कोलकाता नगर निगम (KMC) क्षेत्र के स्कूलों में पका हुआ मिड-डे मील उपलब्ध कराने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार की तरफ से इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस यानी इस्कॉन को जिम्मेदारी देने के फैसले ने राजनीतिक और सांस्कृतिक बहस छेड़ दी है.
आलोचकों का आरोप है कि यह ऐसे राज्य की खानपान की आदतों को प्रभावित करने की कोशिश है जो अपनी मजबूत मांसाहारी भोजन परंपरा के लिए जाना जाता है. इस फैसले की घोषणा वित्त मंत्री स्वपन दासगुप्ता ने 22 जून को अपने पहले बंगाल बजट भाषण में की.
दासगुप्ता ने कहा कि सरकार KMC क्षेत्र के स्कूलों में ‘पौष्टिक पका हुआ मिड-डे मील’ उपलब्ध कराने के लिए इस्कॉन के साथ साझेदारी करेगी.
यह प्रस्ताव इस्कॉन ने ही BJP सरकार के सामने रखा था. सरकार इस पर एक छोटी राशि खर्च करेगी जबकि बाकी खर्च इस्कॉन के दानदाताओं की तरफ से उठाया जाएगा.
हालांकि इस्कॉन के अधिकारियों का कहना है कि यह व्यवस्था न तो नई है और न ही प्रयोग के तौर पर शुरू की जा रही है. इस्कॉन के उपाध्यक्ष और प्रवक्ता राधारमण दास ने कहा, "हम पिछले 10 वर्षों से उत्तर कोलकाता में करीब 17,000 बच्चों को मिड-डे मील उपलब्ध करा रहे हैं. अब यह संख्या कई गुना बढ़ जाएगी. इसके लिए हमें अतिरिक्त रसोईघर बनाने होंगे. इससे पहले विस्तृत अध्ययन और सर्वे करना होगा."
अपनी धर्मार्थ संस्था अन्नामृत फाउंडेशन के जरिए इस्कॉन आठ राज्यों के 21 शहरों में हर दिन 10 लाख से अधिक स्कूली बच्चों को भोजन उपलब्ध कराता है. संगठन का कहना है कि उसने ऐसा मजबूत लॉजिस्टिक्स नेटवर्क विकसित किया है जो भोजन की गुणवत्ता बनाए रखते हुए बड़ी मात्रा में आपूर्ति कर सकता है.
दास ने कहा, "हमारी सप्लाई चेन बेहद मजबूत है. बच्चों को उच्च गुणवत्ता वाला भोजन तो मिलता ही है, साथ ही हम यह भी सुनिश्चित करते हैं कि व्यवस्था में किसी तरह की कोई गड़बड़ी न हो. अगर स्कूल प्रशासन को कोई भी फूड पैकेट बिना सील का मिलता है तो उसे तुरंत वापस भेज दिया जाता है."
इसके बावजूद सिविल सोसायटी के कुछ तबकों और विपक्ष ने इस प्रस्ताव की आलोचना की है. उनका कहना है कि बंगाल के मिड-डे मील कार्यक्रम में शाकाहारी भोजन देने वाले संगठन को शामिल करना राज्य की स्थानीय खानपान संस्कृति के उलट है.
इन आलोचनाओं को खारिज करते हुए दास ने कहा कि शाकाहारी भोजन को बंगाल की परंपरा से अलग नहीं माना जाना चाहिए. उन्होंने कहा, "यह कहना पूरी तरह गलत है कि शाकाहारी भोजन बंगाली संस्कृति के खिलाफ है. गौड़ीय वैष्णव परंपरा की स्थापना करने वाले श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं बंगाली थे. गौड़ीय वैष्णवों की खानपान परंपरा हमेशा से शाकाहारी रही है. हमारे पोषण विशेषज्ञ हर भोजन को इस तरह तैयार करते हैं कि पौधों से मिलने वाला प्रोटीन, पशु स्रोत से मिलने वाले प्रोटीन का पर्याप्त विकल्प बन सके."
सरकार की मंशा को लेकर जो भी संशय था वह विधानसभा सत्र समाप्त होने के बाद मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के मीडिया से बातचीत के बाद काफी हद तक दूर होता दिखा. अधिकारी ने कहा, "पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर कोलकाता के स्कूलों में मिड-डे मील उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी इस्कॉन को दी जा रही है. वही भोजन उपलब्ध कराएगा. आप खुद उसका स्वाद चखिए, उसकी गुणवत्ता बहुत अच्छी है. और अगर आप 'हरे कृष्ण' का जाप नहीं करना चाहते तो कोई आपसे ऐसा करने के लिए नहीं कह रहा."
मुख्यमंत्री की इस टिप्पणी के बाद यह धारणा और मजबूत हुई है कि कोलकाता क्षेत्र के स्कूलों में मिड-डे मील का मुख्य आपूर्तिकर्ता इस्कॉन ही होगा. हालांकि इस व्यवस्था को लेकर कई व्यावहारिक सवाल अब भी अनसुलझे हैं. फिलहाल कुछ स्कूलों में मिड-डे मील वहीं तैयार होता है, जबकि कुछ अन्य स्कूलों को सामुदायिक रसोईघरों से भोजन मिलता है.
शिक्षा विभाग के अधिकारियों का कहना है कि वे अभी भी सरकार के विस्तृत दिशा-निर्देशों का इंतजार कर रहे हैं. इसके बाद ही यह तय हो सकेगा कि नई व्यवस्था कैसे लागू होगी. नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि जिम्मेदारी सौंपने का वास्तविक मतलब क्या है. जब तक औपचारिक दिशा-निर्देश जारी नहीं होते तब तक यह कहना मुश्किल है कि स्कूलों में जमीन पर क्या बदलाव देखने को मिलेंगे."
इसलिए इस व्यवस्था के लागू होने पर सभी की नजर रहेगी. सिर्फ भोजन की गुणवत्ता और उसकी आपूर्ति पर ही नहीं बल्कि उस व्यापक बहस पर भी जो इसने बंगाल में भोजन, संस्कृति और पहचान को लेकर छेड़ दी है.

