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इंतजार का अंत खुदकुशी! परीक्षा के दबाव और पेपर लीक के बीच फंसता झारखंड का युवा

NCRB की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड में साल 2024 के दौरान बेरोजगारी और परीक्षा में फेल होने की वजह से कुल 271 युवाओं ने आत्महत्या की थी

बाराबंकी में पीएसी की कॉन्स्टेबल ने दी जान.  (Photo: Representational )
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 15 मई , 2026

फरवरी माह की 2 तारीख को रांची के कडरू न्यू एजी कॉलोनी में मां-बेटे और बेटी के एक साथ जान देने की कोशिश ने पूरे इलाके को चौंका दिया था. इसमें मां और नाबालिग बेटी तो बच गए लेकिन बेटे शेखर ने फांसी लगाकर जान दे दी. शुरुआत में इसका कारण डिप्रेशन बताया जा रहा था लेकिन इसकी असली वजह आर्थिक तंगी थी.

वहीं दिसंबर 2025 को जमशेदपुर की एक 20 वर्षीय बी.टेक छात्रा ने छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में हॉस्टल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली. कथित सुसाइड नोट में उसने फर्स्ट ईयर में बैक लगने और माता-पिता की अपेक्षाओं पर खरा न उतर पाने के तनाव का जिक्र किया था.  फिर बीते अप्रैल माह में नीट (NEET) की तैयारी कर रहे झारखंड के एक 21 वर्षीय छात्र ने राजस्थान के कोटा में आत्महत्या कर ली.

ये कुछ उंगली पर गिने जाने वाले आंकड़े नहीं हैं. तस्वीर भयावह है. झारखंड में साल 2024 के दौरान बेरोजगारी और परीक्षा में असफल होने की वजह से कुल 271 युवाओं ने आत्महत्या कर ली. हाल ही में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ओर से जारी किए गए ‘एक्सीडेंटल डेथ्स एंड सुसाइड्स इन इंडिया 2024’ के ताजा आंकड़ों में इसका खुलासा हुआ है. पूरे राज्य में बेरोजगारी की वजह से 193 लोगों ने आत्महत्या कर ली, तो परीक्षा में फेल होने और फेल होने के भय से कुल 73 बच्चों ने अपने जीवन को खत्म करने का रास्ता अपना लिया.

आखिर बच्चे और युवा ऐसा रुख क्यों अख्तियार कर रहे हैं? रांची इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो-साइकियाट्री एंड एलाइड साइंसेज (RINPAS) के मनोचिकित्सक डॉ. सिद्धार्थ सिन्हा कहते हैं, “16 से 30 आयु वर्ग के लोग नीट, यूजी, पीजी या फिर जिस विषय की पढ़ाई कर रहे होते हैं, वह उस वक्त उनके लिए मुश्किल होता है. इसके अलावा जो लोग प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करते हैं वे अपने सपनों के अलावा अपने परिवार और समाज की अपेक्षाओं का बोझ लेकर भी चलते हैं.”

वे आगे कहते हैं, “फ्रेश स्टूडेंट जो तैयारी करके जाता है, उसका पहला एग्जाम अच्छा जाता है. पर जब वह कैंसिल हो जाता है, उसके बाद खुद को फिर से उसी चीज के लिए तैयार करने का जो प्रेशर होता है, वह कई बार असहनीय हो जाता है और बच्चे सुसाइड कर लेते हैं.”
सिद्धार्थ सिन्हा के मुताबिक सफल लोगों में जो एक तरह का एरोगेंस होता है, वह इसी प्रेशर को झेलने के बाद मिली सफलता की वजह से भी आता है.
जाहिर है, परीक्षाएं रद्द होने और साल दर साल परीक्षाओं के पेपर लीक होने से छात्रों के अंदर खोने का भय घर करने लगता है. झारखंड जैसे राज्य में युवा किसी परीक्षा के लिए दस सालों तक तैयारी करते हैं और परीक्षा होने का इंतजार करते हैं. लेकिन जब परीक्षा होती है तो पेपर लीक हो जाते हैं. दस सालों का इंतजार और दस सालों की मेहनत के बाद अगर परीक्षा दे भी दी तो पेपर लीक के बाद फिर उसी संघर्ष और उम्र बीतने का डर उन पर हावी हो जाता है.

महिलाओं के मुकाबले पुरुष अधिक कर रहे हैं सुसाइड

NCRB की रिपोर्ट के मुताबिक सुसाइड को लेकर कई अन्य चौंकाने वाले खुलासे भी हुए हैं. जैसे कि झारखंड में आत्महत्या करने वाले पुरुषों की संख्या महिलाओं के मुकाबले तीन गुना ज्यादा है.   राज्य में वर्ष 2024 में कुल 1,991 आत्महत्या के मामले दर्ज किए गए जो राष्ट्रीय कुल का 1.2% है. यह संख्या 2023 में दर्ज 2,006 मौतों की तुलना में मामूली कमी दिखाती है. झारखंड की आत्महत्या दर, यानी प्रति एक लाख आबादी पर घटनाओं की संख्या, फिलहाल 5 है. कुल मौतों में 1,412 पुरुष और 579 महिलाएं शामिल थीं.

केंद्रीय मनोचिकित्सा संस्थान (CIP) में मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर डॉ. संजय कुमार मुंडा ने बताया कि आत्महत्या के प्रयास महिलाओं में अधिक हो सकते हैं लेकिन पुरुष अक्सर अधिक घातक तरीकों का चयन करते हैं. डॉ. मुंडा ने कहा, “मदद लेने को लेकर एक स्थाई सामाजिक कलंक भी मौजूद है जो आखिरकार पुरुषों में अधिक मृत्यु दर का कारण बनता है.”

वे सुसाइड को तीन टर्म के साथ समझाते हैं. पहला 'परसीव्ड बर्डेन समनेस (Perceived Burdensomeness )' यानी इंसान वैक्यूम में नहीं जीता है. उसके आसपास लोग और माहौल होता है लेकिन उसके अंदर समाज के लिए नकारात्मकता आ जाती है फिर वह खुद को बोझ समझने लगता है.  दूसरा टर्म है 'थ्वार्टेड बिलॉन्गिंगनेस (Thwarted Belongingness )' यानी जब एक इंसान अपने परिवार या दोस्तों के साथ खुद को उनका हिस्सा नहीं समझता. वह समझने लगता है कि मैं उन सब से दूर हो चुका हूं और ऐसे में मेरा जाना ही बेहतर है. तीसरा है 'कैपेसिटी टू किल (Capacity to kill)'. साहसी लोग बहुत होते हैं लेकिन खुद को खत्म करने का साहस बहुत रेयर होता है.

डॉ. सिद्धार्थ सिन्हा आगे यह भी बताते हैं कि संकट के समय पुरुष क्लिनिकल मदद लेने के बजाय शराब या नशीले पदार्थों का सहारा लेकर खुद इलाज करने की कोशिश करते हैं.  कई पुरुष शर्म या इस अफवाह के कारण पेशेवर मदद लेने से बचते हैं कि मानसिक रोगों की दवाएं नपुंसकता जैसी शारीरिक समस्याएं पैदा करती हैं. रिपोर्ट के अनुसार राज्य में आत्महत्या के प्रमुख कारण पारिवारिक और वैवाहिक समस्याएं हैं, जिनसे क्रमशः 551 और 388 मामले जुड़े हुए हैं.

मनोवैज्ञानिक पहलू पर बात करते हुए डॉ. मुंडा बताते हैं कि आत्महत्या का प्रयास करने वाले लोगों में अक्सर सहनशीलता की कमी और परिस्थितियों से निपटने के गलत तरीके देखे जाते हैं. वे लोगों को ‘समस्या-केंद्रित’ या ‘भावना-केंद्रित’ तरीके अपनाने की सलाह देते हैं.  डॉ. मुंडा के मुताबिक, “किसी समस्या से निराश होने से पहले यह समझना चाहिए कि क्या उसका समाधान संभव है. यदि परिस्थिति बदली नहीं जा सकती, तो ध्यान उससे उत्पन्न भावनाओं को संभालने और पेशेवर मार्गदर्शन लेने पर होना चाहिए.”

हालांकि किसी विशेषज्ञ तक पहुंचना केवल पहला कदम है.  डॉ. सिन्हा चेतावनी देते हुए कहते हैं कि ‘अधूरा इलाज’ मानसिक स्वास्थ्य सुधार में एक बड़ी बाधा बना हुआ है.  उनके मुताबिक, “मरीज थोड़ी-सी राहत मिलते ही दवा और थेरेपी छोड़ देते हैं. जहां लोग डायबिटीज या हाई ब्लड प्रेशर जैसी शारीरिक बीमारियों के लिए लंबे समय तक इलाज को गंभीरता से लेते हैं वहीं मानसिक स्वास्थ्य उपचार को लेकर उनका रवैया अस्थिर रहता है.”
कुल मिलाकर झारखंड में आत्महत्या से संबंधित अन्य आंकड़े भी भयावह हैं. NCRB  की रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में पारिवारिक समस्या की वजह से 551 लोगों ने आत्महत्या की. इसके अलावा विवाह संबंधी समस्या की वजह से 388, प्रेम संबंध में असफल होने के कारण 282 और बेरोजगारी की वजह से 193 लोगों ने जान दी.

वहीं बीमारी के कारण डिप्रेशन में जाने और फिर खुद को खत्म करने वालों की संख्या 179 थी. इसके अलावा सामाजिक प्रतिष्ठा में गिरावट के कारण 96, परीक्षा में असफलता के कारण 78, नशाखोरी या शराब की लत के कारण 51 और अन्य कारणों (गरीबी, नपुंसकता, पेशेवर समस्याएं आदि) से 173 लोगों ने आत्महत्या की. कुल मिलाकर पूरे राज्य में 1,991 लोगों ने खुद को खत्म कर लिया.

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