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मोबाइल एक्टिविटी और ड्रोन निगरानी : ऐसे पकड़ा गया कानपुर का 'जामताड़ा मॉडल'

कानपुर के रेउना में खेतों से चल रहा था संगठित साइबर ठगी नेटवर्क, इन ठगों ने जामताड़ा मॉडल पर काम कर देशभर में फैलाया जाल

Cyber Fraud
सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 9 अप्रैल , 2026

उत्तर प्रदेश का औद्योगिक शहर कानपुर अब एक नए कारण से सुर्खियों में है. चमड़ा उद्योग और कारोबारी पहचान के साथ-साथ अब यहां के ग्रामीण इलाकों में साइबर अपराध का ऐसा नेटवर्क विकसित हो रहा है, जिसने पुलिस और जांच एजेंसियों को भी चौंका दिया है. 

घाटमपुर क्षेत्र के रेउना गांव में हुई हालिया पुलिस कार्रवाई ने यह साफ कर दिया कि देश में कुख्यात जामताड़ा मॉडल अब उत्तर प्रदेश में भी अपनी जड़ें जमा चुका है. फर्क सिर्फ इतना है कि यहां यह नेटवर्क खेतों, बागों और झोपड़ियों से संचालित हो रहा था, जहां से देशभर के लोगों को फोन कॉल के जरिए ठगा जा रहा था.

पूरे मामले की शुरुआत एक तकनीकी अलर्ट से हुई. नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग सिस्टम ने कानपुर कमिश्नरी पुलिस को संकेत दिया कि घाटमपुर के रेउना क्षेत्र में संदिग्ध मोबाइल गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं और यह इलाका साइबर ठगी का हॉटस्पॉट बनता जा रहा है. इसके बाद कानपुर के पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने मामले को गंभीरता से लेते हुए स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप और साइबर क्राइम ब्रांच को सक्रिय किया. 

कानपुर के एडीसीपी स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (एसओजी) सुमित सुधाकर रामटेके और घाटमपुर एसीपी को पूरे नेटवर्क की पहचान और गिरफ्तारी की जिम्मेदारी दी गई. करीब एक महीने तक पुलिस ने इलाके की चुपचाप निगरानी की. सिविल ड्रेस में टीमें गांव में पहुंचीं, स्थानीय गतिविधियों को समझा गया और ड्रोन के जरिए खेतों और बागों में बनी झोपड़ियों पर नजर रखी गई. धीरे-धीरे तस्वीर साफ होने लगी. सुबह के समय कई युवक समूह में इन झोपड़ियों में पहुंचते, घंटों मोबाइल फोन पर लगे रहते और शाम तक वापस लौट जाते. यह कोई सामान्य गतिविधि नहीं थी. पुलिस को शक पुख्ता हुआ कि यहां से संगठित साइबर ठगी का नेटवर्क चल रहा है.

ड्रोन, घेराबंदी और ‘ऑपरेशन रेउना’

7 अप्रैल को पुलिस ने पूरी तैयारी के साथ ऑपरेशन शुरू किया. कई थानों की फोर्स, साइबर क्राइम ब्रांच, एसओजी और पीएसी के साथ करीब 200 पुलिसकर्मी इलाके में पहुंचे. 20 चार पहिया और 15 दोपहिया वाहनों के काफिले के साथ टीम ने गांव के बाहर मोर्चा संभाला. इसके बाद दो ड्रोन हवा में छोड़े गए, जिन्होंने पूरे इलाके की लाइव तस्वीर पुलिस को दी. 

रेउना गांव के लाले बाबा मंदिर के पास एक बाग में युवकों की हलचल दिखाई दी. कुछ युवक झोपड़ियों के अंदर जाते नजर आए. संकेत मिलते ही पुलिस ने चारों तरफ से घेराबंदी कर दी और एक साथ दबिश दी. अचानक हुई इस कार्रवाई से मौके पर अफरातफरी मच गई. कई युवक भागने की कोशिश में खेतों और संकरी गलियों की ओर दौड़े. बावजूद इसके पुलिस ने 20 आरोपियों को मौके से दबोच लिया, जबकि 17 आरोपी भागने में सफल रहे. 

पकड़े गए युवकों को जब पुलिस ले जाने लगी, तो गांव के लोग भी बड़ी संख्या में इकट्ठा हो गए. महिलाओं और पुरुषों ने पुलिस का विरोध किया, धक्का-मुक्की की और आरोपियों को छोड़ने की मांग की. हालात बिगड़ते देख अतिरिक्त फोर्स और पीएसी बुलानी पड़ी, तब जाकर स्थिति नियंत्रण में आई. यह दृश्य इस बात का संकेत था कि यह नेटवर्क सिर्फ अपराधियों तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी कहीं न कहीं स्वीकार्यता हासिल कर चुका था.

5वीं पास ‘फर्जी आईपीएस’ : ठगी का नया चेहरा

गिरफ्तार किए गए आरोपियों की प्रोफाइल ने पुलिस को और ज्यादा हैरान किया. इनमें से ज्यादातर युवक 5वीं से 11वीं तक पढ़े हुए थे, लेकिन फोन पर उनकी भाषा, आत्मविश्वास और प्रस्तुति इतनी प्रभावशाली थी कि वे खुद को आसानी से आईपीएस अधिकारी, क्राइम ब्रांच अफसर या सरकारी प्रतिनिधि साबित कर देते थे. कॉल के दौरान वे बैकग्राउंड में पुलिस सायरन तक बजाते थे, ताकि सामने वाला व्यक्ति डर जाए और उन्हें असली अधिकारी समझे. अगर कोई व्यक्ति सवाल करता या संदेह जताता, तो दूसरा सदस्य ‘सीनियर अधिकारी’ बनकर कॉल पर आता और धमकी देता कि पुलिस टीम रास्ते में है, गिरफ्तारी से बचना है तो तुरंत पैसे जमा करो. 

इस गिरोह का काम करने का तरीका पूरी तरह संगठित था, ठीक किसी कॉल सेंटर की तरह. हर सदस्य की भूमिका तय थी. कुछ लोग सिर्फ कॉल करते थे, कुछ इलाके की निगरानी करते थे और कुछ बैंक खातों तथा पैसों के लेनदेन को संभालते थे. हर व्यक्ति रोजाना 100 से 150 कॉल करता था और इनमें से औसतन 5 से 10 लोग झांसे में आ ही जाते थे. यानी एक व्यक्ति रोजाना एक से डेढ़ लाख रुपए तक कमा रहा था. यह आंकड़ा बताता है कि यह सिर्फ छोटे स्तर का अपराध नहीं, बल्कि एक बड़े आर्थिक नेटवर्क का हिस्सा था.

ठगी का पूरा ‘इकोसिस्टम’

ठगी के लिए ये लोग अलग-अलग तरीके अपनाते थे. बुजुर्गों को पेंशन, बिजली बिल में छूट या सरकारी योजना का लाभ दिलाने का झांसा दिया जाता था. किसानों को कृषि बीमा या आवास योजना के नाम पर फंसाया जाता था. युवाओं को अश्लील वीडियो देखने या ऑनलाइन गतिविधियों के नाम पर डराया जाता था. कई मामलों में लोगों को फोन कर कहा जाता था कि उनके खिलाफ केस दर्ज हो गया है और गिरफ्तारी से बचने के लिए पैसे जमा करने होंगे. यह पूरा खेल तीन चीजों पर आधारित था- डर, लालच और शर्म- और यही इसकी सफलता का सबसे बड़ा कारण था. 

तकनीकी रूप से भी यह गिरोह काफी चालाक था. ये लोग किसी भी मोबाइल नंबर की सीरीज उठाते, फिर उसे ट्रूकॉलर, यूपीआई या पेटीएम से जोड़कर व्यक्ति की जानकारी निकालते और उसी आधार पर अपनी स्क्रिप्ट तैयार करते. पैसे सीधे अपने खाते में नहीं मंगवाते थे, बल्कि ‘म्यूल अकाउंट’ का इस्तेमाल करते थे. म्यूल अकाउंट यानी ऐसे बैंक खाते जो किसी और के नाम पर खुले होते थे लेकिन ऑपरेट ये ठग करते थे. गिरोह के पास 20 से 50 तक ऐसे खाते थे, जिनमें पैसे ट्रांसफर कराए जाते थे. इसके अलावा सैकड़ों सिम कार्ड और मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया जा रहा था, जिससे ट्रैकिंग और भी मुश्किल हो जाती थी.

दूसरे राज्यों से सीखा ‘क्राइम मॉडल’

जांच में यह भी सामने आया कि इस नेटवर्क की जड़ें कानपुर से बाहर तक फैली हैं. रेउना के कई युवक पहले तमिलनाडु, महाराष्ट्र और गुजरात की फैक्ट्रियों में काम करने गए थे. वहीं उनकी मुलाकात साइबर अपराधियों से हुई और उन्होंने यह काम सीखा. बाद में वे अपने गांव लौटे और यहां इस मॉडल को लागू कर दिया. धीरे-धीरे उन्होंने नए युवकों को जोड़ा, उन्हें ट्रेनिंग दी और एक संगठित नेटवर्क खड़ा कर दिया. यह प्रक्रिया ठीक वैसी ही थी, जैसी कभी जामताड़ा में देखी गई थी. 

इस गिरोह का असर सिर्फ कानपुर या उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं था. राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और अन्य राज्यों के लोग इसका शिकार बने. राजस्थान के एक युवक से सात लाख से ज्यादा की ठगी, उन्नाव के एक सिपाही से दो लाख रुपए की वसूली और कई अन्य मामलों ने यह साबित किया कि यह नेटवर्क राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय था. कई पीड़ितों ने 1930 हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर यह पूरा मामला पुलिस तक पहुंचा. नेशनल साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर ने भी इस इलाके से जुड़े 289 संदिग्ध मोबाइल नंबरों की जानकारी पुलिस को दी थी. इसके बावजूद यह नेटवर्क लंबे समय तक सक्रिय रहा, जो यह दिखाता है कि साइबर अपराध की जांच और रोकथाम कितनी चुनौतीपूर्ण होती जा रही है. 

डिजिटल तकनीक ने अपराधियों को नए साधन दिए हैं, जिनका वे तेजी से उपयोग कर रहे हैं. अब तक इस मामले में 20 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि 17 आरोपी फरार हैं. कुल 34 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है, जिनमें से कई के खिलाफ पहले भी केस दर्ज हैं. पुलिस की कोशिश है कि बाकी आरोपियों को जल्द गिरफ्तार किया जाए और इस नेटवर्क को पूरी तरह खत्म किया जाए. लेकिन असली चुनौती सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, बल्कि उस सिस्टम को तोड़ना है, जो लगातार नए युवकों को इस अपराध की ओर खींच रहा है.

कानपुर विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान विभाग के एक वरिष्ठ प्रोफेसर बताते हैं कि रेउना की यह घटना सिर्फ एक पुलिस कार्रवाई नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक और आर्थिक संकट की ओर इशारा करती है. बेरोजगारी, तेजी से पैसा कमाने की चाह और डिजिटल तकनीक का गलत इस्तेमाल मिलकर एक ऐसा माहौल बना रहे हैं, जहां साइबर अपराध ‘आसान विकल्प’ के रूप में उभर रहा है. अगर समय रहते इस पर सख्ती नहीं हुई, तो कानपुर ही नहीं, देश के कई और हिस्से ऐसे ‘मिनी जामताड़ा’ में बदल सकते है.

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