुगल किशोर बिश्नोई भी शामिल हैं.
जांचकर्ताओं के अनुसार यह मामला करीब 2.44 करोड़ रुपए के कथित रिश्वत नेटवर्क से जुड़ा है. ACB ने कथित तौर पर लूणकरणसर के पास जुगल किशोर बिश्नोई के भतीजे स्वतंत्र बिश्नोई से 85 लाख रुपए बरामद किए. इसके बाद हुई तलाशी में बिश्नोई के घर से 1.58 करोड़ रुपए नकद मिलने का भी दावा किया गया.
जांच एजेंसियों का आरोप है कि यह पैसा एक ऐसी बीज कंपनी के खिलाफ चल रही कार्रवाई को प्रभावित करने के लिए था, जिसके उत्पाद मिलावट विरोधी अभियान के दौरान जांच के दायरे में आए थे. ACB के अनुसार इसका मकसद कंपनी के पक्ष में प्रयोगशाला रिपोर्ट हासिल करना, करीब 15 करोड़ रुपए के जब्त माल को छुड़वाना और उसकी बिक्री दोबारा शुरू कराना था. इसके तुरंत बाद बिश्नोई को उनके पद से हटा दिया गया. अब जांच का दायरा बढ़ाकर अन्य संभावित लाभार्थियों और मददगारों की पहचान की जा रही है.
विपक्ष को मिला मुद्दा
कांग्रेस ने इस मामले को लेकर BJP सरकार पर हमला तेज कर दिया है. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पहले भी सवाल उठा चुके थे कि किसी मंत्री का खुद छापेमारी करना उचित नहीं है. उन्होंने इसे असामान्य और संभावित रूप से समस्याग्रस्त बताया था. ACB की गिरफ्तारी के बाद गहलोत ने फिर कहा कि इस तरह के तरीके अपनाने से मंशा और जवाबदेही दोनों पर स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा होता है.
विधानसभा में विपक्ष के नेता टीकाराम जूली इससे भी आगे गए. उन्होंने आरोप लगाया कि निरीक्षण का इस्तेमाल कारोबारियों में डर पैदा करने और बिचौलियों के जरिए बड़ी रकम वसूलने के लिए किया जा रहा था. उन्होंने सवाल उठाया कि क्या गिरफ्तार लोग ऊंचे स्तर के संरक्षण के बिना ऐसा कर सकते थे? वहीं राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा ने पूरे मामले की व्यापक और निष्पक्ष जांच की मांग की.
मीणा का बचाव
मीणा ने किसी भी तरह की गड़बड़ी में शामिल होने से साफ इनकार किया है. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर विपक्ष को चुनौती दी है कि अगर उनके भ्रष्टाचार में शामिल होने का एक भी सबूत मिल जाए तो वे उसी दिन इस्तीफा दे देंगे.
उनका कहना है कि छापेमारी में किसानों को नुकसान पहुंचाने वाली वास्तविक गड़बड़ियां सामने आईं. अगर निरीक्षण टीम के साथ गए अधिकारियों ने बाद में प्रयोगशाला रिपोर्ट में हेरफेर करने या जब्त माल छुड़वाने के लिए रिश्वत मांगी तो इसकी जिम्मेदारी उन्हीं अधिकारियों की है, न कि उस मंत्री की जिसने कार्रवाई शुरू की. मीणा का यह भी दावा है कि कम से कम एक मामले में उन्होंने खुद संदिग्ध गतिविधि की जानकारी अधिकारियों को दी थी जिसके बाद गिरफ्तारी हुई.
हालांकि इस पूरे विवाद ने एक अहम बात जरूर उजागर कर दी है. वर्षों से खेती की कम उत्पादकता को किसानों के व्यवहार की समस्या मानकर देखा जाता रहा है. लेकिन राजस्थान का अनुभव बताता है कि नीति-निर्माताओं को किसानों को बेचे जा रहे कृषि उत्पादों की गुणवत्ता और उसे बढ़ावा देने वाले कथित भ्रष्टाचार पर भी उतनी ही गंभीरता से ध्यान देना होगा.

