
बीते अप्रैल के दौरान झारखंड की राजधानी रांची के 53 में से 19-20 वार्डों के लोग पानी की किल्लत से हलाकान थे. इसके बाद नगर निगम को 50 टैंकर लगाने पड़े. इसी दौरान नगर प्रशासन ने यह भी स्वीकार किया कि भारी गर्मी के कारण गहरे बोरवेल सूख रहे हैं.
वहीं बीते 22 अप्रैल को रांची के दूसरे सबसे बड़े सरकारी अस्पताल सदर अस्पताल में पानी सप्लाई ठप हो गई थी, क्योंकि अस्पताल के बोरवेल से जरूरी पानी नहीं मिल पाया. फिर अस्पताल प्रबंधन को नगर निगम से करीब 50 हजार लीटर पानी मंगाकर काम चलाना पड़ा.
यह तो शहर का हाल था. अब आते हैं ग्रामीण इलाकों की स्थिति पर. झारखंड की एक बड़ी आबादी इस वक्त चुआं यानी पहाड़ से आए उस पानी पर निर्भर है, जिसे गड्ढे में जमा किया जाता है और फिर पिया जाता है. सबसे गंभीर संकट चतरा जिले में है, जहां लोग गड्ढे में मुंह डालकर पानी पीने को मजबूर हैं. जानवर और इंसान एक ही गड्ढे में जमा पानी पी रहे हैं. साहिबगंज जिले के बरहेट प्रखंड का छोटा पंचकोली गांव और गोड्डा जिले के मोड़ा गांव में लोग इसी चुआं के पानी पर निर्भर हैं. आम जनता को हो रही परेशानी को देखते हुए विपक्ष सक्रिय हो गया है. BJP बीते एक सप्ताह से राज्यभर में इसे लेकर आंदोलन कर रही है.

पानी के संकट को लेकर BJP की ओर से पेश किए गए तथ्यों के मुताबिक केंद्र सरकार ने 2019-2025 के बीच झारखंड को 12,982 करोड़ रुपए आवंटित किए. इसमें राज्य सरकार अब तक केवल 6,010 करोड़ रुपए (लगभग 46.30%) ही खर्च कर सकी है. यानी 7,000 करोड़ रुपए से अधिक की राशि अब भी इस्तेमाल किए बिना पड़ी है. ग्रामीण जलापूर्ति की स्थिति को देखें तो साल 2019 में केवल 3.45 लाख (5.52%) ग्रामीण परिवारों को नल से जल उपलब्ध था. यह 2025 तक बढ़कर 34.42 लाख (55.05%) हो गया, फिर भी लगभग 45% परिवार इससे वंचित हैं.
पार्टी प्रवक्ता अजय शाह दावा करते हैं कि लातेहार, गुमला और गिरिडीह जैसे जिलों में 30% से अधिक परिवारों के पास अब भी जल कनेक्शन नहीं है. वर्ष 2025-26 के लिए 11 लाख घरों तक जल पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन 22,038 घरों (लगभग 2%) में ही नल जल योजना पहुंचाई जा सकी. कुछ जिलों में तो 100 घरों तक भी जल नहीं पहुंचा. यहां तक कि झारखंड राष्ट्रीय औसत से लगभग 25% पीछे है. राष्ट्रीय औसत 81% के मुकाबले झारखंड की प्रगति 55% है. राज्य में 80,000 से अधिक चापाकल खराब पड़े हैं. इनकी मरम्मत की प्रक्रिया शुरू तो हुई, लेकिन बहुत देर से. कई जिलों में हजारों चापाकल वर्षों से खराब पड़े हैं. जलसेवा ऐप के दावे (72 घंटे में मरम्मत) केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं.
दूसरी तरफ रांची की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी भूगर्भीय स्थिति है. रांची अर्बन एग्लोमरेशन पर किए गए एक भूजल अध्ययन में पाया गया कि तेजी से बढ़ते निर्माण और जनसंख्या ने भूजल भंडार पर भारी दबाव डाला है. वहीं कठोर चट्टानी भूभाग और शहरी विस्तार ने पानी के रिचार्ज होने की क्षमता को कम कर दिया है. अध्ययन में 3 से 16 मीटर तक भूजल स्तर गिरने की बात कही गई है.
बिजली आपूर्ति भी मुश्किल बढ़ाई
आंकड़ों के मुताबिक राज्य को इस वक्त 2400 मेगावाट बिजली की जरूरत है. इसके मुकाबले प्रतिदिन 2600 से 2700 मेगावाट बिजली मिल रही है. लेकिन सरप्लस बिजली होने के बाद भी आपूर्ति व्यवस्था खस्ताहाल है. डिमांड बढ़ने के साथ ट्रांसफार्मर पर लोड बढ़ रहा है, लेकिन राज्य में सबग्रिड जरूरत से आधे ही बन पाए हैं. नए सब स्टेशन बनाने के लिए जमीन नहीं मिल रही है. अभी तक अंडरग्राउंड केबलिंग पर सही से काम नहीं हुआ है. ऐसे में लोड बढ़ते ही ट्रांसफार्मर उड़ने लगते हैं. राजधानी रांची के कई मोहल्लों में हर दिन दो से चार घंटे तक बिजली गुल रहती है.
पूरी स्थिति पर पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी कहते हैं, "जनता भीषण जल संकट व बिजली कटौती से त्राहिमाम कर रही है. कई इलाकों में लोग नदी, नाला, डोभा व चुआं से पानी लाने को विवश हैं. केंद्र सरकार की तरफ से दी गई नल-जल योजना की राशि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई है. वहीं बिजली कटौती की स्थिति यह है कि अस्पतालों में डॉक्टर मोबाइल की रोशनी में ऑपरेशन करने को विवश हैं." वे चेतावनी भी देते हैं कि अगर राज्य सरकार पानी-बिजली संकट को लेकर नहीं जागी तो पार्टी पूरे प्रदेश में आंदोलन करेगी.
बिजली-पानी के संकट को लेकर 12 मई को भारी संख्या में BJP नेता और कार्यकर्ता राजधानी रांची की सड़कों पर उतरे. BJP प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू के नेतृत्व में उतरे कार्यकर्ताओं ने इस दौरान हेमंत सरकार की नीतियों के खिलाफ जमकर नारेबाजी की. आदित्य साहू ने कहा, "झामुमो (JMM)-कांग्रेस की सरकार में आज पूरा झारखंड भीषण बिजली-पानी के संकट से जूझ रहा है. राजधानी रांची में प्रशासन द्वारा 100 करोड़ रुपए टैक्स वसूली के बाद भी लोगों को पानी के लिए तरसना पड़ रहा है. यह राजधानी का हाल है तो पूरे झारखंड का क्या हाल होगा?"
जवाब में JMM ने झारखंड में बिजली और पानी की किल्लत के लिए केंद्र सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराया है. पार्टी नेता और पेयजल मंत्री योगेंद्र प्रसाद कहते हैं, "केंद्र सरकार ने जल जीवन मिशन का 6207 करोड़ रुपया अब तक नहीं दिया है. राज्य के कुल 14 सांसदों में 9 BJP के हैं. मैं BJP के इन सांसदों से अपील करता हूं कि वे केंद्र सरकार पर राज्य का बकाया लौटाने का दबाव बनाएं."
वहीं कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष राजेश ठाकुर का कहना है, "BJP पानी के मुद्दे पर तमाशा कर रही है. पानी से संबंधित जो भी टेंडर हुए हैं, वे रघुवर दास सरकार के समय के हैं. पानी से जुड़ी जितनी भी बड़ी योजनाएं लाई गईं, उनमें घोटाले हुए हैं. जाहिर है, ये घोटाले रघुवर दास के समय के हैं."

