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गरीब बेटियों का सामूहिक विवाह कैसे बना सामूहिक घोटाला?

उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना वर्ष 2017 से चल रही है. इसके तहत अब तक चार लाख से अधिक विवाह कराए जा चुके हैं लेकिन अब पता चल रहा है कि कई जगह इसकी आड़ में घपले हुए हैं

Chief Minister's Mass Marriage Scheme (File Photo)
मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना (फाइल फोटो)
अपडेटेड 6 फ़रवरी , 2026

मुरादाबाद के कुंदरकी और मूंढ़ापांडे ब्लॉकों में पांच दिसंबर 2025 को हुए मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह समारोह की तस्वीर अब धीरे-धीरे साफ हो रही है. मंच पर शहनाई, वेदियां और सरकारी दावों की चमक थी, लेकिन मंच से उतरते ही कई दुल्हनें खाली हाथ थीं. किसी को पाजेब नहीं मिली, किसी को बिछुआ, कहीं गद्दा गायब था तो कहीं पूरा उपहार पैकेट ही नहीं.

कुछ दुल्हनों को इलाज या किसी सरकारी मदद का लालच देकर दोबारा वेदी पर बैठाया गया, तो कुछ को बिना विधिवत विवाह के ही साड़ी पहना दी गई. अब इसी मामले की जांच में सामने आ रहे शुरुआती तथ्य पूरे प्रदेश में चल रही मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना की हकीकत पर सवाल खड़े कर रहे हैं.

मुरादाबाद में कुंदरकी विधायक रामवीर सिंह की शिकायत के बाद शुरू हुई जांच अभी पूरी भी नहीं हुई है. जिला विकास अधिकारी की ओर से बनाई गई 30 टीमों में से 3 फरवरी तक सिर्फ 6 टीमों ने ही अपनी रिपोर्ट सौंपी है, लेकिन इन्हीं अधूरी रिपोर्टों ने गड़बड़ियों की परतें खोल दी हैं. जांच अधिकारियों की लगभग हर रिपोर्ट में यही बात सामने आई है कि उपहार सामग्री अधूरी दी गई. नियमों के मुताबिक इस योजना के तहत हर जोड़े को करीब 25 हजार रुपये का सामान मिलना चाहिए, जिसमें कपड़े, चांदी की पायल-बिछुआ, घरेलू सामान, बिस्तर, कंबल, किचन आइटम और एक वेनिटी किट शामिल है. लेकिन मुरादाबाद में कहीं आधा सामान दिया गया, कहीं घटिया क्वालिटी की चीजें थमा दी गईं और कहीं सिर्फ कागजों में ही वितरण दिखा दिया गया.

जांच में यह भी सामने आया है कि कई ऐसे जोड़ों को योजना का लाभ दिया गया जिनकी शादी पहले ही हो चुकी थी या जिनकी शादी बाद में होनी थी. योजना का मूल उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बेटियों का विवाह कराना है. अब सवाल उठ रहा है कि सिर्फ फील्ड लेवल कर्मचारियों की ही जिम्मेदारी तय होगी या उन अधिकारियों पर भी कार्रवाई होगी, जिन पर योजना की निगरानी की जिम्मेदारी थी.

मुरादाबाद के मामले ने इसलिए भी तूल पकड़ा क्योंकि यह शिकायत सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय तक पहुंची. आरोप लगे कि अधिकारी और ठेकेदार की मिलीभगत से घटिया सामान सप्लाई किया गया, भुगतान पूरा निकाल लिया गया और वितरण में जानबूझकर देरी की गई. लाभार्थियों की सूची सार्वजनिक करने से भी बचा गया, ताकि गड़बड़ियों पर पर्दा पड़ा रहे. कुंदरकी क्षेत्र में यह चर्चा भी सामने आई कि मनकरा गांव की एक ऐसी महिला को योजना का लाभ दिया गया जो पहले से एक बच्चे की मां है. अगर यह तथ्य सही साबित होता है तो पूरी सत्यापन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं.

मुरादाबाद अकेला जिला नहीं है, जहां मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना में अनियमितताएं सामने आई हैं. दिसंबर 2025 में ही कानपुर के चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय परिसर में हुए सामूहिक विवाह समारोह में भी भारी अव्यवस्थाएं उजागर हुईं. यहां 635 जोड़ों के लिए व्यवस्था होनी थी, लेकिन 561 जोड़ों और उनके परिजनों के लिए भी इंतजाम पूरे नहीं किए गए. जांच में सामने आया कि आयोजन कराने वाली फर्म ने तय मानकों का पालन ही नहीं किया. भोजन की व्यवस्था जरूरत से बहुत कम थी, वह भी तय मेनू के अनुसार नहीं. वेदियां कम थीं, फोटोग्राफर न के बराबर, पंडाल छोटा और कुर्सियां अपर्याप्त.

कानपुर के मामले में जिला प्रशासन ने सख्ती दिखाई. आयोजन कराने वाली फर्म को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया, भुगतान पर रोक लगाई गई और करीब 70 लाख रुपये की कटौती की तैयारी की गई. समाज कल्याण अधिकारी को भी हटा दिया गया. जांच रिपोर्ट में साफ कहा गया कि फर्म की व्यवस्थाएं जरूरत के मुकाबले केवल 45 प्रतिशत ही थीं. दीवार घड़ियों जैसी उपहार सामग्री भी मानकों पर खरी नहीं उतरी. यह कार्रवाई एक मिसाल जरूर बनी, लेकिन सवाल यह है कि क्या हर जिले में ऐसी ही सख्ती दिखाई जा रही है.

प्रदेश के कई अन्य जिलों से भी इसी तरह की शिकायतें सामने आई हैं. कहीं विवाहित युवतियों ने योजना का लाभ पाने के लिए आवेदन कर दिया, तो कहीं आधार सत्यापन में गड़बड़ी पाई गई. चालू वित्तीय वर्ष में ही 18 हजार से अधिक आवेदन निरस्त किए जा चुके हैं. बरेली, सोनभद्र, बागपत जैसे जिलों में सत्यापन के दौरान कई आवेदक विवाहित पाए गए. यह दिखाता है कि जमीनी स्तर पर सत्यापन प्रक्रिया कितनी कमजोर है और किस तरह लक्ष्य पूरा करने या आंकड़े बढ़ाने के दबाव में नियमों को ताक पर रखा जा रहा है.

मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना वर्ष 2017 से प्रदेश में चल रही है. अब तक चार लाख से अधिक विवाह कराए जा चुके हैं और सरकार का दावा है कि इससे लाखों गरीब परिवारों को राहत मिली है. हाल ही में प्रति विवाह सहायता राशि 51 हजार से बढ़ाकर एक लाख रुपये की गई है. इसमें 60 हजार रुपये सीधे नववधु के खाते में भेजे जाते हैं, 25 हजार रुपये का सामान दिया जाता है और 15 हजार रुपये आयोजन पर खर्च किए जाते हैं. बजट भी लगातार बढ़ा है. वर्ष 2025-26 के लिए 550 करोड़ रुपये का बजट तय किया गया है.

महिलाओं के मुद्दों पर आवाज उठाने वाली समाजसेवी सुषमा रावत कहती हैं, “इतनी बड़ी योजना और इतने बड़े बजट के बावजूद बार-बार सामने आ रही गड़बड़ियां यह सवाल खड़ा करती हैं कि आखिर चूक कहां हो रही है.” सरकार ने बीते कुछ वर्षों में निगरानी सख्त करने के लिए कई प्रावधान किए हैं. कन्या के आधार सत्यापन को अनिवार्य किया गया है. विवाह स्थल पर वर-वधू दोनों की बायोमीट्रिक उपस्थिति का प्रावधान रखा गया है, ताकि फर्जीवाड़ा रोका जा सके. उपहार सामग्री, भोजन और जलपान के लिए मानक तय किए गए हैं. 100 या उससे अधिक जोड़ों के सामूहिक विवाह में जिलाधिकारी की मौजूदगी अनिवार्य की गई है. मंडलीय उपनिदेशकों और जिला समाज कल्याण अधिकारियों को भी मौके पर रहना होता है.

इसके अलावा सरकार ने यह भी तय किया है कि उपहार सामग्री सप्लाई करने वाली फर्मों का चयन निदेशालय स्तर से होगा, ताकि जिला स्तर पर मनमानी न हो. एक जिले के अधिकारियों को दूसरे जिले में आब्जर्वर के रूप में भेजने का प्रावधान भी किया गया है, ताकि क्रॉस चेकिंग हो सके. कागजों पर यह व्यवस्था मजबूत दिखती है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है. सुषमा रावत बताती हैं, “असल समस्या निगरानी और जवाबदेही के बीच के अंतर की है. कई मामलों में बायोमीट्रिक और आधार सत्यापन सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाते हैं. आयोजन वाले दिन अफरातफरी के माहौल में सही तरीके से सत्यापन नहीं हो पाता. स्थानीय स्तर पर कर्मचारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत से अपात्र जोड़ों को भी शामिल कर लिया जाता है. उपहार सामग्री की गुणवत्ता और संख्या की जांच मौके पर गंभीरता से नहीं होती. बाद में जब शिकायतें आती हैं, तब जांच बैठती है.”

मुरादाबाद के मामले में भी यही दिख रहा है. पांच दिसंबर को आयोजन हुआ, लेकिन दो महीने बाद भी सैकड़ों लाभार्थी उपहार सामग्री के लिए भटक रहे हैं. नौ दिसंबर को ब्लॉकों में बुलाकर सामान देने का आश्वासन दिया गया, लेकिन उस दिन भी लोग खाली हाथ लौटे. इससे साफ है कि आयोजन के बाद की फॉलोअप व्यवस्था भी बेहद कमजोर है. राजनीतिक दबाव और प्रशासनिक लापरवाही भी इस योजना की एक बड़ी कमजोरी है. कई जगह जनप्रतिनिधि खुद आरोप लगा रहे हैं कि अधिकारी केवल खानापूर्ति कर रहे हैं. कुंदरकी विधायक ने डीएम द्वारा गठित जांच समिति की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए हैं और उच्च स्तरीय जांच की मांग की है. 

ब्लॉक प्रमुखों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में गड़बड़ी के आरोप लगाए हैं. जब जनप्रतिनिधि ही संतुष्ट नहीं हैं तो आम लाभार्थियों की स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है. समाज कल्याण विभाग के एक सेवानिवृत्त अधिकारी आर. के. श्रीवास्तव बताते हैं “एक और गंभीर पहलू यह है कि गड़बड़ियों का खामियाजा अक्सर निचले स्तर के कर्मचारियों को भुगतना पड़ता है, जबकि ठेकेदार और उच्च अधिकारी बच निकलते हैं. कानपुर में जरूर फर्म को ब्लैकलिस्ट किया गया, लेकिन ऐसे उदाहरण अभी अपवाद ही हैं. ज्यादातर मामलों में जांच लंबी चलती है, रिपोर्टें ठंडे बस्ते में चली जाती हैं और मामला धीरे-धीरे दब जाता है.”

मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना का सामाजिक महत्व बहुत बड़ा है. यह उन परिवारों के लिए सहारा है, जो गरीबी के कारण अपनी बेटियों की शादी नहीं कर पाते. लेकिन जब इसी योजना में भ्रष्टाचार और अनियमितताएं सामने आती हैं तो भरोसा टूटता है. 

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