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सुरेश खन्ना कैसे बने यूपी के पहले 'उत्कृष्ट विधायक'

लगातार नौ बार विधायक रहे सुरेश खन्ना को उत्तर प्रदेश विधानसभा ने पहला ‘उत्कृष्ट विधायक’ चुना है

CM Yogi Adityanath with state Finance Minister Suresh Kumar Khanna (Photo/PTI)
सीएम योगी आदित्यनाथ के साथ वित्त मंत्री सुरेश खन्ना (फाइल फोटो)
अपडेटेड 18 मई , 2026

उत्तर प्रदेश विधानसभा के इतिहास में 15 मई 2026 की तारीख एक नई संसदीय परंपरा की शुरुआत के तौर पर दर्ज हो गई. पहली बार विधानसभा ने अपने किसी सदस्य को 'उत्कृष्ट विधायक' सम्मान के लिए चुना और यह सम्मान मिला प्रदेश की राजनीति के सबसे अनुभवी चेहरों में गिने जाने वाले वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार खन्ना को. 

विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना की अध्यक्षता वाली उच्चस्तरीय समिति ने सर्वसम्मति से उनके नाम पर मुहर लगाई. इस समिति में उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक, नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय, विधायक स्वप्निल शास्त्री और वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह भी शामिल थे.

'उत्कृष्ट विधायक' चुनने का प्रावधान 2023 में विधानसभा नियमों में संशोधन के बाद शुरू किया गया था, लेकिन यह पहली बार है जब राज्य विधानसभा ने यह सम्मान प्रदान किया है. 

चयन के लिए जो मानक तय किए गए, उनमें विधायी अनुभव, संसदीय प्रक्रियाओं की समझ, सदन में योगदान, समितियों में सक्रियता, संसदीय आचरण और समग्र प्रदर्शन जैसे पहलू शामिल थे. इन सभी कसौटियों पर खन्ना सबसे आगे दिखाई दिए. यह सम्मान ऐसे समय आया है जब लोकतांत्रिक संस्थाओं में बहस के स्तर, सदन की कार्यसंस्कृति और विधायकों की भूमिका को लेकर लगातार चर्चा हो रही है. ऐसे माहौल में विधानसभा ने एक ऐसे नेता को चुना, जिसकी पहचान केवल चुनाव जीतने वाले राजनेता की नहीं, बल्कि सदन की कार्यवाही को संयम और संवाद से चलाने वाले संसदीय चेहरे की भी रही है.

73 वर्षीय सुरेश खन्ना उत्तर प्रदेश की राजनीति में स्थायित्व और निरंतरता का एक अनोखा उदाहरण हैं. शाहजहांपुर से नौ बार लगातार विधायक चुने जाना अपने आप में रिकॉर्ड है. 1989 से लेकर 2022 तक उन्होंने कोई विधानसभा चुनाव नहीं हारा. भारतीय राजनीति में जहां बड़े-बड़े नेताओं का जनाधार समय के साथ कमजोर पड़ता रहा, वहां खन्ना ने अपने निर्वाचन क्षेत्र पर पकड़ बनाए रखी. इसी निरंतरता ने उन्हें BJP के सबसे भरोसेमंद विधायकों में शामिल किया. 

शाहजहांपुर के चौक इलाके के दीवान जोगराज मोहल्ले में जन्मे सुरेश खन्ना का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू हुआ. उन्होंने जीएफ कॉलेज शाहजहांपुर से स्नातक और बाद में लखनऊ विश्वविद्यालय से एलएलबी की पढ़ाई की. छात्र जीवन में ही वे राजनीति की ओर आकर्षित हुए. 1980 में उन्होंने लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए. यह हार उनके राजनीतिक जीवन का अंत नहीं बनी, बल्कि आगे की तैयारी का आधार बनी. 1989 में BJP के टिकट पर शाहजहांपुर सीट से चुनाव जीतने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा. 

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले तीन दशकों में सत्ता कई बार बदली. कल्याण सिंह, राम प्रकाश गुप्ता, राजनाथ सिंह, मायावती और योगी आदित्यनाथ जैसे अलग-अलग राजनीतिक नेतृत्व आए, लेकिन सुरेश खन्ना हर दौर में प्रासंगिक बने रहे. BJP और BJP-BSP गठबंधन सरकारों में उन्होंने अलग-अलग विभागों की जिम्मेदारी संभाली. शहरी विकास, आवास, योजना, सांख्यिकी, पर्यटन, संसदीय कार्य और वित्त जैसे विभाग उनके पास रहे. यह विविधता बताती है कि संगठन और सरकार दोनों में उनकी स्वीकार्यता कितनी व्यापक रही.

योगी आदित्यनाथ सरकार में उनका कद और बढ़ा. 2017 में सरकार बनने के बाद उन्हें संसदीय कार्य और शहरी विकास विभाग सौंपा गया. बाद में वे वित्त मंत्री बने. संसदीय कार्य मंत्री के रूप में उनकी भूमिका विशेष रूप से अहम रही. विधानसभा में जब भी विपक्ष और सरकार के बीच टकराव की स्थिति बनी, तब खन्ना अक्सर सरकार की तरफ से मोर्चा संभालते दिखाई दिए. सदन में उनकी शैली आक्रामक कम और संयमित ज्यादा रही. यही वजह है कि विपक्ष के कई नेता भी निजी तौर पर उनके संसदीय व्यवहार की सराहना करते रहे हैं.

विधानसभा सचिवालय ने 'उत्कृष्ट विधायक' के लिए उनके चयन का मुख्य आधार उनका 'असाधारण संसदीय आचरण' बताया. दरअसल, खन्ना की पहचान उन नेताओं में रही है जो सदन के नियमों और प्रक्रियाओं की बारीक समझ रखते हैं. वे केवल राजनीतिक भाषण देने वाले नेता नहीं, बल्कि संसदीय परंपराओं को महत्व देने वाले विधायक माने जाते हैं. BJP विधानमंडल दल के नेता और सचेतक के तौर पर भी उन्होंने संगठन और विधायकों के बीच समन्वय बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है. 

उनकी राजनीतिक छवि का एक दिलचस्प पहलू उनका शायराना अंदाज भी है. योगी 2.0 सरकार के दौरान पेश किए गए बजट भाषणों ने उन्हें एक अलग पहचान दी. आमतौर पर बजट भाषण आंकड़ों और योजनाओं का सूखा दस्तावेज माना जाता है, लेकिन सुरेश खन्ना ने उसमें कविता, शेरो-शायरी और सांस्कृतिक संदर्भों का रंग भर दिया. उन्होंने वित्तीय दस्तावेजों को साहित्यिक अभिव्यक्ति के साथ जोड़ने की कोशिश की. यही वजह है कि उनके बजट भाषण केवल आर्थिक घोषणाओं तक सीमित नहीं रहे, बल्कि राजनीतिक और सांस्कृतिक संदेशों का माध्यम भी बने.

फरवरी 2026 में योगी 2.0 का आखिरी बजट पेश करते समय भी उन्होंने शायरी के जरिए सरकार की उपलब्धियों को रेखांकित किया. सदन में उनकी आवाज में पढ़े गए शेर सत्ता पक्ष की मेज थपथपाहट के साथ-साथ विपक्ष की 'वाह-वाह' भी हासिल करते रहे. उनके भाषणों में कभी रामचरितमानस की चौपाइयां सुनाई देती हैं तो कभी उर्दू शायरी. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह शैली केवल भाषण को रोचक बनाने तक सीमित नहीं रही, बल्कि BJP की सांस्कृतिक राजनीति और वैचारिक प्रस्तुति का हिस्सा भी बन गई. हालांकि आलोचक यह भी कहते रहे हैं कि बजट जैसे गंभीर विषय में कविता और शायरी का अधिक इस्तेमाल वास्तविक आर्थिक सवालों से ध्यान भटका सकता है. लेकिन समर्थकों के लिए यह उनकी संवाद क्षमता का उदाहरण है. वे जटिल आर्थिक शब्दावली को आम लोगों तक सहज भाषा में पहुंचाने की कोशिश करते दिखाई देते हैं.

सुरेश खन्ना की राजनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू उनका चुनावी रिकॉर्ड है. शाहजहांपुर में पिछले कुछ वर्षों में मुकाबले कठिन हुए, लेकिन वे लगातार जीतते रहे. 2022 के चुनाव में उन्होंने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार तनवीर खान को नौ हजार से अधिक वोटों से हराया. एक ही सीट और एक ही दल से लगातार नौ बार चुनाव जीतने का उनका रिकॉर्ड उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भी अलग पहचान देता है. इसी उपलब्धि के कारण उनका नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज किया गया. 

दिलचस्प यह भी है कि लंबे राजनीतिक जीवन के बावजूद उनकी निजी जिंदगी अपेक्षाकृत सादगीपूर्ण रही. उन्होंने विवाह नहीं किया और अपने भाई के परिवार के साथ रहते हैं. राजनीति में जहां व्यक्तिगत छवि अक्सर विवादों और निजी जीवन की चर्चाओं से घिरी रहती है, वहां खन्ना की छवि अपेक्षाकृत शांत और विवादों से दूर रही है.

विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने 'उत्कृष्ट विधायक' सम्मान को एक ऐतिहासिक पहल बताया है. उनका कहना है कि इससे नए विधायकों को प्रेरणा मिलेगी और सदन में बेहतर प्रदर्शन की संस्कृति विकसित होगी. दरअसल, भारतीय विधानसभाओं में अक्सर हंगामा, नारेबाजी और राजनीतिक टकराव सुर्खियां बनते हैं. ऐसे माहौल में अगर किसी विधायक को उसके संसदीय व्यवहार और विधायी योगदान के लिए सम्मानित किया जाता है तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए सकारात्मक संकेत माना जा सकता है. 

लेकिन इस फैसले का राजनीतिक संदेश भी है. BJP ने ऐसे नेता को आगे रखा है जिसकी छवि संगठननिष्ठ, अनुभवी और संसदीय मर्यादाओं का पालन करने वाले चेहरे की रही है. यह उस समय महत्वपूर्ण हो जाता है जब राजनीति में आक्रामकता और ध्रुवीकरण बढ़ने की चर्चा होती है. खन्ना का चयन उस परंपरागत राजनीतिक शैली की भी याद दिलाता है जिसमें संगठन, संवाद और संसदीय व्यवहार को अहम माना जाता था.

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