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यूपी के मेडिकल कॉलेजों की मजारों पर अब क्यों खड़े हो रहे विवाद?

KGMU और बहराइच मेडिकल कॉलेज में मजारों पर हुई कार्रवाई ने सरकारी ज़मीन, आस्था और कानून के टकराव को सामने ला दिया है

Objectionable posts on KGMU cause political uproar
KGMU से मजारें हटाने के लिए 23 जनवरी को नोटिस जारी किया गया है
अपडेटेड 27 जनवरी , 2026

उत्तर प्रदेश में मेडिकल और शैक्षणिक परिसरों के भीतर मौजूद मजारें एक बार फिर बड़े विवाद के केंद्र में हैं. लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) और बहराइच के महाराजा सुहेलदेव ऑटोनॉमस स्टेट मेडिकल कॉलेज में हाल में हुई प्रशासनिक कार्रवाइयों ने इस बहस को और तीखा कर दिया है. सवाल सिर्फ अवैध अतिक्रमण का नहीं है बल्कि आस्था और कानून के टकराव से लेकर राजनीति और सामाजिक ध्रुवीकरण तक कई परतें इस मुद्दे से जुड़ती दिख रही हैं.

KGMU में धर्मांतरण के आरोपों में एक डॉक्टर की गिरफ्तारी और कैंपस से कथित तौर पर लव जिहाद नेटवर्क चलने के दावों के बीच यूनिवर्सिटी प्रशासन ने परिसर में मौजूद पांच मजारों को हटाने का निर्देश दिया. 23 जनवरी को जारी नोटिस में कहा गया कि ये मजारें बिना वैध अनुमति सरकारी जमीन पर बनी हैं और अतिक्रमण की श्रेणी में आती हैं. 

नोटिस में 15 दिन की समय सीमा तय करते हुए चेतावनी दी गई कि निर्देशों का पालन न होने पर जबरन हटाने सहित कानूनी और प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी. यूनिवर्सिटी प्रशासन का तर्क है कि इन मजारों की वजह से कैंपस में अनावश्यक भीड़ जमा होती है. इससे मरीजों की आवाजाही बाधित होती है और शैक्षणिक तथा चिकित्सा वातावरण प्रभावित होता है. प्रशासन का दावा है कि साफ सफाई और सुरक्षा व्यवस्था पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ा है और महिला कर्मचारियों रेजिडेंट डॉक्टरों और छात्रों की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा हुई हैं. 

KGMU प्रवक्ता प्रोफेसर के.के. सिंह का कहना है कि यूनिवर्सिटी को इन मजारों के प्रबंधन या रखवालों की जानकारी तक नहीं है इसलिए श्राइनों की दीवारों पर नोटिस चिपकाए गए हैं. उनका कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के अनुसार सरकारी जमीन पर किसी भी तरह का धार्मिक या व्यावसायिक निर्माण अवैध माना जाएगा.

दूसरी तरफ श्राइन मैनेजमेंट कमेटियों और धार्मिक नेताओं ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है. ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने कहा कि मजारों की मौजूदगी से ट्रैफिक या एम्बुलेंस की आवाजाही बाधित होने का दावा निराधार है. उनका कहना है कि खराब ट्रैफिक मैनेजमेंट की वजह से पूरा जिला जाम रहता है और मजारों को सिर्फ निशाना बनाया जा रहा है. उन्होंने नोटिस को गलत बताते हुए मुख्यमंत्री और राज्य सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है.

इसी तरह एक मजार के मैनेजमेंट से जुड़े मोहम्मद शकील का कहना है कि यह दरगाह KGMU के बनने से बहुत पहले से मौजूद है. उनका आरोप है कि यूनिवर्सिटी प्रशासन बेवजह धार्मिक स्थलों को निशाना बना रहा है जबकि कैंपस के भीतर और बाहर अवैध दुकानों पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना खालिद रशीद फिरंगी महली ने भी कहा कि मजारें आजादी से पहले से मौजूद हैं और अगर प्रशासन को कोई आपत्ति है तो उसका बातचीत के जरिए समाधान निकालना चाहिए.

KGMU से जुड़े एक पूर्व प्रोफेसर का भी कहना है कि मजारें यूनिवर्सिटी की इमारतें बनने से पहले से थीं और उन्हें हटाने के लिए पहले कभी गंभीर प्रयास नहीं हुए. हालांकि लखनऊ के एक इतिहासकार ने दावा किया है कि उन्हें इन मजारों से जुड़े कोई ठोस ऐतिहासिक दस्तावेज या रिकॉर्ड नहीं मिले हैं. यही विरोधाभास इस पूरे विवाद की जड़ में नजर आता है.

लखनऊ की तरह ही बहराइच में भी मेडिकल कॉलेज परिसर के भीतर बनी मजारें प्रशासनिक कार्रवाई का सामना कर चुकी हैं. महाराजा सुहेलदेव ऑटोनॉमस स्टेट मेडिकल कॉलेज के पास सरकारी जमीन पर बनी दस मजारों को 19 जनवरी को जिला प्रशासन ने गिरा दिया. अधिकारियों के अनुसार यह कार्रवाई कॉलेज प्रशासन की शिकायत के बाद की गई जिसमें कहा गया था कि ये ढांचे अवैध हैं और सरकारी जमीन पर कब्जा करके बनाए गए हैं.

बहराइच सिटी मजिस्ट्रेट राजेश प्रसाद के अनुसार यह मामला नया नहीं था बल्कि वर्ष 2002 से लंबित था. उस समय तत्कालीन नगर मजिस्ट्रेट ने इन दस मजारों को अवैध घोषित किया था. इसके खिलाफ संबंधित पक्ष ने कई स्तरों पर कानूनी चुनौती दी लेकिन 2019 में कमिश्नर की अदालत से भी कोई राहत नहीं मिली. इसके बावजूद कार्रवाई नहीं हो पाई क्योंकि संबंधित पक्षों ने प्रशासन को आश्वासन दिया था कि वे खुद ढांचे हटा देंगे. यह आश्वासन भी पूरा नहीं हुआ. 

प्रशासन का कहना है कि 2018 में मेडिकल कॉलेज बनने के बाद मजारें उसके परिसर में आ गईं और इसके बाद अतिक्रमण और विस्तार की शिकायतें बढ़ीं. जनवरी 2024 में कॉलेज की शिकायत पर राजस्व रिकॉर्ड की जांच हुई और नोटिस जारी किए गए. तय समय सीमा पूरी होने पर 19 जनवरी को बुलडोजर चलाया गया. हालांकि स्थानीय लोगों और धार्मिक संगठनों ने इसे भी आस्था पर हमला बताते हुए विरोध किया.

इन दोनों मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि कैंपस में मौजूद मजारें वास्तव में अवैध अतिक्रमण हैं या ऐतिहासिक धार्मिक स्थल जिन्हें समय के साथ संस्थानों के विस्तार ने घेर लिया. शहरी विकास और भूमि कानून के विशेषज्ञ एस. के. मिश्र का कहना है कि सरकारी जमीन पर बिना दस्तावेज या स्वीकृति बने किसी भी ढांचे को कानूनन संरक्षण नहीं मिल सकता चाहे वह धार्मिक ही क्यों न हो. सुप्रीम कोर्ट भी सार्वजनिक भूमि पर अतिक्रमण के खिलाफ सख्त रुख अपना चुका है.

वहीं सामाजिक और धार्मिक मामलों के जानकार मानते हैं कि ऐसे मुद्दों को सिर्फ कानून के नजरिये से देखना पर्याप्त नहीं है. उनका कहना है कि मजारें उत्तर भारत की साझा सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा रही हैं और इन्हें हटाने से भावनात्मक प्रतिक्रिया स्वाभाविक है. विशेषज्ञों का तर्क है कि अगर प्रशासन संवाद और पुनर्वास जैसे विकल्पों पर विचार करता तो तनाव कम हो सकता था.

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह विवाद केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं है बल्कि इसके राजनीतिक निहितार्थ भी हैं. 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश में धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दे राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गए हैं. विपक्ष इन कार्रवाइयों को अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ कार्रवाई बताकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है जबकि सत्तारूढ़ दल इसे कानून व्यवस्था और सरकारी जमीन की रक्षा से जोड़कर पेश कर रहा है.

कुछ राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि कैंपस जैसे संवेदनशील स्थानों से धार्मिक ढांचों को हटाने की कार्रवाई एक संदेश देती है कि सरकार किसी भी तरह के अतिक्रमण पर सख्ती बरतने को तैयार है. वहीं दूसरे विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार ऐसे कदम सामाजिक ध्रुवीकरण को बढ़ा सकते हैं और अल्पसंख्यक समुदाय में असुरक्षा की भावना पैदा कर सकते हैं.

इस पूरे विवाद में एक अहम सवाल यह भी है कि क्या सभी अवैध निर्माणों पर समान रूप से कार्रवाई हो रही है. धार्मिक नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि सिर्फ मजारों को निशाना बनाया जा रहा है जबकि अन्य अवैध दुकानों और ढांचों पर आंख मूंद ली जाती है. प्रशासन इस आरोप को खारिज करता है और कहता है कि कार्रवाई चरणबद्ध तरीके से की जा रही है.

कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश में कैंपस के भीतर मौजूद मजारों का मुद्दा कानून आस्था और राजनीति के त्रिकोण में फंसा नजर आता है. KGMU और बहराइच के मामलों ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले समय में ऐसे विवाद और बढ़ सकते हैं. सवाल यह है कि क्या समाधान टकराव के रास्ते से निकलेगा या संवाद और संतुलन की कोशिशें इस संवेदनशील मसले को शांत कर पाएंगी.

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