इजरायल-अमेरिका के ईरान पर हमले के बाद जो युद्ध शुरू हुआ है, उसकी आंच अब राजस्थान के हाड़ौती अंचल तक महसूस की जा रही है. अंतरराष्ट्रीय तनाव ने कोटा और बूंदी के बासमती चावल कारोबार की रफ्तार थाम दी है और हजारों किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें गहरी कर दी हैं.
हर साल फरवरी से अप्रैल के बीच इन जिलों से करीब दो हजार करोड़ रुपए का बासमती चावल खाड़ी देशों को निर्यात होता रहा है, लेकिन इस बार युद्ध और समुद्री मार्गों पर अनिश्चितता के कारण चावल मंडियों और मिलों में ही अटका पड़ा है.
चंबल कमांड क्षेत्र की उपजाऊ जमीन और नियंत्रित सिंचाई व्यवस्था ने कोटा-बूंदी के बासमती को अलग पहचान दी है. लंबे, पतले और सुगंधित दानों वाला यह चावल दुबई, इराक, ईरान, सऊदी अरब, तुर्की, यमन, कुवैत, बहरीन जैसे खाड़ी देशों के साथ-साथ कनाडा और अमेरिका तक जाता रहा है. इन बाजारों में मांग स्थिर रही है, लेकिन युद्ध के कारण जहाजरानी, बीमा प्रीमियम और भुगतान चक्र प्रभावित हुए हैं. निर्यातक बताते हैं कि कई खरीदारों ने फिलहाल शिपमेंट टाल दिए हैं या नई बुकिंग रोक दी है. नतीजतन, तैयार माल की उठान नहीं हो पा रही और मिलों की क्षमता प्रभावित हो रही है.
हाड़ौती क्षेत्र में कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ जिलों के करीब दो लाख से अधिक किसान धान उत्पादन से जुड़े हैं. किसान नेता दशरथ कुमार का कहना है, ‘‘पिछले साल धान के दामों में 700 से 900 रुपए प्रति क्विंटल तक गिरावट आई थी, जिसके चलते किसानों को आंदोलन करना पड़ा था. इस बार भावों में बड़ी गिरावट नहीं आई, लेकिन निर्यात की राह रुकने से बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई है. किसानों को डर है कि अगर स्टॉक लंबे समय तक अटका रहा तो मिलों की खरीद सुस्त पड़ सकती है और इसका असर आगामी सीजन की बुवाई पर भी पड़ेगा.’’
केंद्र सरकार ने 2024 में बासमती चावल के निर्यात से प्रतिबंध हटाया था, जिसके बाद हाड़ौती के निर्यात में तेजी आई और नए बाजार खुले. कोटा संभाग के चारों जिलों से सालाना करीब दो हजार करोड़ रुपए का बासमती चावल विदेश जाता है. स्थानीय अर्थव्यवस्था में इस निर्यात का बड़ा योगदान है. किसानों से लेकर आढ़तियों, मिल मालिकों, पैकिंग यूनिटों और ट्रांसपोर्टरों तक हजारों परिवारों की रोजी-रोटी इससे जुड़ी है.
हालांकि राजस्थान के हनुमानगढ़ और गंगानगर जिलों में भी धान का उत्पादन होता है, लेकिन निर्यात के लिहाज से कोटा-बूंदी की पहचान अलग है. जानकार बताते हैं कि कीटनाशकों के नियंत्रित उपयोग और चंबल की सिंचाई प्रणाली के कारण यहां के चावल की गुणवत्ता बेहतर मानी जाती है. पंजाब के चावल को भी कई बार अवशेषों के कारण विदेशी बाजारों में सख्ती का सामना करना पड़ा है, जबकि हाड़ौती का बासमती अपेक्षाकृत स्वीकार्य रहा है. यही वजह है कि इसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर दाम मिल जाता है.
कोटा-बूंदी क्षेत्र में हर साल करीब 1.60 लाख हेक्टेयर में धान की रोपाई होती है जिससे लगभग 10 लाख मीट्रिक टन उत्पादन दर्ज होता है. 30 से अधिक चावल मिलें रोजाना 50 हजार से एक लाख क्विंटल तक धान की कुटाई कर चावल तैयार करती हैं.
फिलहाल, मिलों के यार्ड में पड़ी बोरियां इस बात की गवाही दे रही हैं कि वैश्विक राजनीति का असर खेत-खलिहान तक पहुंच चुका है. अगर जल्द हालात सामान्य नहीं हुए तो नकदी संकट, भंडारण लागत और कीमतों पर दबाव जैसे कई नए संकट सामने आ सकते हैं. हाड़ौती का किसान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रम का बंधक बनता नजर आ रहा है. उसकी निगाहें अब इस बात पर टिकी हैं कि कब ईरान-इजरायल युद्ध का कूटनीतिक हल निकलेगा और कब निर्यात की राह दोबारा खुलेगी.

