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BSP के विधायक पर IT की रेड क्या BJP के अंदरूनी झगड़े का नतीजा है?

BSP के इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह के ठिकानों पर आयकर विभाग की छापामारी सिर्फ भ्रष्टाचार का मामला नहीं लग रहा

MLA Umashankar Singh (File Photo)
विधायक उमाशंकर सिंह (File Photo)
अपडेटेड 26 फ़रवरी , 2026

राजधानी लखनऊ में 25 फरवरी की सुबह शुरू हुई आयकर विभाग की कार्रवाई 26 फरवरी की दोपहर तक कई जिलों में फैल चुकी थी. बहुजन समाज पार्टी (BSP) के इकलौते विधायक उमाशंकर सिंह के लखनऊ स्थित आवास, कार्पोरेट कार्यालय और उनसे जुड़े कारोबारिक ठिकानों पर एक साथ छापेमारी ने प्रदेश की राजनीति में हलचल पैदा कर दी. 

विपुलखंड, गोमतीनगर स्थित उनके आवास से करीब 10 करोड़ रुपए नकद बरामद होने की जानकारी सामने आई, जबकि अन्य स्थानों पर दस्तावेजों और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की जांच देर तक चलती रही. लखनऊ के अलावा बलिया, सोनभद्र, कौशांबी, मिर्जापुर और प्रयागराज में 30 से अधिक ठिकानों पर 50 से ज्यादा अधिकारियों की टीमें तैनात रहीं. कार्रवाई का दायरा और पैमाना बताता है कि यह सामान्य सर्वे नहीं, बल्कि व्यापक वित्तीय जांच का हिस्सा था.

आयकर विभाग ने आधिकारिक तौर पर छापे की वजह सार्वजनिक नहीं की है, लेकिन सूत्रों का कहना है कि यह जांच कथित टैक्स चोरी, बेनामी संपत्तियों और खनन कारोबार से जुड़े लेनदेन के आधार पर की गई. खास तौर पर सोनभद्र और मिर्जापुर में पिछले कुछ वर्षों के दौरान हुए खनन कार्यों से संबंधित दस्तावेज मिलने की बात सामने आई है. यहां यह उल्लेख महत्वपूर्ण है कि अगस्त 2025 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने सोनभद्र में पत्थर खनन में तय सीमा से अधिक 33,604 घन मीटर खनन और रॉयल्टी गणना में गड़बड़ी की ओर संकेत किया था. रिपोर्ट में अनुमानित राजस्व नुकसान का आंकड़ा लगभग 60 करोड़ रुपये तक बताया गया था. माना जा रहा है कि उसी रिपोर्ट ने जांच एजेंसियों का ध्यान खींचा;

कार्रवाई की रणनीति भी चर्चा का विषय बनी. बलिया के रसड़ा स्थित पैतृक आवास पर पहुंचने के लिए अधिकारियों ने सरकारी गाड़ियों की जगह निजी वाहनों का इस्तेमाल किया. वाहनों पर शादी समारोह के स्टिकर लगाए गए ताकि स्थानीय स्तर पर किसी को शक न हो. सुबह 11 बजे के आसपास एक साथ छापेमारी शुरू हुई और देर रात तक तलाशी चलती रही; लखनऊ में छात्रशक्ति कंस्ट्रक्शन कंपनी के कार्पोरेट ऑफिस और वजीर हसन रोड स्थित एक करीबी ठेकेदार के ठिकाने भी जांच के दायरे में रहे. सोनभद्र में साईं राम इंटरप्राइजेज और खनन कारोबार से जुड़े अन्य सहयोगियों के परिसरों में दस्तावेज खंगाले गए.

BSP विधायक का बैकग्राउंड क्या है?

उमाशंकर सिंह का राजनीतिक और कारोबारी प्रोफाइल इस पूरी कार्रवाई को और दिलचस्प बनाता है. बलिया जिले के रसड़ा तहसील के खनवर गांव से आने वाले सिंह छात्र राजनीति से सार्वजनिक जीवन में आए, लेकिन शुरुआती दौर में खास सफलता नहीं मिली. इसके बाद उन्होंने ठेकेदारी का रास्ता चुना और यहीं से उनका आर्थिक आधार मजबूत हुआ. जिला पंचायत चुनाव जीतने के बाद उन्होंने 2012 में रसड़ा विधानसभा सीट से BSP के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की. 2017 और 2022 में भी वे लगातार विजयी रहे. 2022 में उनकी जीत ने उन्हें विधानसभा में पार्टी का इकलौता विधायक बना दिया.

उमाशंकर सिंह को भारतीय जनता पार्टी (BJP) के शीर्ष नेतृत्व से भी करीब माना जाता रहा है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार में उन्हें कई अहम प्रोजेक्ट मिलने की चर्चा रही है. यही वजह है कि विपक्ष सवाल उठा रहा है कि अगर वे सत्ता के इतने करीब थे तो अचानक यह सख्ती क्यों!

कुछ राजनीतिक विश्लेषक इसे BJP के भीतर की अंदरूनी राजनीति से भी जोड़कर देख रहे हैं. बलिया के रहने वाले एक एडवोकेट बताते हैं, “पूर्वांचल की राजनीति में ठेकेदारी, खनन और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट बड़े आर्थिक हितों से जुड़े होते हैं. ऐसे में अगर किसी कारोबारी-नेता का प्रभाव ज्यादा बढ़ता है तो विरोधी गुट सक्रिय हो जाते हैं. यह भी चर्चा है कि स्थानीय स्तर पर कुछ नेताओं की नाराजगी या प्रतिस्पर्धा ने एजेंसियों की कार्रवाई की पृष्ठभूमि तैयार की हो सकती है. हालांकि इसका कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं है.” 

कारोबार के क्षेत्र में उन्होंने छात्रशक्ति कंस्ट्रक्शन के जरिए सड़क निर्माण, इंफ्रास्ट्रक्चर और खनन कार्यों में विस्तार किया. अयोध्या में बन रहे राम वन गमन पथ जैसे बड़े प्रोजेक्ट से भी उनकी कंपनी का नाम जुड़ा रहा है. उनकी पत्नी पुष्पा सिंह सीएस इंफ्रा कंस्ट्रक्शन लिमिटेड की प्रबंध निदेशक हैं. पिछले एक दशक में विभिन्न सरकारी परियोजनाओं में सक्रिय उपस्थिति ने उन्हें एक प्रभावशाली ठेकेदार और नेता दोनों की पहचान दी. यही कारण है कि सत्ता प्रतिष्ठान के करीब माने जाने वाले इस विधायक पर अचानक इतनी व्यापक कार्रवाई ने कई सवाल खड़े किए.

कार्रवाई की टाइमिंग ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया. उमाशंकर सिंह पिछले दो वर्षों से कैंसर का इलाज करा रहे हैं और हाल ही में अमेरिका से इलाज कर लौटे थे. योगी सरकार विभाग में राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिनेश प्रताप सिंह ने सार्वजनिक तौर पर उनकी सेहत का हवाला देते हुए कार्रवाई की टाइमिंग पर सवाल उठाए. दिनेश प्रताप सिंह ने कहा, “दो साल से ज्यादा समय से वे जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे हैं. ऐसे समय में यह कार्रवाई अमानवीय है.” यह बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि दिनेश प्रताप सिंह और उमाशंकर सिंह के बीच पारिवारिक रिश्ता है. दिनेश प्रताप सिंह की बेटी की शादी उमाशंकर सिंह के बेटे से हुई है. ऐसे में उनका खुलकर बचाव करना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया.

BSP प्रमुख मायावती ने भी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि पार्टी विभागीय कार्रवाई में दखल नहीं दे रही, लेकिन गंभीर बीमारी के दौरान इस तरह की कार्रवाई दुर्भाग्यपूर्ण है. उन्होंने दावा किया कि विधायक के खिलाफ क्षेत्र से अवैध संपत्ति अर्जित करने की कोई शिकायत नहीं आई. समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सवाल उठाया कि आयकर विभाग को निर्देश कौन देता है और क्यों विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई ज्यादा दिखाई देती है. उन्होंने इसे सिलेक्टिव कार्रवाई करार दिया. 

इन बयानों से साफ है कि मामला सिर्फ वित्तीय जांच का नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श का भी हिस्सा बन चुका है. 2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ते उत्तर प्रदेश में BSP पहले ही कमजोर संगठनात्मक स्थिति से गुजर रही है. ऐसे में उसके इकलौते विधायक पर आयकर छापा पार्टी के मनोबल और संसाधन दोनों पर असर डाल सकता है. दूसरी ओर, BJP के भीतर भी यह चर्चा है कि सत्ता के करीब माने जाने वाले कारोबारी नेताओं पर कार्रवाई का संदेश क्या है. क्या यह प्रशासनिक सख्ती का संकेत है या राजनीतिक समीकरणों के पुनर्संतुलन की शुरुआत? कुछ राजनीतिक विश्लेषक इस कार्रवाई को मुख्यमंत्री योगी से उमाशंकर सिंह के नजदीकी रिश्ते से जोड़ते हुए BJP के भीतर चल रही रस्साकसी का भी नतीजा मान रहे हैं. 

हालांकि आर्थिक पहलू भी कम अहम नहीं है. अगर खनन और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े दस्तावेजों में अनियमितताओं के ठोस प्रमाण मिलते हैं तो यह न सिर्फ व्यक्तिगत बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही का मामला बनेगा. 

खनन क्षेत्र पहले भी विवादों में रहा है और कई जिलों में राजस्व हानि के आरोप लगते रहे हैं. ऐसे में यह जांच व्यापक नेटवर्क को भी छू सकती है, जैसा कि शुरुआती दस्तावेजों में कुछ अधिकारियों के नाम आने की चर्चा से संकेत मिलता है. फिलहाल आयकर विभाग की ओर से अंतिम निष्कर्ष सामने नहीं आया है. लेकिन यह स्पष्ट है कि इस कार्रवाई ने प्रदेश की राजनीति में कई स्तरों पर हलचल पैदा की है.

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