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अमरावती को राजधानी का कानूनी दर्जा क्या इससे जुड़े विवाद को खत्म कर देगा?

आंध्र प्रदेश की राजधानी को लेकर संसद में विधेयक पास होने के बाद मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने जोर देकर कहा कि राजधानी को अब अमरावती से 'एक इंच भी नहीं हटाया जा सकता'

सीएम एन चंद्रबाबू नायडू (फाइल फोटो)
सीएम एन चंद्रबाबू नायडू (फाइल फोटो)
अपडेटेड 8 अप्रैल , 2026

दो साल से भी कम समय में दूसरी बार अमरावती में उत्सव का माहौल छा गया है. इसकी बड़ी वजह यह है कि 2 अप्रैल 2026 को संसद ने अमरावती को लेकर एक विधेयक पारित किया, जिसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी मंजूरी दे दी है.

इसके तहत गुंटूर जिले में 217 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को आंध्र प्रदेश की एकमात्र और स्थाई राजधानी का वैधानिक दर्जा मिला है. इससे पहले अमरावती के लोगों में यह खुशी जून 2024 में देखने को मिली थी, जब तेलुगु देशम पार्टी (TDP) ने चुनाव में जीत हासिल की थी.

ऐसा इसलिए क्योंकि जगन मोहन रेड्डी सरकार ने नायडू के सपनों की राजधानी से जुड़ी परियोजना को रोक रखा था. अमरावती अब शायद भारत की एकमात्र ऐसी राज्य राजधानी है, जिसे एक कानून में संशोधन के माध्यम से विशेष रूप से राजधानी का दर्जा मिला है. यह संशोधन आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम, 2014 के तहत किया गया है.

2 अप्रैल को अमरावती में मनाया गया उत्सव स्वाभाविक ही था, क्योंकि नायडू के पिछले कार्यकाल के दौरान स्थानीय लोगों ने राजधानी के लिए कृष्णा नदी के किनारे अपनी 33,000 एकड़ उपजाऊ जमीन सरकार को दी थी. उन्हें उम्मीद थी कि भव्य नई राजधानी उनकी जमीन पर बनेगी. इससे पूरे शहर और आसपास रहने वाले लोगों का विकास होगा. हालांकि, 2019 में जगन रेड्डी के सत्ता संभालने के बाद यह विशाल परियोजना व्यावहारिक रूप से रद्द कर दी गई.

आंध्र प्रदेश को लंबे समय से एक नई राजधानी की आवश्यकता थी, क्योंकि 2014 में आंध्र प्रदेश से अलग होने वाले तेलंगाना के हिस्से में हैदराबाद आया. हालांकि, आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम के तहत इस प्रमुख आईटी हब को 2024 तक दोनों राज्यों की संयुक्त राजधानी घोषित किया गया था. इसके बावजूद नायडू आंध्र प्रदेश के लिए जल्द से जल्द अपनी राजधानी बनाना चाहते थे.

यही कारण है कि आंध्र प्रदेश के बंटवारे के बाद मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने विजयवाड़ा और गुंटूर शहरों के बीच के क्षेत्र में राजधानी अमरावती बनाने का फैसला किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर 2015 में उद्दंडारयुनिपालेम गांव में अमरावती परियोजना का उद्घाटन किया था.

उद्दंडारयुनिपालेम उन 29 गांवों में से एक है, जहां के लोगों ने अमरावती प्रोजेक्ट के लिए अपनी जमीन दी है. निर्माण कार्य तय समय पर चल रहा था, लेकिन 2019 के चुनावों के बाद सत्ता परिवर्तन के कारण काम रुक गया. वास्तुकला से लेकर बुनियादी ढांचे तक जगन रेड्डी सरकार ने कई कंपनियों का टेंडर रद्द कर दिया. इनमें प्रसिद्ध सिंगापुर कंसोर्शियम भी शामिल है. इसके कारण लगभग पूरी हो चुकी इमारतों को भी अधूरा छोड़ दिया गया.

जगन मोहन रेड्डी ने अमरावती को राजधानी चुने जाने का विरोध किया था. रेड्डी ने अमरावती के बदले आंध्र प्रदेश के लिए तीन राजधानी बनाने की बात कही थी, जिसपर खूब विवाद हुआ था. इस योजना के तहत, राज्य की कार्यपालिका उत्तरी आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम में बनाने की बात कही गई थी. जबकि न्यायपालिका रायलसीमा के कुरनूल में और विधायिका यानी विधानसभा अमरावती में बनाई जानी थी.

हालांकि, जगन रेड्डी के पांच साल के शासनकाल के दौरान, अमरावती प्रोजेक्ट के लिए जमीन देने वाले किसानों ने तीन राजधानियों की योजना के खिलाफ आंदोलन किया. बाद में कानूनी चुनौतियों के कारण यह परियोजना बीच में ही अटक गई. इन किसानों का 1,631 दिनों का विरोध प्रदर्शन 12 जून, 2024 को समाप्त हुआ, जिस दिन नायडू ने फिर से मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली.

पिछले साल नायडू ने इस ग्रीनफील्ड कैपिटल प्रोजेक्ट को फिर से प्रमुखता दी और मोदी ने मई में इसका फिर उद्घाटन किया. निर्माण कार्य फिर से शुरू हो गया है और नायडू के 2028 तक मूलभूत बुनियादी ढांचे को पूरा करने के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए तेजी से इसका काम आगे बढ़ रहा है. हालांकि, TDP के नेता और स्थानीय लोग युवजन श्रमिक रायथू कांग्रेस पार्टी (YSRCP) के अमरावती प्रोजेक्ट के खिलाफ विरोध की भावना को लेकर डरे हुए हैं. उन्हें डर है कि कहीं फिर से इस प्रोजेक्ट के खिलाफ राज्य में विरोध प्रदर्शन ना शुरू हो जाए.

इन्हीं परिस्थितियों में NDA गठबंधन की सबसे बड़ी सहयोगी TDP ने मोदी सरकार पर अमरावती को राजधानी का दर्जा देने के लिए दबाव डाला. 28 मार्च को आंध्र प्रदेश विधानसभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से आंध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम की धारा 5 में संशोधन करने का अनुरोध किया, जिसमें 'अमरावती में' शब्द को शामिल किया जाए.

साथ ही उन्होंने आग्रह किया कि अमरावती में आंध्र प्रदेश राजधानी क्षेत्र विकास प्राधिकरण अधिनियम 2014 के तहत अधिसूचित राजधानी शहर क्षेत्र भी शामिल है, इस वाक्य को भी जोड़ा जाए.

कुछ ही दिनों के भीतर, लोकसभा और राज्यसभा ने ध्वनि मत से आंध्र प्रदेश पुनर्गठन (संशोधन) अधिनियम, 2026 पारित कर दिया, जिसमें YSRCP एकमात्र उल्लेखनीय विरोधी पार्टी थी. नायडू ने जोर देकर कहा, "राजधानी को अब यहां से एक इंच भी नहीं हटाया जा सकता है." उन्होंने अधिनियम के पारित होने को एक ऐतिहासिक क्षण बताया और इस कानून के लिए मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को धन्यवाद दिया.

नायडू ने 2 अप्रैल को अपनी पत्नी भुवनेश्वरी के साथ अमरावती की आधारशिला स्थल उद्दंडारयुनिपालम का दौरा करने के दौरान कहा, “अमरावती का आत्मसम्मान विजयी हुआ है. आज राजधानी को संसद के जरिए समर्थित एक अपरिवर्तनीय कानूनी दर्जा प्राप्त हो गया है.” नायडू ने YSRCP की जमकर आलोचना करते हुए कहा, "अनेक साजिशों का सामना करने के बाद, हमने अपनी राजधानी वापस हासिल कर ली है." हालांकि, विपक्षी दल के प्रमुख जगन रेड्डी अब भी इस मुद्दे पर पीछे हटने को तैयार नहीं हैं. नायडू जहां अमरावती को 'प्रजा-राजधानी' बताते हैं, वहीं पूर्व मुख्यमंत्री अमरावती को भ्रष्टाचार की राजधानी करार देते हैं.

मीडिया को संबोधित करते हुए जगन रेड्डी ने अपने इस रुख को दोहराया और कहा कि चंद्रबाबू ने अभूतपूर्व और अव्यावहारिक नीतियां बनाईं. साथ ही उन्होंने कहा कि नायडू ने अमरावती को राजधानी के स्थान के रूप में चुना ताकि वे खुद और अपने करीबी लोगों को समृद्ध कर सकें. उन्होंने हैरानी जताई कि अमरावती परियोजना के लिए आवश्यक 2 लाख करोड़ रुपए कहां से जुटाए जाएंगे और राजधानी को पूरा होने में कितना समय लगेगा.

YSRCP प्रमुख ने चेतावनी दी कि नायडू अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए आंध्र प्रदेश को कर्ज के जाल में धकेल रहे हैं. जगन रेड्डी ने आरोप लगाया, “जब चंद्रबाबू नायडू यह दावा करते हैं कि राजधानी सेल्फ फंडिंग मॉडल है, तो ऋण क्यों लिए गए और बजट में आवंटन क्यों किए गए? यह सब स्पष्ट रूप से व्यापक भ्रष्टाचार और घोटालों की ओर इशारा करता है, जिसमें भूमि अधिग्रहण से लेकर निविदा प्रक्रिया तक और पसंदीदा ठेकेदारों को दी जाने वाली अत्यधिक दरें भी शामिल हैं.”

चंद्रबाबू के मुताबिक, आंध्र प्रदेश पुनर्गठन (संशोधन) अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि भविष्य में कोई भी उनके राज्य की राजधानी नहीं बदलेगा. लेकिन जगन रेड्डी की टिप्पणी नायडू की बातों पर सवाल खड़े कर रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि रेड्डी ने कहा कि अगर नायडू राजधानी को लेकर अभी विधानसभा में प्रस्ताव पारित करवा सकते हैं, तो क्या वही विधानसभा बाद में उसमें बदलाव नहीं कर सकती?

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