scorecardresearch

बेगूसराय : दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर के चुनाव में क्या साफ हवा की बात हो रही है?

आईक्यू एयर की वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट, 2023 के मुताबिक बीते साल में बेगुसराय का पीएम 2.5 घनत्व 118.9 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर था, जो WHO के तय मानक से 20 गुना ज्यादा था

बेगूसराय में बन रहा एक फ्लाईओवर; ऐसे कंस्ट्रक्शन के काम भी शहर में प्रदूषण बढ़ा रहे हैं
अपडेटेड 12 मई , 2024

बरौनी रिफाइनरी से ठीक सटा गांव है गोविंदपुर. गांव की शुरुआत में ही मनोज साह अपनी दुकान पर मिल जाते हैं. उनसे बात करने के लिए पहुंचा व्यक्ति मीडिया से है, यह जानकर कहने लगते हैं, "क्या ऐसा नहीं हो सकता कि पूरा गोविंदपुर गांव यहां से दूसरी जगह शिफ्ट कर दिया जाये?"

ऐसा क्यों, यह पूछने पर सामने दिख रही फैक्टरी की तरफ इशारा करते हुए वे बताते हैं, "इसकी चिमनी से इतना धुआं और काला-काला कण निकलता है कि हमारा छत, हमारी दीवारें सब ढक जाती हैं. यही धुआं और कण हमारी सांसों में भी जाता है. कभी-कभी तो इतनी बदबू आती है कि सांस लेना मुश्किल हो जाता है. आपको यहां घर-घर दमा के मरीज मिल जाएंगे. आप रात को अपनी छत पर सो नहीं सकते. इस गर्मी में भी."

तभी पास बैठे उनके ही साथी प्रमोद गुप्ता कहने लगते हैं, "अच्छा मनोज जी जाइएगा भी तो कहां जाइएगा. पूरे बेगूसराय शहर में कहां आपको सांस लेने लायक हवा मिलेगी. यहां चिमनी का धुआं है, तो बाजार में कंस्ट्रक्शन की धूल. आपको पता नहीं अपना बेगूसराय दुनिया में टॉप कर गया है, प्रदूषण फैलाने में."

दरअसल प्रमोद गुप्ता आईक्यू एयर (हवा की गुणवत्ता से जुड़े आंकड़े उपलब्ध कराने वाली एजेंसी) की उस रिपोर्ट की तरफ इशारा कर रहे थे, जिसके मुताबिक साल 2023 में बेगूसराय शहर दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर माना गया था. आईक्यू एयर की वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट, 2023 के मुताबिक इस साल में बेगूसराय का पीएम 2.5 घनत्व 118.9 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर था, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा तय मानक से 20 गुना अधिक था. उस साल फरवरी, नवंबर और दिसंबर में बेगूसराय का पीएम 2.5 घनत्व दो सौ के पार चला गया था. दिसंबर में तो यह 285 तक पहुंच गया. मार्च और मई महीने में यह 156 और 109 रहा. यह रिपोर्ट चौंकाने वाली थी.

इसलिए भी कि ठीक पिछले दो सालों में बेगूसराय का पीएम 2.5 घनत्व क्रमशः 19.7 और 24.6 ही रहा. अचानक 2023 में बेगूसराय इतना प्रदूषित कैसे हो गया, इस सवाल पर लोगों की अलग-अलग राय है. मगर इस चुनाव में कभी-कभार मतदाता इस बात का जिक्र कर लेते हैं कि आखिर बेगूसराय इतना प्रदूषित शहर कैसे हो गया? हालांकि अभी भी यह चुनावी मुद्दा नहीं बन पाया है.

इस फ्लाईओवर के निर्माण कार्य की धूल भी सिरदर्द बनी है बेगूसराय के लिए
इस फ्लाईओवर के निर्माण कार्य की धूल भी सिरदर्द बनी है बेगूसराय के लिए

बेगूसराय लोकसभा सीट को बिहार के लोग आम बोलचाल में बिहार का लेनिनग्राद कहते हैं. ऐसा इसलिए है कि यहां वामपंथी दलों की स्थिति मजबूत रही है. हालांकि इस सीट पर आजादी के बाद से आज तक सिर्फ एक बार वामपंथी नेता सांसद बने हैं. वे सीपीआई नेता और अखिल भारतीय किसान सभा के प्रमुख योगेंद्र शर्मा थे, जिन्होंने 1967 में तीन बार से कांग्रेस सांसद रहे मथुरा प्रसाद मिश्र को हरा दिया था. मगर उसके बाद फिर कभी कोई वामपंथी इस सीट से नहीं जीता.

2019 में सीपीआई ने जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार को भाजपा नेता गिरिराज सिंह के खिलाफ उतारा था, मगर कन्हैया चार लाख से अधिक वोटों से हार गए. इस चुनाव में भी गिरिराज सिंह के खिलाफ सीपीआई ने अपने स्थानीय नेता अवधेश राय को टिकट दिया है. 

वामपंथी पार्टियां कैडर आधारित पार्टियां होती हैं और इनके कार्यकर्ताओं में पढ़ने-लिखने और बहस करने वालों की तादाद बाकी पार्टियों के मुकाबले ज्यादा मानी जाती है. जाहिर है कि इस बौद्धिकता का रिसाव मतदाता वर्ग में भी होता ही है इसलिए ड्राइंग रूम की बातचीत में कई बार बेगूसराय के सबसे प्रदूषित शहर को होने की चर्चा हो जाती है. मगर चुनावी अभियान में न गिरिराज सिंह इसका जिक्र करते हैं, न उनके विरोधी अवधेश राय.

इस इलाके के सामाजिक कार्यकर्ता भगवान प्रसाद सिंह कहते हैं, "यह हैरत की बात है कि इतनी गंभीर समस्या पर बेगूसराय में न सत्ता पक्ष से कोई बात कर रहा है, न विपक्ष और तो और, सिविल सोसाइटी के लोग भी इस विषय को लेकर बहुत गंभीर नहीं है. जनता के लिए तो खैर यह मुद्दा ही नहीं है."

भगवान प्रसाद के मुताबिक हाल के वर्षों में बेगूसराय में जो बेतरतीब विकास हुआ है, उसी की वजह से यह स्थिति पैदा हुई है. यहां फोर लेन हाईवे बने तो सड़कों के किनारे लगे पुराने पेड़ काट कर हटा दिये गये. इस बीच रिफाइनरी का एक्सटेंशन हुआ, उर्वरक कारखाना चालू हुआ और पेप्सी का प्लांट शुरू हुआ. इन सबने थोड़ा-थोड़ा यहां की आबोहवा को खराब किया. पेड़ किसी ने नहीं लगाये. यहां के वातावरण को ठीक करने की जिम्मेदारी किसी ने नहीं समझी. दिक्कत की बात तो यह हुई कि यहां की कंपनियों ने बड़े राजनीतिक लोगों की चुनावी मदद करके अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया. रिफाइनरी के टाउनशिप में तो खूब हरे-भरे पेड़ लगे हैं. मगर आसपास के गांवों का हाल बुरा है.

बिहार में लंबे समय से पर्यावरण के मसले पर काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता इश्तियाक अहमद कहते हैं, "पीएम 2.5 का घनत्व दो वजहों से अधिक बढ़ता है, पहला महीन धूलकण जो अक्सर निर्माण कार्य की वजह से पैदा होता है और मशीन से निकलने वाला धुआं. बेगूसराय में शहर के बीचों-बीच हाइवे पर एक लंबा फ्लाईओवर लंबे समय से बन रहा है. उसकी धूल उड़ती है और साथ ही इसके कारण रास्ते में जो जाम लगता है तो वाहन का धुआं भी बढ़ जाता है. इसके अलावा वहां रिफाइनरी और उर्वरक कारखाने तो हैं ही. मेरे ख्याल से इन्हीं वजहों से जाड़े के दिनों में वहां का पीएम 2.5 घनत्व बढ़ जाता होगा. मगर जो आंकड़े आए हैं, वे निश्चित तौर पर सेहत के लिए खतरनाक हैं और इनका चुनावी मुद्दा न बन पाना दुखद है." 

Advertisement
Advertisement