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केरल चुनाव के नतीजे सभी दलों के लिए चौंकाने वाले क्यों हो सकते हैं?

केरल विधानसभा चुनाव में एक ओर जहां कांग्रेस सत्ता विरोधी लहर के भरोसे जीत का दावा कर रही है. वहीं, BJP भी कम-से-कम 8 सीटों को जीतने की कोशिश में है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 26 मार्च , 2026

राजनीतिक रूप से अस्थिर केरल ने 2021 के चुनावों में सभी पूर्वानुमानों को गलत साबित कर दिया था. इस चुनाव में वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (LDF) ने विधानसभा की 140 सीटों में से 99 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार जीत हासिल की थी.

कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (UDF) के लिए यह एक चौंकाने वाला परिणाम था, जो केवल 41 सीटें ही जीत सका. राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को एक भी सीट न मिलने के कारण उसे और भी ज्यादा निराशा हाथ लगी.

इस बार के विधानसभा चुनाव में विपक्षी UDF को लग रहा है कि सत्ता-विरोधी लहर का उसे फायदा मिलने वाला है. वहीं, BJP के नेतृत्व वाला NDA कम से कम राज्य की कुछ सीटों (लक्ष्य 8 या उससे ज्यादा) पर जीत हासिल करने की कोशिश कर रहा है. जबकि मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के नेतृत्व में LDF तीसरी और अभूतपूर्व जीत के लिए संघर्ष कर रहा है.

चुनाव प्रचार के लिए दो सप्ताह का समय बाकी है. सभी गठबंधन और उम्मीदवार पारिवारिक मुलाकातों, जोरदार चुनावी रैलियों और जन प्रचार के माध्यम से मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. मुख्यमंत्री विजयन ने 23 मार्च को पत्थनमथिट्टा जिले से अपने चुनावी दौरे की शुरुआत की. उनका अभियान 4 अप्रैल तक सभी 14 जिलों को कवर करेगा. अन्य पार्टियां भी उतनी ही उत्साहित हैं.

एक सर्वे में पाया गया कि केरल में 58 फीसद मतदाता चुनाव प्रचार से पहले ही अपनी पसंद तय कर लेते हैं, क्योंकि वे राजनीतिक रूप से ज्यादा जागरूक होते हैं. लगभग 22 फीसद मतदाता पार्टियों के जरिए उम्मीदवारों की घोषणा के बाद अपना वोट तय करते हैं. ये वे मतदाता हैं, जो राजनीतिक रूप से जागरूक तो होते हैं, लेकिन तटस्थ होते हैं.

अन्य 13 फीसद मतदाता चुनाव प्रचार के दौरान अपनी पसंद तय करते हैं और उम्मीदवारों के जरिए पेश किए गए वादों के आधार पर अपना चयन करते हैं. लगभग 6 फीसद मतदाता मतदान के दिन ही अपना अंतिम फैसला लेते हैं. एक फीसद मतदाता बिना किसी विकल्प के मतदान करने जाते हैं और वे अपने साथियों से प्रभावित होकर वोट करते हैं.

अगर ये आंकड़े विश्वसनीय हैं, तो केरल के 58 फीसद मतदाताओं ने 9 अप्रैल को किसे वोट देना है, यह पहले ही तय कर लिया है. चुनाव में उम्मीदवार शेष 42 फीसद अनिर्णीत मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए पुरजोर प्रयास कर रहे हैं.

पेरंब्रा निर्वाचन क्षेत्र से LDF संयोजक और सीपीआईएम उम्मीदवार टीपी रामकृष्णन कहते हैं, “हमें पूरा भरोसा है कि हम पहले से भी अधिक बहुमत के साथ सत्ता में लौटेंगे और पिनाराई विजयन फिर से सरकार बनाएंगे.”

रामकृष्णन ने आगे कहा, “केरल की जनता LDF की वापसी चाहती है ताकि केरल को एक विकसित राज्य बनाया जा सके. कांग्रेस और BJP दोनों के पास विकास की कोई दृष्टि नहीं है. सुशासन प्रदान करने में हमारा एक विश्वसनीय इतिहास रहा है और जिन लोगों ने ऐसी पहल की है, उन्हें इसे जारी रखना चाहिए.” हालांकि, कांग्रेस पिनाराई सरकार के खिलाफ एक बड़ी लहर की आशंका जता रही है और उसे उम्मीद है कि UDF मौजूदा सरकार को सत्ता से हटा देगा.

कांग्रेस नेताओं का आरोप है कि कई निर्वाचन क्षेत्रों में कांग्रेस को हराने के लिए CPIM और BJP के बीच समझौता हुआ है. विधानसभा में विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशान ने सबसे पहले इस तरह की चिंता जताई. AICC महासचिव के.सी. वेणुगोपाल ने भी इस बात को दोहराया है.

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के महासचिव पी.के. कुन्हालीकुट्टी ने भी इस आरोप पर सहमति दर्ज कराई है. CPIM ने पलक्कड़ सीट से कांग्रेस उम्मीदवार मलयालम फिल्म अभिनेता रमेश पिशारोडी और BJP की शोभा सुरेंद्रन के खिलाफ बिरयानी किंग एन.एम.आर. रजाक को उम्मीदवार बनाया.

पलक्कड़ निर्वाचन क्षेत्र में 68 प्रतिशत हिंदू, 28 प्रतिशत मुस्लिम और 3.8 प्रतिशत ईसाई हैं. पत्रकार के.वी. सुधाकरन ने बताया, “BJP-CPIM समझौते के आरोप इसलिए लगाए जा रहे हैं क्योंकि कांग्रेस को डर है कि CPIM उम्मीदवार को UDF से मुस्लिम वोट छीनने के लिए चुना गया है. कांग्रेस अपने इस समझौते के आरोप के जरिए मालाबार में मुस्लिम वोटों को अपने पक्ष में करना चाहती है.”

अल्पसंख्यक वोट कांग्रेस के लिए एक चुनौती हैं, क्योंकि मुस्लिम समुदाय बंटा हुआ है. कंथापुरम गुट CPIM का समर्थन कर रहा है. अब्दुल नासिर मदानी के नेतृत्व वाली पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी वामपंथी दलों का साथ दे रही है और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग कांग्रेस के साथ है. ईसाई समुदाय भी विभाजित है, जहां सिरो-मालाबार चर्च ने कांग्रेस का साथ छोड़कर BJP का समर्थन किया है. ये अल्पसंख्यक समुदाय लंबे समय से कांग्रेस के लिए एक मजबूत स्तंभ रहे हैं.

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