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जब सात महीने की मासूम को कंधे पर सुलाए सरेंडर करने पहुंची महिला माओवादी!

झारखंड में एक साथ 25 माओवादियों ने सरेंडर किया है और इन्हीं में एक महिला माओवादी अपने साथ सात महीने की बच्ची लेकर पहुंची थी

Maoist Surrender in Jharkhand (Photo : Ramiz and Abhishek Karn)
माओवादी रहीं वंदना अपनी सात महीने की बच्ची के साथ सरेंडर के बाद (फोटो : रमीज/अभिषेक कर्ण)
अपडेटेड 21 मई , 2026

मई की 21 तारीख झारखंड पुलिस के लिए मील का पत्थर कही जा सकती है. रांची स्थित पुलिस मुख्यालय में सुबह आठ बजे से ही काफी हलचल थी. राज्य की डीजीपी तदाशा मिश्रा सहित झारखंड पुलिस के सीनियर अधिकारी, सीआरपीएफ के अधिकारी और माओवाद प्रभावित कई जिलों के एसपी लगातार पहुंच रहे थे. इसी दौरान एक पुलिस बस भी पहुंची, जिसमें सरेंडर कर चुके 25 माओवादी सवार थे.

लेकिन एक दृश्य माओवाद सरेंडर के इतिहास में शायद हमेशा याद रखा जाएगा. हुआ यूं कि सरेंडर करने के लिए जब महिला माओवादी शांति उर्फ वंदना मंच पर पहुंची तो उनके हाथ में किसी हथियार की जगह सात महीने का बच्चा था. एक तरफ मां पुलिस अधिकारियों से गुलदस्ता ले रही थी तो दूसरी तरफ बच्चा आराम से मां के कंधे पर सो रहा था.

यह दृश्य देखते ही मीडिया के कैमरे उसकी तरफ घूम गए. पुलिस अधिकारी मुस्कुराकर मां और बच्चे का स्वागत करते रहे. शायद इसी वजह से पुलिस ने इसे ऑपरेशन नवजीवन नाम दिया.

शांति के साथ उसके पति बिंज हांसदा उर्फ दर्शन ने भी सरेंडर किया है. नाम नहीं छापने की शर्त पर एक पुलिस अधिकारी ने बताया, “बच्चा होने के बाद शांति तत्काल माओवादी दस्ते से बाहर निकलना चाहती थी. दोनों पति-पत्नी अपने बच्चे के भविष्य को लेकर काफी चिंतित थे. उन्होंने खुद पुलिस से संपर्क किया और हमने उन्हें सरेंडर करने के लिए कहा. परिणाम आपके सामने है. हमने कोशिश की कि उन्हें सरेंडर करना किसी अपराध की तरह न लगे, बल्कि एक सकारात्मक माहौल का एहसास हो. इसलिए सरेंडर करने वाले माओवादियों के परिजनों को भी इस मौके का गवाह बनाया गया और उन्हें पूरा सम्मान दिया गया.”

सरेंडर करने वालों में 23 भाकपा-माओवादी के सदस्य थे, जबकि बाकी दो अन्य राज्य में सक्रिय उग्रवादी संगठन जेजेएमपी के सदस्य थे. इनमें पांच लाख रुपए के इनामी माओवादी सागेन आंगारिया उर्फ दोकोल, गादी मुंडा उर्फ गुलशन, नागेंद्र मुंडा उर्फ प्रभात मुंडा, रेखा मुंडा उर्फ जयंती और सुलेमान हांसदा उर्फ सुनी हांसदा शामिल हैं. दो लाख रुपए के इनामी करण उर्फ डांगर और एक लाख रुपए की इनामी बासुमति जेराई भी शामिल हैं.

इनमें छह सब-जोनल कमांडर, छह एरिया कमांडर और 13 हार्डकोर माओवादी शामिल हैं. सरेंडर करने वालों में सागेन आंगारिया दस्ता, गुलशन मुंडा दस्ता और मिसिर बेसरा दस्ता के सदस्य शामिल हैं. इनके पास से एक इंसास एलएमजी, चार इंसास राइफल, नौ एसएलआर, एक .303 राइफल और एक देसी पिस्टल बरामद की गई है. इसके अलावा 27 मैगजीन, इंसास की 2000 गोलियां और एसएलआर की 755 गोलियां भी मिली हैं. इस सरेंडर के बाद अब कोल्हान-सारंडा के जंगलों में एक करोड़ के इनामी माओवादी मिसिर बेसरा सहित कुल 35 माओवादी बचे हैं.

पुलिस सूत्रों के मुताबिक, आगामी 10 से 15 दिनों के भीतर कुछ और माओवादी सरेंडर कर सकते हैं. इस बार इनकी संख्या 10 से 15 के बीच हो सकती है. ये सभी पुलिस के संपर्क में हैं और कभी भी जंगल से बाहर आकर सरेंडर कर सकते हैं.

सरेंडर करने के बाद महिला माओवादी और एक लाख रुपए की इनामी बासुमति जेराई ने बताया, “मैं साल 2018 में संगठन से जुड़ी थी. गांव का ही एक व्यक्ति राजू था जिसके साथ मैं अपनी इच्छा से संगठन में शामिल हुई थी. संगठन में मेरा काम संतरी ड्यूटी और खाना बनाने का था. इस दौरान मैं कई मुठभेड़ों में भी शामिल रही लेकिन मैंने कभी गोली नहीं चलाई और न ही मुझे गोली लगी. मैं हर बार बचकर निकल जाती थी.”

वहीं, एक अन्य माओवादी और पांच लाख रुपए के इनामी गादी मुंडा उर्फ गुलशन ने बताया, “उस समय एसपीओ ने काफी दबाव बनाया था. ऐसे में मैं साल 2014 में अपनी जान बचाने के लिए माओवादी संगठन से जुड़ गया. मेरा मुख्य काम संगठन के लिए राशन और अन्य जरूरी सामान लाना, पेट्रोलिंग करना और संतरी ड्यूटी लगाना था. बीते कुछ वर्षों में हमें समझ आ गया कि किसी तरह की क्रांति नहीं होने वाली है. इसलिए हमने सरेंडर कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया.”

एक साथ इतने माओवादियों का सरेंडर कैसे कराया गया

बीते छह महीनों में शायद ही कोई दिन रहा हो जब पश्चिमी सिंहभूम में माओवादियों की तलाश में छापेमारी अभियान न चलाया गया हो. जब भी माओवादियों ने अपने सुरक्षित ठिकानों से बाहर निकलने की कोशिश की, उनका सामना पुलिस और सुरक्षाबलों से हुआ. इसमें सीआरपीएफ के आईजी साकेत सिंह और पश्चिमी सिंहभूम के एसपी अमित रेणु की भूमिका काफी अहम मानी जा रही है.

बतौर एसपी अमित रेणु ने बीते छह महीनों में सबसे पहले यह सुनिश्चित किया कि माओवादियों को ग्रामीणों का सहयोग लगभग खत्म हो जाए. इसके लिए उन्होंने इलाके के आदिवासियों का भरोसा जीतने पर काम किया. कम्युनिटी पुलिसिंग को बढ़ावा दिया गया. बीते छह महीनों में पूरे इलाके में 40 पुलिस कैंप स्थापित किए गए.

सरेंडर से जुड़े इस कार्यक्रम में माओवादियों के परिवार वालों को भी बुलाया गया था
सरेंडर से जुड़े इस कार्यक्रम में माओवादियों के परिवार वालों को भी बुलाया गया था

पुलिस कैंप पहुंचे तो उनके साथ बिजली, पानी और दवाइयों जैसी सुविधाएं भी पहुंचीं. लोग पुलिस पर भरोसा करने लगे और कैंपों में आकर मदद लेने लगे. इसका असर यह हुआ कि अब लोग खुद आगे आकर पुलिस को सूचनाएं दे रहे हैं. इन्हीं सूचनाओं के आधार पर इंटेलिजेंस एजेंसियों की मदद से माओवादियों से संपर्क किया गया और उन्हें सरेंडर के लिए तैयार किया गया.

झारखंड में साल 2026 में लगातार चलाए गए अभियानों के दौरान अब तक कुल 44 माओवादियों को गिरफ्तार किया गया है. वहीं, 29 माओवादियों ने पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण किया है. जबकि पुलिस मुठभेड़ों में कुल 22 माओवादी मारे गए हैं.

देश के एकमात्र माओवाद प्रभावित जिला पश्चिमी सिंहभूम में बची हुई माओवादी गतिविधियों पर अंकुश लगाने और लोगों के मन में सुरक्षा की भावना बनाए रखने के लिए सारंडा क्षेत्र में 21 नए एडवांस कैंप लोकेशन (ACL) और फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस (FOB) सुरक्षा कैंप भी स्थापित किए गए हैं.

झारखंड पुलिस के अभियान के दबाव में आकर कुछ माओवादियों ने तेलंगाना और पश्चिम बंगाल में भी आत्मसमर्पण किया है. पश्चिम बंगाल के समर दा ने बंगाल में सरेंडर किया, जबकि मुर्शिदाबाद की बेला सरकार को गिरफ्तार किया गया था. आंध्र प्रदेश निवासी विश्वनाथ उर्फ संतोष और पूनम उर्फ जोभा ने तेलंगाना में सरेंडर किया है. इन सभी के खिलाफ चाईबासा में केस दर्ज हैं. इनमें सबसे ज्यादा 13 केस विश्वनाथ पर, 11 केस पूनम पर और तीन-तीन केस समर और बेला पर दर्ज हैं.

झारखंड पुलिस ने बाकी बचे माओवादियों से अपील की है कि वे हिंसा और ब्लैकमेलिंग का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटें और झारखंड सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति का लाभ उठाएं.

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