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माओवादियों से आत्मसमर्पण कराया लेकिन अपना वादा भूल गई झारखंड सरकार!

झारखंड में आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों के परिवार वालों ने उन वादों की लिस्ट पुलिस विभाग को सौंपी है जो अब तक पूरे नहीं हुए

सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 17 अप्रैल , 2026

बीते 30 मार्च को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा कि भारत अब माओवाद मुक्त हो चुका है. गृह मंत्रालय की ओर से उच्चस्तरीय सुरक्षा समीक्षा बैठक हुई. इसके बाद बीते 8 अप्रैल को नौ राज्यों को भेजे गए आधिकारिक पत्राचार के अनुसार देश का कोई भी जिला फिलहाल माओवादी हिंसा प्रभावित श्रेणी में नहीं है.

हालांकि मार्च के अंत तक दो जिले, छत्तीसगढ़ का बीजापुर और झारखंड का पश्चिमी सिंहभूम, नक्सल प्रभावित माने जाते थे. लेकिन 8 अप्रैल की ताज़ा समीक्षा के बाद यह वर्गीकरण हटा दिया गया है. इधर छत्तीसगढ़ पुलिस के मुताबिक राज्य में बमुश्किल 12 से 13 माओवादी बचे हैं. जो हथियार छोड़ आम जन के बीच घुल-मिल गए हैं.

हालांकि वे कभी भी सरेंडर कर सकते हैं. लेकिन झारखंड में हालात देश के बाकी राज्यों से अलग हैं. पश्चिमी सिंहभूम में माओवादियों का आखिरी दस्ता इस वक्त भी सक्रिय है. लगभग 50 के करीब माओवादी बचे हैं. इसमें एक करोड़ रुपए के ईनाम वाले दो माओवादी पोलित ब्यूरो सदस्य मिसिर बेसरा और सेंट्रल कमेटी सदस्य असीम मंडल शामिल हैं.

हालांकि लड़ाई आखिरी चरण में पहुंच चुकी है. 16 अप्रैल को लगभग 5000 जवानों ने इन 50 माओवादियों को सारंडा जंगल के 10 किलोमीटर के इलाके में घेर लिया है. सर्च ऑपरेशन के दौरान पांच जवान घायल हो चुके हैं. लेकिन इसे आखिरी लड़ाई मानते हुए सुरक्षाबलों ने ओडिशा और झारखंड के सभी रास्तों को घेर लिया है.

इन सबके बीच मूल बात यह है कि माओवाद मुक्त भारत अभियान में बड़ी भूमिका देश के सभी राज्यों की अपनी सरेंडर पॉलिसी की भी रही है. झारखंड में बीते पांच सालों में कुल 104 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया है. समर्पण के दौरान इन माओवादियों से कई तरह के वादे राज्य सरकार की तरफ से पॉलिसी के तहत किए गए थे. लेकिन अब इन माओवादियों के परिजन ने उन वादों की लिस्ट पुलिस विभाग को सौंपी है जो पूरे नहीं हुए हैं.

इसको लेकर हाल ही में आई झारखंड पुलिस की स्पेशल ब्रांच ने एक रिपोर्ट जारी की है. जिसके मुताबिक हजारीबाग ओपन जेल में रह रहे 86 आत्मसमर्पित माओवादियों को उनके हक की सरकारी सुविधाएं और लाभ नहीं मिल पा रहे हैं. स्पेशल ब्रांच द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार हजारीबाग ओपन जेल में विभिन्न जिलों के कुल 86 माओवादी रह रहे हैं. इनमें सबसे अधिक लातेहार से 23 और चाईबासा से 14 हैं. इनके अलावा चतरा से नौ, दुमका से नौ, गिरिडीह से पांच, लोहरदगा से छह, सरायकेला से छह, रांची से चार समेत कई अन्य जिलों के पूर्व माओवादी भी शामिल हैं. इन लोगों ने प्रशासन के समक्ष अपनी समस्याओं की एक लंबी सूची रखी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि सरेंडर नीति के क्रियान्वयन में स्थानीय स्तर पर भारी लापरवाही हो रही है.

स्पेशल ब्रांच की रिपोर्ट में आठ प्रमुख समस्याओं का उल्लेख किया गया है. कई पूर्व माओवादियों का पहचान पत्र या तो बना नहीं है या उसमें गलतियां हैं. इसके अभाव में उनके बैंक खाते नहीं खुल रहे हैं, जिससे उन्हें मिलने वाली आर्थिक सहायता रुकी हुई है. सरेंडर के समय किए गए वादे के बावजूद कोर्ट में लंबित मामलों के निपटारे में देरी हो रही है. साथ ही उनके वकीलों की फीस का भुगतान भी समय पर नहीं किया जा रहा है. सरेंडर नीति के तहत मिलने वाली चार डिसमिल जमीन का आवंटन अधिकांश लोगों को अब तक नहीं हुआ है.

इसके अलावा प्रधानमंत्री आवास या गृह निर्माण सहायता राशि से भी कई लोग वंचित हैं. पूर्व माओवादियों के बच्चों के स्कूल नामांकन और पढ़ने की फीस के भुगतान में समस्या आ रही है. गंभीर बीमारी की स्थिति में सरकारी संस्थानों में मुफ्त इलाज की सुविधा भी सही तरीके से नहीं मिल रही है. योग्यता के अनुसार व्यावसायिक प्रशिक्षण नहीं मिल रहा है. जीवन बीमा जैसी बुनियादी सुरक्षा भी प्रदान नहीं की गई है.

ऐसे में सवाल है कि जिस उत्साह और भरोसे के साथ माओवादियों को आत्मसमर्पण के लिए तैयार किया जाता है, आत्मसमर्पण होने के बाद वह भरोसा दरक क्यों रहा है? पूरी स्थिति पर राज्य की डीजीपी तदाशा मिश्रा ने 16 अप्रैल को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए राज्य के सभी एसपी के साथ बैठक की. बैठक में उन्होंने निर्देश दिया कि आत्मसमर्पण कर चुके माओवादियों के विरुद्ध न्यायालय में लंबित कांडों के निष्पादन के लिए स्पीडी ट्रायल सुनिश्चित करें. साथ ही सरकार द्वारा निर्धारित जितने भी लाभ हैं, उन्हें तत्काल मुहैया कराएं.

डीजीपी ने आदेश दिया कि आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों की व्यक्तिगत समस्याओं के समाधान के लिए अपने-अपने जिले से डीएसपी या उससे ऊपर स्तर के पुलिस पदाधिकारी को नोडल अफसर बनाएं, ताकि उनकी समस्याओं का त्वरित समाधान हो पाए. साथ ही बाकी बचे माओवादियों और उग्रवादियों के आत्मसमर्पण के लिए आत्मसमर्पण नीति का व्यापक प्रचार-प्रसार भी करें.

केंद्र की रिपोर्ट: 37 जिले अब भी निगरानी में

केंद्र सरकार की ओर से जारी रिपोर्ट के मुताबिक देशभर के कुल 9 राज्यों, जिसमें आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल के 37 जिलों को अब “लीगेसी एंड थ्रस्ट डिस्ट्रिक्ट्स” के रूप में वर्गीकृत किया गया है. इसका अर्थ है कि वे अब सक्रिय माओवादी हिंसा से प्रभावित नहीं हैं, लेकिन सुरक्षा और विकास पर लगातार ध्यान देने की आवश्यकता बनी हुई है. झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम जिले को “डिस्ट्रिक्ट ऑफ कंसर्न” श्रेणी में रखा गया है. इसका संकेत है कि उग्रवादी नेटवर्क कमजोर हुए हैं, लेकिन सतर्कता अभी भी जरूरी है.

अधिकारियों का कहना है कि यह नया वर्गीकरण सक्रिय संघर्ष क्षेत्रों से उन इलाकों की ओर बदलाव को दर्शाता है, जहां निरंतर निगरानी और विकास सहयोग की आवश्यकता है.

सरकार ने इस उपलब्धि का श्रेय पिछले एक दशक में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वित प्रयासों को दिया है. साल 2015 की वामपंथी उग्रवाद (LWE) नीति में सुरक्षा अभियान, बुनियादी ढांचा विकास और कल्याणकारी योजनाओं का संयोजन शामिल था, जिसका उद्देश्य माओवादी नेटवर्क को कमजोर करना और प्रभावित क्षेत्रों में शासन व्यवस्था को मजबूत करना था. अब जब कोई भी जिला आधिकारिक रूप से माओवाद प्रभावित घोषित नहीं है, अधिकारियों का कहना है कि भारत ने आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण पड़ाव हासिल कर लिया है, हालांकि चुनिंदा इलाकों में सतर्कता जारी रहेगी.

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