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किंतूर से तेहरान तक, यूपी की माटी में दर्ज ईरान की सियासी विरासत

बाराबंकी का किंतूर गांव खुद को खुमैनी-खामेनेई के वंश से जोड़ता है. ईरान में सियासी हलचल के बीच यहां इतिहास, भावनाएं और वैश्विक राजनीति एक साथ गूंज रही हैं

Iran Supreme Leader Ayatollah Ali Khamenei
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की खबर से बाराबंकी के किंतूर गांव में मातम का माहौल है (फाइल फोटो)
अपडेटेड 1 मार्च , 2026

लखनऊ से करीब 70 किलोमीटर दूर, घाघरा के किनारे बसा बाराबंकी का किंतूर गांव इन दिनों अचानक सुर्खियों में है. वजह सिर्फ पश्चिम एशिया की सियासत नहीं, बल्कि वह ऐतिहासिक धागा है जो इस छोटे से गांव को तेहरान की सत्ता के केंद्र से जोड़ता रहा है.

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की मौत की खबर जैसे ही इंटरनेट मीडिया के जरिये यहां पहुंची, गांव में गम का माहौल पसर गया. मस्जिदों में दुआएं हुईं, घरों में चर्चा छिड़ी और पुराने रिश्तों की याद ताजा हो गई.

किंतूर की तंग गलियों में अब सैयदवाड़ा के नाम से पहचाना जाने वाला इलाका सिमट चुका है. बुजुर्ग बताते हैं कि कभी यहां ‘मुसवी’ या ‘खुमैनी’ खानदान के सैकड़ों घर हुआ करते थे. आज गिनती के पांच से सात परिवार बचे हैं, लेकिन स्मृतियां वैसी ही जिंदा हैं. सत्तर पार कर चुके सैयद निहाल काजमी अपने ड्राइंग रूम की दीवार पर टंगी रूहोल्लाह अयातुल्लाह खुमैनी की तस्वीर की ओर इशारा करते हुए कहते हैं, “हमारा रिश्ता सिर्फ भावनात्मक नहीं, वंश परंपरा का है.” स्थानीय परंपरा और पारिवारिक दावों के मुताबिक, 19वीं सदी की शुरुआत में किंतूर के सैयद अहमद मुसवी ‘हिंदी’ यहां से इराक के नजफ और फिर ईरान के खुमैन शहर जा बसे. 

बाराबंकी के सैयद निहाल काजमी के घर पर लगी रूहोल्लाह अयातुल्लाह खुमैनी की तस्वीर
बाराबंकी के सैयद निहाल काजमी के घर पर लगी रूहोल्लाह अयातुल्लाह खुमैनी की तस्वीर

बताया जाता है कि 1830 के आसपास वह कर्बला की जियारत पर निकले और वहीं से ईरान में ठहर गए. खुमैन में बसने के बाद परिवार को ‘खुमैनी’ कहा जाने लगा; आगे चलकर इसी परिवार में 1902 में जन्मे रुहोल्लाह खुमैनी ने 1979 की इस्लामिक क्रांति का नेतृत्व किया और ईरान की सियासत की दिशा बदल दी.

1979 की क्रांति सिर्फ ईरान की सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं थी. यह उस वैचारिक उथल-पुथल का परिणाम थी जिसने शाह मोहम्मद रजा पहलवी के शासन को खत्म कर इस्लामिक गणराज्य की स्थापना की. खुमैनी इसके पहले सर्वोच्च नेता बने. 1989 में उनके निधन के बाद अली खामेनेई ने यह पद संभाला और तीन दशक से ज्यादा समय तक ईरान की नीतियों को दिशा दी. किंतूर के लोगों के लिए यह इतिहास किताबों की बात नहीं, घर-आंगन की कथा है. काजमी परिवार का दावा है कि उनके पुरखे निशापुर से भारत आए थे, फिर अवध में बसे और बाद में दोबारा ईरान लौटे. परिवार के लोग अपने नाम के साथ ‘हिंदी’ शब्द जोड़ते थे, जो भारतीय मूल की पहचान माना जाता है. 

बाराबंकी में खामेनेई के खानदान के सदस्य
बाराबंकी में खामेनेई की मौत की खबर से गमगीन उनके खानदान के सदस्य

स्थानीय इतिहासकार बताते हैं कि अवध का इलाका 18वीं और 19वीं सदी में शिया बौद्धिक परंपरा का बड़ा केंद्र था. लखनऊ की इमामबाड़ा संस्कृति और ताजियादारी परंपरा का असर आसपास के गांवों तक था. किंतूर भी उसी सांस्कृतिक पट्टी का हिस्सा रहा. आज किंतूर में बचे कुछ परिवार अपनी पुरानी हवेलियों, कब्रिस्तानों और दस्तावेजों को इस रिश्ते के प्रमाण के रूप में दिखाते हैं. हालांकि अकादमिक शोध में इन दावों की अलग-अलग व्याख्याएं मिलती हैं, लेकिन स्थानीय स्मृति की ताकत कम नहीं होती. गांव के बुजुर्गों के लिए यह इतिहास किताबों से ज्यादा भरोसेमंद है. 

आज जब पश्चिम एशिया की राजनीति अनिश्चित मोड़ पर खड़ी है, तब बाराबंकी का यह गांव अपने अतीत के सहारे वर्तमान को समझने की कोशिश कर रहा है. मस्जिदों में दुआएं हैं, घरों में इतिहास की बातें हैं और दिलों में एक अजीब सा द्वंद्व है. यह द्वंद्व स्थानीय और वैश्विक के बीच का है, जहां एक छोटा सा गांव खुद को विश्व राजनीति के नक्शे पर तलाशता है.

यूपी और ईरान का रिश्ता केवल बाराबंकी तक सीमित नहीं है. अगर नक्शे पर नजर डालें तो आगरा से लेकर लखनऊ तक कई ऐसे स्थल मिलेंगे जिनमें फारसी प्रभाव साफ दिखता है. मुगल काल में ईरान से आए विद्वान, कारीगर और दरबारी उत्तर भारत की सत्ता और संस्कृति में गहराई से घुलमिल गए. आगरा इसका सबसे ठोस उदाहरण है. 

ताजमहल को दुनिया मुहब्बत की निशानी के तौर पर जानती है, लेकिन इसके स्थापत्य में फारसी सौंदर्यबोध की मजबूत छाप है. इतिहासकारों के मुताबिक इसके डिजाइन से जुड़े शिल्पकारों में ईरानी मूल के उस्ताद शामिल थे. कैलीग्राफी करने वाले अमानत खान शिराजी और वास्तुकार ईसा शिराजी का नाम अक्सर लिया जाता है. मुगल बादशाह शाहजहां के दौर में फारसी भाषा दरबार की आधिकारिक भाषा थी और ईरानी कारीगरों को खास दर्जा हासिल था. 

ताजमहल से कुछ ही दूरी पर एत्माद्दौला का मकबरा है, जिसे अक्सर ‘बेबी ताज’ कहा जाता है. यह मिर्जा ग्यास बेग का मकबरा है, जो ईरान से आकर मुगल दरबार में ऊंचे ओहदे पर पहुंचे. उनकी बेटी नूरजहां ने जहांगीर से विवाह किया और अपने पिता की याद में यह मकबरा बनवाया. इसी तरह यमुना किनारे स्थित ‘चीनी का रोजा’ मुल्ला शुकुल्लाह शिराजी, जिन्हें अफजल खान की उपाधि मिली, की याद दिलाता है. 

ये सभी प्रसंग बताते हैं कि आगरा सिर्फ मुगलों की राजधानी नहीं, बल्कि फारसी प्रभाव का संगम था. आगरा के न्यू आगरा इलाके में काजी नुरुल्लाह शुस्तरी की मजार भी ईरान-यूपी संबंध की एक अहम कड़ी है. 16वीं सदी में ईरान से आए शुस्तरी मुगल दरबार में प्रतिष्ठित विद्वान और न्यायविद बने. बाद में धार्मिक मतभेदों के चलते उन्हें सजा दी गई और आज उनकी दरगाह ‘शहीद-ए-सालिस’ के नाम से जानी जाती है. हर साल देश-विदेश से जायरीन यहां पहुंचते हैं. यह स्थान याद दिलाता है कि विचारों की आवाजाही कभी सीमाओं में कैद नहीं रही.

व्यापार भी इस रिश्ते की अहम कड़ी रहा. अकबर से लेकर शाहजहां तक के दौर में रेशम, कालीन, मेवा और घोड़ों का आयात-निर्यात ईरान और हिंदुस्तान के बीच चलता रहा. ईरानी कालीन खास मेहमानों के स्वागत में बिछाए जाते थे. यूनानी चिकित्सा पद्धति के हाकिम भी ईरान से दरबार में बुलाए गए. यह सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने दोनों समाजों को एक-दूसरे के करीब लाया. 

किंतूर में कभी ‘मुसवी’ या ‘खुमैनी’ खानदान के सैकड़ों घर हुआ करते थे, लेकिन आज महज पांच से सात परिवार ही बचे हैं
किंतूर में कभी ‘मुसवी’ या ‘खुमैनी’ खानदान के सैकड़ों घर हुआ करते थे, लेकिन आज महज पांच से सात परिवार ही बचे हैं

लखनऊ की बात करें तो यहां भी फारसी असर स्पष्ट दिखता है. पुराने शहर में स्थित करामत हुसैन मुस्लिम गर्ल्स कॉलेज की स्थापना जस्टिस सैयद करामत हुसैन ने की थी, जिनका संबंध भी मुसवी सैयद परंपरा से जोड़ा जाता है. महिला शिक्षा के क्षेत्र में यह संस्थान एक प्रगतिशील पहल माना गया. अवध के नवाबी दौर में फारसी साहित्य, शायरी और धार्मिक विमर्श ने एक खास पहचान बनाई, जो आज भी मजलिसों और मुशायरों में सुनाई देती है.

इन ऐतिहासिक सूत्रों के बीच किंतूर की मौजूदा बेचैनी को समझना आसान हो जाता है. जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है या तेहरान से कोई बड़ी खबर आती है, तो उसका असर यहां की बातचीत में दिखने लगता है. बुजुर्गों की आंखों में अतीत की परछाइयां तैरती हैं और युवा इंटरनेट पर ताजा अपडेट खंगालते हैं. हाल के वर्षों में ईरान-इजरायल तनाव और अमेरिका के साथ टकराव की खबरें लगातार सुर्खियों में रही हैं. किंतूर में भी इन घटनाओं पर तीखी प्रतिक्रियाएं सुनाई देती हैं. स्थानीय लोग इसे केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति नहीं, बल्कि अपने वंश और अस्मिता से जुड़ा सवाल मानते हैं. हालांकि गांव के अधिकांश लोग यह भी कहते हैं कि सबसे अहम चिंता आम नागरिकों की सुरक्षा है, खासकर वहां रह रहे भारतीयों की.

आगरा विश्वविद्यालय में पर्यटन विभाग के प्रोफेसर लवकुश मिश्र बताते हैं, “यूपी के संदर्भ में देखें तो यह रिश्ता केवल धार्मिक या वंशगत नहीं, सांस्कृतिक भी है. मुगल काल से चली आ रही फारसी परंपरा ने यहां की भाषा, खानपान, परिधान और स्थापत्य को प्रभावित किया. उर्दू के विकास में फारसी शब्दावली की बड़ी भूमिका रही; अदालतों और दफ्तरों में फारसी का इस्तेमाल 19वीं सदी तक होता रहा. यहां तक कि कई स्थानीय परिवार आज भी अपने वंश वृत्तांत में ईरान या मध्य एशिया का उल्लेख गर्व से करते हैं.” इतिहासकार मानते हैं कि यह संपर्क एकतरफा नहीं था. जैसे ईरानी विद्वान और कारीगर हिंदुस्तान आए, वैसे ही भारतीय मूल के लोग ईरान में बसे और वहां की राजनीति व समाज में सक्रिय हुए. खुमैनी परिवार की कहानी इसी जटिल आवाजाही का उदाहरण है. किंतूर के लोग इसे अपनी साझा विरासत मानते हैं, भले ही आधुनिक राष्ट्र-राज्य की सीमाएं अलग हों.

ईरान और यूपी का रिश्ता किसी एक घटना या व्यक्ति तक सीमित नहीं. यह सदियों से चलती आ रही आवाजाही, विचार और संस्कृति का सिलसिला है. किंतूर की खामोश गलियां, आगरा के संगमरमर के गुंबद और लखनऊ की अदब भरी फिजा मिलकर इस कहानी को पूरा करती हैं. यही वह ताना-बाना है जो बताता है कि भूगोल चाहे अलग हो, इतिहास कई बार साझा होता है.

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