scorecardresearch

झारखंड में BJP के नए अध्यक्ष की ताजपोशी; क्या अब पूर्व सीएम रघुवर दास की राजनीति खत्म?

झारखंड के पूर्व सीएम रघुवर दास लंबे समय से BJP में कोई बड़ी भूमिका का इंतजार कर रहे थे लेकिन अब यह अंतहीन होता दिख रहा है

पूर्व सीएम रघुवर दास (फाइल फोटो)
अपडेटेड 16 जनवरी , 2026

बीते बुधवार यानी 14 जनवरी को झारखंड BJP ने एकराय से अपना नया प्रदेश अध्यक्ष चुन लिया. हालांकि चुनाव का ऑप्शन रखा गया था, लेकिन महज औपचारिकता के लिए. इससे पहले बीते 3 अक्टूबर को राज्यसभा सांसद आदित्य साहू को कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बनाकर पार्टी कार्यकर्ताओं, नेताओं का मूड भांपा गया. किसी तरह की बगावत या गुटबाजी के आसार न देखते हुए अब उन्हें पूर्णकालिक अध्यक्ष चुन लिया गया. 

14 जनवरी को रांची के हरमू स्थित पार्टी मुख्यालय में ताजपोशी के दौरान पूर्व सीएम और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी, पूर्व सीएम अर्जुन मुंडा, पूर्व सीएम मधु कोड़ा, केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी सहित राज्य भर के लगभग सभी सांसद, विधायक और अन्य सीनियर-जूनियर नेता मौजूद रहे. बस नहीं मौजूद थे तो पूरे पांच साल तक सरकार चलाने वाले झारखंड के पूर्व सीएम और ओडिशा के पूर्व राज्यपाल रघुवर दास. 

राज्य में चर्चा इस बात की है कि बीते झारखंड विधानसभा चुनाव के ठीक बाद राज्यपाल पद से इस्तीफा देकर झारखंड की राजनीति में दोबारा सक्रिय होने आए रघुवर दास की आखिरी उम्मीद भी अब खत्म हो गई है. हालांकि राजनीति में आखिर उम्मीद जैसी शब्दावली के लिए जगह कम है, लेकिन BJP के संदर्भ में यह कई बार सच भी होती है. फिलहाल रघुवर दास के संदर्भ में इसकी क्रोनोलॉजी को क्रमवार समझते हैं. 

साल 2019 में विधानसभा चुनाव से पहले रघुवर दास झारखंड के पहले सीएम थे जिन्होंने पूरे पांच साल सरकार चलाई. चुनाव से पहले राज्यभर की यात्रा पर निकले. लगा सबकुछ उनके पक्ष में ही है. लेकिन यहां पर वे चूक गए. शासन-प्रशासन जरूर उनके पक्ष में दिख रहा था, लेकिन आम लोग खासकर आदिवासी उनके साथ नहीं थे. परिणाम आया और BJP को करारी हार का सामना करना पड़ा. 

BJP को एसटी आरक्षित 28 सीटों में 26 पर हार का सामना करना पड़ा. यहां तक कि मुख्यमंत्री खुद भी चुनाव हार गए. मंथन हुआ, दबी जुबान ही सही, पार्टी के नेताओं ने इसके लिए रघुवर दास को ही जिम्मेदार ठहराना शुरू किया. इसके लिए आदिवासी विरोधी फैसले खासकर पेसा नियमावली में छेड़छाड़ का प्रयास और पत्थलगड़ी आंदोलन के दौरान आदिवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई को कारण माना गया. 

खैर, समय बीता और साल 2022 में उन्हें ओडिशा का राज्यपाल बनाया गया. दो साल बाद झारखंड में विधानसभा चुनाव का बिगुल बजा. और रघुवर दास ने राजभवन छोड़ने का मन बना लिया. चर्चा छिड़ी कि सक्रिय राजनीति में लौट सकते हैं. उन्होंने राष्ट्रपति को इस्तीफा भेज दिया था, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया. किसी और तरह की गॉसिप या गुटबाजी को हवा मिले, इससे बचने के लिए कहा गया कि चुनाव के बाद इस पर निर्णय लिया जाएगा. बताया जाता है कि BJP का केंद्रीय नेतृत्व उनके इस फैसले से बिल्कुल भी खुश नहीं था. पार्टी ने उनकी जगह उनकी बहु पूर्णिमा दास को टिकट दिया. फिर चुनाव बाद उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया गया. 

हालांकि पद छोड़ने से पहले उन्होंने अपनी एक और जिद मनवाई. BJP के पुराने नेता, मंत्री और अब JDU के विधायक सरयू राय ने ही उन्हें 2019 के विधानसभा चुनाव में मात दी थी. वे दावा करते हैं कि रघुवर दास ने ही उन्हें उनकी पसंदीदा सीट पर चुनाव नहीं लड़ने दिया. सरयू राय के मुताबिक, "आखिरी में मुझे पार्टी से बगावत करनी पड़ी और मैं उनके खिलाफ निर्दलीय चुनाव लड़ा और जीता.” वे यह भी कहते हैं, “2024 के चुनाव के वक्त भी उन्होंने दुश्मनी निभाई और यह सुनिश्चित किया कि जिस जमशेदपुर पूर्वी सीट पर मैंने उन्हें हराया था, वहां से मुझे टिकट न मिले. चुनाव से पहले BJP नेताओं ने मेरे साथ तीन दौर की बैठक की. आखिरी फोन अमित शाह का आया जिसमें उन्होंने कहा कि पीएम मोदी चाहते हैं कि मैं जमशेदपुर पश्चिम से लड़ूं, क्योंकि पूर्वी सीट तो BJP की सुरक्षित सीट है और इसे कोई भी निकाल लेगा. मैं ऐसा नहीं चाहता था, लेकिन मुझे सीट बदलनी पड़ी, हालांकि मैं वहां से भी जीता.’’  

मौके बनते गए, छूटते गए 

साल 2025 के विधानसभा चुनाव में भी BJP को करारी हार का सामना करना पड़ा. तब पार्टी की कमान बाबूलाल मरांडी के हाथ में थी और कैंपेन संचालन की जिम्मेदारी असम के सीएम हेमंत बिस्व सरमा के पास थी. हार के बाद लगा कि मरांडी पर गाज गिरेगी. रघुवर दास के लिए यह मौका बनता दिख रहा था. लेकिन यहां भी ऐसा नहीं हुआ. प्रदेश अध्यक्ष के साथ-साथ बाबूलाल मरांडी नेता प्रतिपक्ष भी बना दिए गए. 

नेता प्रतिपक्ष अगर आदिवासी समाज से बन गया तो पार्टी की कमान ओबीसी नेता को मिल सकती थी. इस लिहाज से रघुवर दास के लिए फिर मौका बनता दिखा. हालांकि इस पद केे लिए कई और नाम चर्चा में आए, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री इनमें सबसे ऊपर दिख रहे थे. फिर अक्टूबर, 2025 में इन चर्चाओं पर भी विराम लग गया.  आदित्य साहू को कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष बना दिया गया. वे भी पिछड़ा वर्ग से आते हैं.

इस सबके बावजूद रघुवर दास ने हार नहीं मानी और राजनीतिक रूप से लगातार सक्रिय दिखे. हेमंत सरकार की नीतियों पर पहले की तरह हमला करते रहे. BJP का केंद्रीय नेतृत्व चौंकाने वाले फैसले लेता रहा है. इसी को आधार मानकर रघुवर दास के समर्थक और अन्य राजनीतिक लोग भी यह मानने लगे कि उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जा सकता है. केंद्रीय नेतृत्व ने चौंकाया जरूर, लेकिन यह फैसला नितिन नबीन के नाम के साथ सामने आया. ध्यान देने वाली बात यह भी रही कि जिस बिहार में मात्र दो सीट एसटी के लिए आरक्षित हैं, उनको ध्यान में रखते हुए बाबूलाल मरांडी को बिहार विधानसभा चुनाव में स्टार प्रचारक बनाया गया, लेकिन ओबीसी बहुल सीटों पर प्रचार के लिए रघुवर दास को किसी तरह की कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई. यहां तक कि आगामी पश्चिम बंगाल चुनाव के लिए भी फिलहाल उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं मिली है.

झारखंड में BJP की राजनीति को समझने वाले अब यह मानने लगे हैं कि पार्टी ने विधानसभा चुनाव में उनकी बहू को टिकट दिया था और वे जीतीं भी, ऐसे में अब रघुवर दास की राजनीतिक विरासत उनके पास है और पूर्व मुख्यमंत्री की पार्टी को कोई जरूरत नहीं है. हालांकि प्रदेश अध्यक्ष चुनाव के बाद जिस 21 सदस्यीय राष्ट्रीय परिषद की घोषणा चुनाव प्रभारी और केंद्रीय मंत्री जुएल उरांव ने की, उसमें रघुवर दास को जरूर शामिल किया गया है. लेकिन उनके धुर विरोधी सरयू राय कहते हैं, ‘’अगर नितिन नबीन अपनी टीम बनाते हैं, तो रघुवर दास के लिए वहां संभावना बन सकती है. अगर वे उस टीम के हिस्सा नहीं बने, तब BJP में उनकी राजनीति को खत्म माना जा सकता है.’’

इस बीच रघुवर दास गंगासागर स्नान करने गए हैं. उनके करीबी सूत्र दावा करते हैं कि पार्टी ने उन्हें और चंपाई सोरेन को नए अध्यक्ष की ताजपोशी को लेकर जानकारी दी थी और उनसे सहमति भी ली थी.

Advertisement
Advertisement