
बीते 25 अप्रैल को अफ्रीकी देश नाइजर में पांच भारतीयों का स्थानीय विद्रोही समूह ने अपहरण कर लिया था. ये सभी मजदूर झारखंड के गिरिडीह जिले के रहने वाले थे और कल्पतरु नाम की भारतीय कंपनी की ओर से वहां ट्रांसमिशन लाइन बनाने का काम कर रहे थे.
ये मजदूर पूरे आठ महीने और 11 दिन तक विद्रोहियों के कब्जे में रहे. बीती 10 जनवरी को इनमें से दो मजदूर वापस अपने घर लौटे. वहीं तीन मजदूर 12 जनवरी को देर शाम घर पहुंचे. हालांकि अभी तक यह साफ नहीं हुआ है कि इन मजदूरों को विद्रोहियों कौन सी मांगें पूरी होने के बाद छोड़ा गया है.

संजय महतो इन्हीं मजदूरों में शामिल थे. विद्रोहियों ने कैसे उनका अपहरण किया था, फिर बीते आठ महीनों में उनके साथ क्या-क्या हुआ, इंडिया टुडे ने महतो से इस सबके बारे में उनसे विस्तार से बात की. यहां हम उन्हीं के अनुभव साझा कर रहे हैं.
"शुरू में ऐसा खाना दिया कि एक निवाला तक नहीं निगल पाए"
संजय महतो बताते हैं : हम उस दिन भी आम दिनों की तरह नाइजर में काम कर रहे थे. यह 25 अप्रैल की बात है. दोपहर को हमने खाना खाया और दोबारा काम शुरू किया. हमारी सुरक्षा में वहां नेशनल गार्ड की छह गाड़ियां थीं, जिनमें 30 सुरक्षाकर्मी थे. अचानक वहां 50 से अधिक बाइकों पर सवार 100 के लगभग आतंकवादी पहुंच गए. दोनों तरफ से ताबड़तोड़ गोलीबारी होने लगी. नेशनल गार्ड भाग गए. हम पांच मजदूरों को उन्होंने पकड़ लिया. उन्होंने सबसे पहले पीछे तरफ करके हमारे हाथ बांधे और फिर आंखों पर पट्टियां बांध दीं. फिर हम लोगों को बाइकों पर बिठाकर अपने साथ ले गए. उन सभी के साथ AK-47 गन, चाकू और कई दूसरे हथियार थे.
बाइक पर बिठाकर लगभग चार घंटा चलते रहे. फिर कहीं रोका गया, पानी पिलाया गया और फिर बाइक पर सफर शुरू हो गया. रातभर ऐसे ही चलते रहे. अगले दिन 10 बजे के आसपास हमें एक जगह पर रखा गया. शायद वह उनका अड्डा था. जैसे ही बाइक से हमें उतारा गया, हम बदहवासी में चिल्लाने लगे. लगभग 14 घंटे तक हमारे हाथ बंधे थे. हमारा पूरा शरीर दर्द कर रहा था. हमें खाना दिया गया, लेकिन हमने मना कर दिया. डर और तनाव इतना था कि कुछ खाने का मन नहीं कर रहा था. फिर हमारे लिए कपड़े लाए गए. हमारे कपड़े फेंक दिए गए. गले में जो माला, हनुमान जी का लॉकेट था, सब चाकू से काट कर फेंक दिया गया.
हमारे साथ एक नाइजर का नागरिक भी अपहृत हुआ था जो कल्पतरू कंपनी में ही काम करता था. हम कुल छह लोग थे. सभी को दो-दो की जोड़ी में अलग-अलग जगहों पर बिठा दिया गया. कुछ दिन बाद हमें फिर कहीं और ले जाया गया. यह शायद उनका पुराना अड्डा था. अब हमारे हाथ खोल दिए गए, आंखों से पट्टी भी हटा दी. यहां बहुत पुरानी बंदूकें, कई मशीन गन, तोप जैसे हथियार बड़ी संख्या में रखे थे. फिर हमें खाना दिया गया, जिसमें न तो नमक था न चीनी. दो बार खाने की कोशिश किए लेकिन खा नहीं पाए.
अब हम सभी छह लोगों को एक साथ बिठा दिया गया. अगले उन्होंने कहा कि वे खाना बना रहे हैं उसे खाना पड़ेगा नहीं तो वे हमें राशन देंगे और हम अपना खाना खुद बना सकते हैं. आखिरकार हमने उनसे चावल मांगा. उसे पकाकर मांढ़ भात खा लिया. कुछ दिन ऐसा ही चलता रहा. ऐसा देख उन लोगों ने पूछा कि क्या खाना है, तो हमने कहा कि ब्रेड, दूध और बिस्किट चाहिए. उन्होंने हमें वह सब लाकर दे दिया. फिर पूछा कि और क्या खाते हो, तो हमने चावल, आटा, सब्जी, तेल और मसाले की डिमांड की. जिसे अगले दिन उन लोगों ने पूरा कर दिया. बर्तन दिया गया. अब हम सब अपना खाना खुद बनाकर खाने लगे, फिर दो महीने के लिए हम तीन लोगों को एक साथ और दूसरे तीन लोगों को दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया गया.
जून के साथ ही वहां बरसात का मौसम आ गया. इस दौरान हम सभी लोगों को एक साथ कर दिया गया. अब तक उन विद्रोहियों का व्यवहार हमारे साथ नरम होने लगा. कुछ दिनों बाद हर हफ्ते हमें बकरा काट कर दिया जाने लगा. यहां तक कि यह भी पूछा जाने लगा कि बकरे के किस हिस्से का मांस चाहिए. मांस प्रति व्यक्ति के हिसाब से तौल कर दिया जाता था. हालांकि अगर कम पड़ता था, तो हम मांग लेते थे. इस दौरान जो हमारे साथ नाइजर का अपहृत बंदा था, वही उनकी भाषा सुनकर टूटी-फूटी अंग्रेजी में ट्रांसलेट करता था. हम भी टूट-फूटी ही समझ पाते थे. हां, लेकिन इतना था कि खाने और जीने भर तक जितनी जरूरी बातें थी, वो हो जाया करती थी. गलत काम तो वे लोग कर रहे थे, लेकिन दिल के साफ लोग थे.
"जानवरों के पेशाब वाला पानी पीकर बिताए आठ महीने"
अशोक महतो आगे यह भी बताते हैं : हमें वहां ठीक के रखा जा रहा था. लेकिन दो बातों की दिक्कत ऐसी थी, जिसे झेलना हमारे लिए बहुत मुश्किल था. पहला ये कि वहां साफ पानी मिलता ही नहीं है. पानी ऐसा मिलता था जो आपने जीवन में कभी नहीं पिया. किसी गड्ढे में जमा पानी, जिसमें कीचड़ भरपूर होता था. जिसमें जानवर पेशाब तक कर देते थे. यहां तक कि गाय, भैंस उस पानी से गुजरते हुए उसे और मटमैला कर देते थे. वही पानी प्लास्टिक के डब्बे में भरकर लाया जाता था, वही पीना पड़ता था. यह बात जरूर है कि अपहरण करनेवाले हथियारबंद लोग भी वही पानी पीते थे. दूसरी समस्या थी कि वे हमारा फोन तोड़ चुके थे, कहीं बात नहीं करने देते थे.
उनका साफ-साफ कहना था कि जो हम खाएंगे, वही तुम लोगों को खिलाएंगे और जब तक उनके पास हैं, वे हमें मरने नहीं देंगे. इसी दौरान उन्होंने बताया कि उनकी दुश्मनी सिर्फ नाइजर सरकार से है. फिर एक दिन अचानक कहने लगे कि अपने देश की सरकार से बात कराओ. हम मजदूर लोग कहां से और किससे बात कराते? हालांकि हमने उनसे यह बात जरूर कही कि हमारा देश बहुत बड़ा है, हमारी वजह से हम अपने देश को यहां तुम्हारे सामने झुकने को नहीं कहेंगे, चाहे हम यहीं क्यों न मर जाएं. बीच-बीच में आतंकवादियों का जो मुख्य आदमी था, वह मिलने आता था. हर बार वह हाथ जोड़ कर नमस्कार बोलता था.
उन आठ महीनों के दौरान हम यही सोचते थे कि हमारे बच्चे क्या कर रहे होंगे, पत्नी कैसे रहती होगी. कौन जिंदा होगा, नहीं होगा. इस बीच इन लोगों ने बोला कि वे हमें एक-दो साल रखेंगे, फिर छोड़ देंगे. हम लोगों ने मान लिया था कि दो साल से पहले यहां से नहीं छूटने वाले. बीते 25 दिसंबर को उन्हीं का जो लीडर था वो आया. फिर हमें बारी-बारी से खड़ा किया गया और परिवार के बारे में पूछा. इसका उन्होंने वीडियो बनाया. अंत में कहा कि "यू इंडिया गो, नो प्रॉब्लम. इंशाअल्लाह तुम लोग बहुत जल्द इंडिया चला जाएगा.”
फिर छह जनवरी को खाना खा कर आराम करने जा रहे थे, तभी देखा कि बड़ी संख्या में वही लोग बाइक से आ रहे थे, जा रहे थे. हमें कहा गया कि तैयार हो जाओ, हम तुम्हें छोड़ने जा रहे हैं. हमें लगा मजाक कर रहे हैं. तो उन्होंने कहा कि सच में छोड़ने जा रहे हैं. फिर बाइक पर बिठाया और देर रात होने पर हमें जंगल में ही रखा. रात में मुर्गा चावल बनाकर दिया. फिर दूध पीने को कहा, जिसे हमने मना कर दिया. फिर खजूर दिया, उसे हमने खाया.
हमें सखोरा गांव से किडनैप किया गया था. अगले दिन ठीक वहीं लाकर छोड़ दिया और एक मोबाइल के साथ लोकल सिम कार्ड दिया. फिर हमने सबसे पहले नाइजर के भारतीय दूतावास में फोन किया. हमने उन्हें बताया कि हम वही पांच लोग हैं जिनका अपहरण कर लिया गया था. फिर एंबेसी वालों ने कंपनी के लोगों का नंबर लिया. कंपनी के स्टोर मैनेजर को फोन किया.
उन्होंने हमारे लिए गाड़ी भेजी. कंपनी में आने पर सबने गले लगाकर स्वागत किया. सब लोग बहुत खुश थे. इसके बाद वहां के पुलिस अधिकारी ने हमसे पूछताछ की. उन्होंने भी गले लग कर बधाई दी. कंपनी ने हम सबको मुंबई के लिए टिकट दिया. यहां हम कंपनी के मुंबई स्थित ऑफिस पहुंचे. कंपनी ने हमें आठ महीने की सैलरी दी और एक मोबाइल दिया. हमें दो महीने की और सैलरी देने का वादा किया गया है. हालांकि अब हम कभी अफ्रीकी देशों में काम करने नहीं जाएंगे. अरब देशों में चले जाएंगे, लेकिन अफ्रीका नहीं जाएंगे.

