लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) के यूरोलॉजी विभाग से सामने आया मामला सिर्फ एक विभागीय अनियमितता नहीं है. यह उत्तर प्रदेश के सरकारी चिकित्सा संस्थानों में वर्षों से पनप रही उस व्यवस्था की तस्वीर है, जहां मरीजों के नाम पर सरकारी धन खर्च होता है. कई बार तो लाभार्थी जीवित भी नहीं होते.
जांच में सामने आया कि जिन मरीजों की महीनों पहले मृत्यु हो चुकी थी, उनके नाम पर भी महंगी कैंसर और असाध्य रोगों की दवाएं खरीदी जा रही थीं. कुछ ऐसे लोगों को भी असाध्य रोगी दिखाया गया, जिन्हें कभी कैंसर था ही नहीं. यह खुलासा केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी प्रणाली पर गंभीर सवाल है.
पांच सदस्यीय जांच समिति को करीब सवा दो करोड़ रुपये की संदिग्ध दवा खरीद और खपत के प्रमाण मिले हैं. रिपोर्ट के बाद तीन संविदा कर्मियों को बर्खास्त किया गया. एक चीफ फार्मासिस्ट को निलंबित किया गया और एक डॉक्टर के खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई. इस घटना के सामने आने के बाद विभागाध्यक्ष को पद से हटाना पड़ा. यह कार्रवाई जितनी बड़ी है, उससे बड़ा सवाल यह है कि यह खेल महीनों तक कैसे चलते रहा?
जब अचानक तीन गुना बढ़ गया दवाओं का बजट
KGMU यूरोलॉजी विभाग में असाध्य रोगियों की दवाओं पर सात माह पहले तक आठ से दस लाख रुपये प्रतिमाह खर्च होते थे लेकिन जनवरी से मार्च के बीच यही खर्च बढ़कर लगभग 35 लाख रुपये प्रतिमाह पहुंच गया.
खर्च में इस असामान्य उछाल ने अधिकारियों का ध्यान खींचा. कुलपति प्रो. सोनिया नित्यानंद ने जब खर्च का ब्योरा मांगा और OPD कार्ड तथा बिलों का ऑडिट कराया तो कई विसंगतियां सामने आईं. इसके बाद गठित जांच समिति ने जब सूचीबद्ध मरीजों के परिजनों से संपर्क किया तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए.
कुछ मरीजों की मृत्यु महीनों पहले हो चुकी थी, जबकि उनके नाम पर लगातार दवाएं खरीदी जा रही थीं. कई ऐसे मरीजों का रिकॉर्ड मिला जिन्हें कैंसर या अन्य असाध्य रोग कभी था ही नहीं. जांच में यह भी सामने आया कि कुछ इंजेक्शन, जिन्हें छह महीने में एक या दो बार लगाया जाना चाहिए, उन्हें कागजों पर एक महीने में पांच से छह बार दर्शाया गया.
आठ से दस हजार रुपये कीमत वाले इन इंजेक्शनों की फर्जी खपत दिखाकर सरकारी पैसा निकाला गया. KGMU की जांच रिपोर्ट यह बताती है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में भ्रष्टाचार किस हद तक अमानवीय हो सकता है. मृत मरीजों को रिकॉर्ड में जीवित दिखाना और उनके नाम पर दवाओं की खरीद जारी रखना केवल वित्तीय अनियमितता नहीं, बल्कि मरीजों और उनके परिवारों के साथ संवेदनहीनता का चरम उदाहरण है.
जांच समिति के मुताबिक, जनरल मेडिसिन, न्यूरोलॉजी और अन्य सामान्य विभागों के मरीजों को भी असाध्य रोगियों की सूची में शामिल किया गया. उद्देश्य केवल इतना था कि महंगी दवाओं की खरीद का औचित्य दिखाया जा सके. यह पूरा तंत्र संकेत देता है कि कहीं न कहीं डॉक्टरों, फार्मेसी कर्मचारियों और प्रशासनिक स्तर पर निगरानी की कमी ने ऐसे नेटवर्क को पनपने का अवसर दिया.
क्या KGMU अकेला मामला है?
अगर यह माना जाए कि KGMU की घटना एक अपवाद है, तो अयोध्या के राजर्षि दशरथ मेडिकल कॉलेज के मामले उस धारणा को तोड़ देते हैं. यहां भी सरकारी धन के उपयोग को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि यहां खेल दवाओं की फर्जी खपत का नहीं बल्कि अनावश्यक खरीद का था.
मेडिकल कॉलेज में लगभग 20 लाख रुपये की लागत से वाटरलेस शैंपू और वाटरलेस बॉडीवॉश खरीदे गए. यह खरीद उस समय की गई जब अस्पताल में कई जरूरी दवाओं की कमी थी और मरीज बाहर मेडिकल स्टोरों से महंगे दामों पर दवाएं खरीदने को मजबूर थे. फरवरी 2025 में ट्रॉमा सेंटर से मांग भेजी गई और कुछ ही दिनों में खरीद प्रक्रिया पूरी कर ली गई. करीब 4,200 यूनिट उत्पाद खरीदे गए.
सितंबर में सामान गोदाम पहुंचा, लेकिन मरीजों तक कभी नहीं पहुंचा. आज भी यह सामग्री गोदाम के कोनों में पड़ी बताई जाती है और उसका बड़ा हिस्सा एक्सपायर हो चुका है. यह मामला बताता है कि सरकारी खरीद में जरूरत और प्राथमिकता की जगह अगर प्रक्रिया और कमीशन हावी हो जाएं तो संसाधनों की बर्बादी किस स्तर तक पहुंच सकती है.
जरूरत की दवाएं नहीं, लेकिन महंगी खरीद जरूर
राजर्षि दशरथ मेडिकल कॉलेज का दूसरा मामला और भी गंभीर है. यहां जीवनरक्षक दवाओं की खरीद में शासनादेश की अनदेखी का आरोप सामने आया है. उत्तर प्रदेश सरकार के निर्देशों के अनुसार मेडिकल कॉलेजों को अपनी अधिकांश दवाएं यूपी मेडिकल सप्लाई कॉरपोरेशन के माध्यम से खरीदनी चाहिए, जबकि सीमित परिस्थितियों में ही स्थानीय खरीद की अनुमति है.
हालांकि, जांच में सामने आया कि करोड़ों रुपये की दवाएं स्थानीय स्तर पर खरीदी गईं और कई मामलों में कीमतें अनुबंध दरों से दस से बीस गुना अधिक थीं. उदाहरण के तौर पर, पैरासिटामोल इंजेक्शन जो KGMU की अनुबंध दर पर 44 रुपये में उपलब्ध था, उसे स्थानीय खरीद के माध्यम से 744 रुपये में खरीदा गया.
इसी तरह मेरोपेनम, लीवोफ्लॉक्सासिन, एनोक्सापारिन और एड्रेनालिन जैसी दवाओं में भी भारी मूल्य अंतर सामने आया. वित्तीय वर्ष 2025-26 में जहां यूपी मेडिकल सप्लाई कॉरपोरेशन से लगभग डेढ़ करोड़ रुपये की दवाएं खरीदी गईं. वहीं स्थानीय खरीद का आंकड़ा साढ़े तीन करोड़ रुपये से अधिक पहुंच गया. यह अनुपात स्वयं में कई सवाल खड़े करता है.
भ्रष्टाचार का बदलता स्वरूप
सरकारी अस्पतालों में भ्रष्टाचार अब केवल नकद लेन-देन या भर्ती घोटालों तक सीमित नहीं है. इसका स्वरूप अधिक संगठित और तकनीकी होता जा रहा है. चिकित्सा शिक्षा विभाग में संयुक्त निदेशक रहे डा. एस. के; शर्मा के मुताबिक, गड़बड़ियों के तीन प्रमुख मॉडल उभरकर सामने आए हैं. पहला, फर्जी मरीजों या मृत मरीजों के नाम पर दवा खरीद और खपत दिखाना. दूसरा, अनावश्यक सामग्री या उपकरण खरीदकर सरकारी बजट का उपयोग करना. तीसरा, स्थानीय खरीद के नाम पर महंगे दामों में सामान खरीदकर कमीशन का खेल चलाना.
शर्मा बताते हैं “इन तीनों मॉडलों में एक समानता है. सरकारी धन खर्च होता है लेकिन मरीजों को अपेक्षित लाभ नहीं मिलता.”
सबसे बड़ा सवाल यही है कि करोड़ों रुपये के भुगतान, दवा खरीद और खपत के बावजूद निगरानी तंत्र समय रहते सक्रिय क्यों नहीं होता. चिकित्सा शिक्षा विभाग के अधिकारियों का मानना है कि अधिकांश मेडिकल कॉलेजों में डिजिटल ऑडिट और रीयल टाइम मॉनिटरिंग की व्यवस्था कमजोर है.
मरीजों के रिकॉर्ड, दवा वितरण और भुगतान प्रणाली अलग-अलग स्तरों पर संचालित होती है. इस कारण यदि कोई संगठित समूह रिकॉर्ड में हेरफेर करे तो लंबे समय तक उसकी पहचान नहीं हो पाती. दूसरी समस्या जवाबदेही की है. कई मामलों में संविदा कर्मचारी, फार्मेसी स्टाफ, डॉक्टर और प्रशासनिक अधिकारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहते हैं. नतीजा यह होता है कि अनियमितता सामने आने तक करोड़ों रुपये खर्च हो चुके होते हैं.
सबसे बड़ा नुकसान किसका?
ऐसे मामलों में सबसे बड़ा नुकसान सरकारी खजाने का नहीं, बल्कि मरीजों का होता है. पूर्वांचल के एक मेडिकल कालेज में प्राचार्य रहे डा. वी. के. सिंह बताते हैं “जब अस्पताल का बजट फर्जी खरीद, अनावश्यक सामग्री और महंगी दवाओं पर खर्च होता है तो वास्तविक मरीजों के लिए जरूरी दवाओं, उपकरणों और सेवाओं की कमी पैदा होती है. गरीब मरीज, जो सरकारी अस्पतालों पर निर्भर हैं, उन्हें बाहर से दवाएं खरीदनी पड़ती हैं. इलाज महंगा होता है और स्वास्थ्य व्यवस्था पर उनका भरोसा कमजोर पड़ता है.” विडंबना यह है कि जिन योजनाओं का उद्देश्य गंभीर और असाध्य रोगियों को राहत देना था, वही योजनाएं भ्रष्टाचार का माध्यम बनती दिखाई दे रही हैं.
KGMU और राजर्षि दशरथ मेडिकल कॉलेज के मामलों में कार्रवाई जरूर हुई है. बर्खास्तगी, निलंबन, विभागीय जांच और एफआईआर जैसे कदम उठाए गए हैं लेकिन केवल दंडात्मक कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी. विशेषज्ञ मानते हैं कि सभी मेडिकल कॉलेजों में दवा खरीद, वितरण और मरीजों के उपचार रिकॉर्ड को एकीकृत डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ना होगा.
प्रत्येक महंगी दवा की खरीद और उपयोग का ऑनलाइन सत्यापन अनिवार्य होना चाहिए. मृत मरीजों के रिकॉर्ड स्वतः निष्क्रिय करने की व्यवस्था बनाई जानी चाहिए. साथ ही, स्थनीय खरीद के मामलों की स्वतंत्र ऑडिट भी आवश्यक है. KGMU में मृत मरीजों के नाम पर दवा खरीद और अयोध्या मेडिकल कॉलेज में अनावश्यक तथा महंगी खरीद के मामले अलग-अलग घटनाएं नहीं हैं. ये उत्तर प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में मौजूद उन संरचनात्मक कमजोरियों की ओर संकेत करते हैं, जहां निगरानी की कमी, जवाबदेही का अभाव और खरीद प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की कमी भ्रष्टाचार को जन्म देती है.

