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झारखंड में डॉक्टरों की कमी दूर करने के तरीके पर मेडिकल स्टूडेंट क्यों हैं आक्रोशित?

झारखंड सरकार चाहती है कि वहां के मेडिकल कॉलेजों से पढ़ाई पूरी करने वाले डॉक्टर कम से कम पांच साल राज्य में ही प्रैक्टिस करें, जबकि जूनियर डॉक्टर इसका विरोध कर रहे हैं

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झारखंड में डॉक्टरों की भारी कमी है
अपडेटेड 5 जनवरी , 2026

झारखंड में डॉक्टरों की कमी को देखते हुए स्वास्थ्य मंत्री डॉ इरफान अंसारी ने हाल ही में कहा कि राज्य सरकार एक नियम लेकर आ रही है. इसके तहत झारखंड के मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई पूरी करनेवाले छात्रों को झारखंड में ही पांच साल प्रैक्टिस करने की बाध्यता होगी. 

स्वास्थ्य मंत्री का तर्क था इन छात्रों की पढ़ाई पर राज्य सरकार अच्छी-खासी रकम खर्चा करती है. लेकिन पढ़ाई पूरी होने के बाद अधिकतर डॉक्टर राज्य से बाहर चले जाते हैं या फिर निजी हॉस्पिटल में काम करने लग जाते हैं. राज्य के सरकारी अस्पतालों में ये सेवा नहीं देते जिससे डॉक्टरों की कमी हमेशा रहती है. 

स्वास्थ्य मंत्री की इस घोषणा (झारखंड में काम करने के लिए बॉन्ड भरवाना) का राज्य के सबसे बड़े मेडिकल संस्थान राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (रिम्स) के जूनियर डॉक्टरों ने विरोध करना शुरू कर दिया है. उनका कहना है कि राज्य सरकार अगर इस घोषणा को वापस नहीं लेती तो वे बेमियादी हड़ताल पर बैठ जाएंगे. जूनियर डॉक्टर एसोसिएशन (जेडीए) के अध्यक्ष डॉ जितेंद्र कुमार कहते हैं, “सरकार मौजूदा स्वास्थ्य प्रणाली की विफलता का बोझ मेडिकल स्नातकों पर डाल रही है, जो कहीं से भी उचित नहीं है. पहले ही PG कर रहे चिकित्सकों को 3 साल की बॉन्ड सर्विस देनी पड़ रही है जो अपने आप में ही हतोत्साहित करने वाली बात है. ताजा घोषणा के बाद MBBS छात्रों को भी 5 साल की बॉन्ड सेवा देनी होगी.’’

जितेंद्र सवाल उठाते हैं, ‘’क्या मेडिकल की पढ़ाई कर रहे है छात्रों से जबरन श्रम कराना उचित है? अगर स्वास्थ्य व्यवस्था की गुणवत्ता को सुधारना है तो यहां के मेडिकल कॉलेजों से उत्तीर्ण हुए विशेषज्ञ चिकित्सकों के लिए स्थायी नियुक्ति का प्रावधान किया जाए और चिकित्सकों के लिए एक भयमुक्त वातावरण के साथ-साथ मूलभूत सुविधाओं का प्रबंध किया जाए.’’ 

जेडीए की उपाध्यक्ष डॉ. रुचि निधि मिंज एक अलग दलील देती हैं, “सरकार कई बार इस बात का हवाला देती है कि एक MBBS छात्र को पढ़ाने में सरकार बहुत खर्च करती है, लेकिन एक IIT/NIT इंजीनियर या IIM मैनेजमेंट कोर्स में भी शायद उतना ही खर्च होता है. परंतु दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि केवल मेडिकल स्नातकों को बॉन्ड सेवा देनी पड़ती है.’’ 

संवैधानिक अधिकार और नैतिक जिम्मेदारी में अहम क्या 

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) के मुताबिक झारखंड में कुल 10 मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की सीटों की संख्या 1255 है. वहीं फीस की बात करें तो रिम्स में पढ़ाई की फीस सालाना 10 हजार रुपए, वहीं हॉस्टल फीस प्रति तीन साल पर 30-40 हजार रुपए है. 

राज्य की बदहाल स्वास्थ्य सेवा के मद्देनजर बड़ी संख्या में डॉक्टरों की कमी है. ऐसे में क्या झारखंड में पढ़ाई कर रहे मेडिकल छात्रों की नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे राज्य में सेवा दें? डॉ जितेंद्र खुद झारखंड के गिरिडीह जिले के रहनेवाले हैं. राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं की बदतर स्थिति से पूरी तरह वाकिफ हैं. इस सवाल पर वे कहते हैं, “पढ़ाई के दौरान ही मैंने सीएचसी, पीएचसी में काम किया है. वहां डॉक्टर तो बहाल कर दिए जाते हैं, लेकिन सुविधाएं बिल्कुल भी नहीं दी जातीं. कहीं नर्स नहीं होतीं तो कहीं मशीनें. डॉक्टरों के रहने की उचित्त सुविधा नहीं होती. पहले इसे ठीक किया जाना जरूरी है. ‘’

जितेंद्र आगे यह भी कहते हैं, “हाल में बोली लगाकर डॉक्टरों की सैलरी तय की गई और फिर उन्हें जिलों में बहाल किया गया. लेकिन यह भी स्थाई नौकरी नहीं, बल्कि कॉन्ट्रैक्ट पर ही है. भला इतनी पढ़ाई करने के बाद कोई परमानेंट नौकरी तो चाहेगा ही न. और सबसे अहम बात कि कोई भी सरकार किसी छात्र को उच्च शिक्षा ग्रहण करने के अधिकार को वंचित नहीं कर सकती.’’ 

रांची सदर अस्पताल में कार्यरत एक डॉक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर डॉक्टरों के पक्ष की व्यवहारिकता को पूरे विस्तार से समझाया. उनके मुताबिक एमबीबीएस पूरा करने में पांच साल लगते हैं. इसके बाद पीजी में तीन साल और फिर सुपर स्पेशिएलिटी कोर्स को करने में तीन साल लगते हैं. यानी कुल पढ़ाई 11 साल की हो गई. अब मंत्री की शर्तों अनुसार इसको समझते हैं. एमबीबीएस के बाद पांच साल की बाध्यता अगर लागू होती है, तब पांच साल कोर्स और पांच साल राज्य में सेवा. यानी कुल दस साल के बाद कोई डॉक्टर पीजी की पढ़ाई कर पाएगा? पीजी की तीन साल की पढ़ाई और यहां तीन साल राज्य में काम करने की बाध्यता पहले से है. सवाल है कि क्या वह फिर छह साल बाद सुपर स्पेशिएलिटी कोर्सों की पढ़ाई कर पाएगा. 

यही डॉक्टर दावा करते हैं कि ऐसी बाध्यता देश के किसी राज्य में नहीं है. देश के दूसरे छात्र जब सुपर स्पेशियलिटी कोर्स पूरा कर चुके होंगे, झारखंड में पढ़े छात्र इसकी शुरूआत भी नहीं कर पाएंगे. स्वास्थ्य मंत्री की ऐसी सोच तब है, जब कि राज्य के सबसे बड़े अस्पताल में एक मंत्री को पेट संबंधी समस्या हुई तो उन्हें इलाज के लिए बैंगलुरू जाना पड़ा, क्योंकि यहा गैस्ट्रो डिपार्टमेंट ही नहीं है. सरकार को बॉंन्ड की बाध्यता के बदले सभी मेडिकल कॉलेजों में पीजी की सीट बढ़ानी चाहिए और सुपर स्पेशिएलिटी कोर्सों को तत्काल शुरू करना चाहिए. राज्य में डॉक्टरों की संख्या अपने आप ही बढ़ जाएगी. इन्हीं डॉक्टर के मुताबिक जब छात्र मेडिकल में समय रहते उच्च शिक्षा ले ही नहीं पाएंगे, तो राज्य को विशेषज्ञ डॉक्टर मिलेंगे कैसे. 

जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल की धमकी के बाद स्वास्थ्य मंत्री डॉ इरफान अंसारी का कहना है, ‘’राज्य में पढ़ाई कर रहे मेडिकल छात्रों को राज्य के मरीजों के बारे में सोचना चाहिए. वे शिक्षा यहां लेते हैं और नौकरी करने बाहर चले जाते हैं. इस व्यवस्था में सुधार लाना बेहद जरूरी है. अभी तो हमने इसकी घोषणा की है, लेकिन लागू करने से पहले अध्ययन करना है. सभी पक्षों की राय लेनी है. मैं जूनियर डॉक्टरों से भी राय-मशवरा लूंगा. इसके बाद ही नियम लागू होगा. सरकार ऐसा बिल्कुल नहीं चाहेगी कि किसी छात्र की उच्च शिक्षा ग्रहण करने के अधिकार को कुचला जाए. ‘’

इधर जूनियर डॉक्टरों के इस तर्क से तो सहमत हुआ जा सकता है कि उच्च शिक्षा ग्रहण करना उनका संवैधानिक अधिकार है, जिसे कोई भी सरकार खत्म नहीं कर सकती. लेकिन उनके इस तर्क से सहमत होना मुश्किल है कि इंजीनियर, मैनेजमेंट के छात्रों पर जब किसी तरह का कोई बॉंन्ड नहीं है तो उनपर भी नहीं होना चाहिए. जबकि इंजीनियरिंग किए छात्रों का काम, मैनेजमेंट पढ़े छात्रों का काम दैनिक जीवन में किसी आम नागरिक के जीवन-मरण से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ नहीं है.

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