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माघ मेले में सतुआ बाबा पर बार-बार क्यों उठे सवाल?

प्रयागराज में चल रहे माघ मेले में सतुआ बाबा की लग्जरी लाइफस्टाइल और सत्ता से नजदीकियों ने संत समाज के भीतर मर्यादा पर बहस छेड़ दी है

संतोष दास उर्फ सतुआ बाबा की कहानी. (Photo: ITG)
संतोष दास उर्फ सतुआ बाबा
अपडेटेड 24 जनवरी , 2026

प्रयागराज माघ मेले में इस बार चर्चा का केंद्र कोई अखाड़ा या कोई परंपरागत धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक युवा संत हैं. साधु-संतों के बीच, श्रद्धालुओं की भीड़ और संगम स्नान के बीच अचानक जिनका नाम हर बहस में आता रहा है, वे हैं जगतगुरु महामंडलेश्वर संतोष दास उर्फ सतुआ बाबा. 

हाल के दिनों में संतों के बीच उन्हें लेकर कही गई बातों, फटकार और तंज ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है. माघ मेले की शुरुआत के साथ ही धूनी रमाने के कार्यक्रम में सतुआ बाबा का शांति और एकता का संदेश हो, या फिर दूसरे संतों द्वारा उनकी जीवनशैली पर उठाए गए सवाल, हर बयान ने उन्हें सुर्खियों में बनाए रखा है.

बसंत पंचमी स्नान पर्व के दौरान जब संगम पर श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी, उसी समय शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से जुड़ा विवाद भी गहराने लगा. इसी पृष्ठभूमि में सतुआ बाबा का बयान आया, जिसमें उन्होंने बिना नाम लिए यह कह दिया कि अगर कोई शंकराचार्य का सच्चा अनुयायी है तो उसे समाज को जोड़ना चाहिए, तोड़ना नहीं. इसके आगे उनका कहना था कि देश में कानून है और जो उसका उल्लंघन करेगा, उसके खिलाफ जांच के बाद कार्रवाई होगी. संतों के बीच कालनेमि जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर भी उन्होंने असहमति जताई और कहा कि संत का काम बाधा बनना नहीं, साधना से समाज को जोड़ना है. यह बयान सीधे-सीधे उस समय चल रही संत समाज की बहस से जुड़ गया और सतुआ बाबा को चर्चा के केंद्र में ले आया.

इसी बीच एक और घटनाक्रम ने आग में घी डाल दिया. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 21 जनवरी को पुरी शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने सतुआ बाबा को कड़ी फटकार लगाई. आरोप यह था कि सतुआ बाबा लग्जरी लाइफस्टाइल अपना रहे हैं और करोड़ों की गाड़ियों में घूम रहे हैं. शंकराचार्य ने उनसे सवाल किया कि एक जगतगुरु होकर वे दूसरे बाबाओं के पीछे क्यों भागते हैं और इतना पैसा कहां से आ रहा है. यह फटकार किसी निजी मुलाकात तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसकी खबर बाहर आते ही माघ मेले की गलियों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक फैल गई. संत समाज के भीतर मर्यादा और वैभव को लेकर बहस फिर तेज हो गई.

सतुआ बाबा को लेकर राजनीति भी पीछे नहीं रही. समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 22 जनवरी को मीडिया से बात करते हुए उन पर तंज कसा. अखिलेश ने कहा, “सतुआ बाबा को नहीं जानते हैं क्या आप, हम भी मुख्यमंत्री रहे हैं, हमने भी सतुआ बाबा को देखा है. वे हमारे आजम खान साहब के कान में क्या कहते थे!” इस बयान में नाम भले हल्के अंदाज में लिया गया हो, लेकिन संकेत साफ था कि सतुआ बाबा केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि राजनीतिक चर्चा का भी हिस्सा बन चुके हैं. इन तमाम बयानों और विवादों के बीच सवाल उठता है कि आखिर सतुआ बाबा हैं कौन, और माघ मेले में उनकी मौजूदगी इतनी बड़ी खबर क्यों बन गई. 

सतुआ बाबा का असली नाम संतोष तिवारी है, जिन्हें संतोष दास के नाम से भी जाना जाता है. वे उत्तर प्रदेश के ललितपुर जिले के मसौरा गांव के रहने वाले हैं. महज 11 साल की उम्र में उन्होंने घर छोड़ दिया और अध्यात्म की राह पकड़ ली. कहा जाता है कि वे जेब में सिर्फ 100 रुपये लेकर निकले थे. वाराणसी की रामकथा के दौरान उन्होंने युवा संन्यासी के तौर पर आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत की.

सतुआ बाबा विष्णु स्वामी संप्रदाय की सतुआ बाबा पीठ के मुखिया हैं. इस परंपरा में जो भी पीठाधीश्वर बनता है, उसे सतुआ बाबा कहा जाता है. 2011 में छठे पीठाधीश्वर यमुनाचार्य महाराज के निधन के बाद संतोष दास को उत्तराधिकारी घोषित किया गया. वे विष्णु स्वामी संप्रदाय के 57वें आचार्य माने जाते हैं. यह परंपरा करीब 2600 साल पुरानी बताई जाती है, जिसकी जड़ें दक्षिण भारत के मदुरै से जुड़ी हैं. विष्णु स्वामी बालरूप गोपाल के उपासक थे और उनके शिष्य परंपरा से यह संप्रदाय आगे बढ़ा.

18वीं सदी में इस परंपरा को काशी में मजबूत आधार मिला, जब दीक्षित प्रथम सतुआ बाबा महंत रणछोड़ दास ने वाराणसी के मणिकर्णिका घाट पर सतुआ बाबा आश्रम की स्थापना की. इसके बाद महंत मोहनदास, भोलादास, दामोदर दास, नरोत्तम दास और फिर यमुनाचार्य महाराज इस पीठ के प्रमुख बने. वर्तमान सतुआ बाबा, संतोष दास, इसी परंपरा के उत्तराधिकारी हैं. आश्रम में आज भी गुरुकुल परंपरा के तहत संस्कृत और वेदों की शिक्षा दी जाती है, जिसमें छात्रों को मुफ्त शिक्षा, रहने और भोजन की सुविधा दी जाती है.

लेकिन माघ मेले में सतुआ बाबा की पहचान केवल इस आध्यात्मिक विरासत तक सीमित नहीं रही. इस बार उनकी चर्चा उनकी लग्जरी लाइफस्टाइल को लेकर ज्यादा हुई. माघ मेला परिसर में जब वे 3 करोड़ रुपये की लैंड रोवर डिफेंडर कार से पहुंचे, तो यह दृश्य साधु-संतों के सादे जीवन की पारंपरिक छवि से बिल्कुल अलग था. बताया जा रहा है कि यह कार उत्तराखंड में रजिस्टर्ड है और इस पर ‘विष्णु स्वामी जगतगुरु सतुआ बाबा काशी’ लिखा हुआ है. माघ मेले में मौजूद साधु-संतों की यह सबसे महंगी कार बताई जा रही है.

सिर्फ कार ही नहीं, माघ मेले में सतुआ बाबा को उनके आश्रम के लिए सबसे ज्यादा जमीन अलॉट किए जाने की भी चर्चा रही. प्रशासन ने इस जमीन का कुल एरिया सार्वजनिक नहीं किया, लेकिन बताया गया कि उनका शिविर सबसे बड़ा है. विशाल पंडाल, आधुनिक सुविधाएं और व्यवस्थित कैंप ने इसे हाईटेक आश्रम की पहचान दे दी. बाहर खड़ी महंगी कार और भीतर संतों का पारंपरिक वातावरण, यह विरोधाभास लोगों के लिए चर्चा का विषय बन गया.

इसी पृष्ठभूमि में प्रयागराज के डीएम मनीष कुमार वर्मा का सतुआ बाबा के आश्रम में जाना और चूल्हे पर रोटी सेंकना भी सुर्खियों में आया. 24 दिसंबर को माघ मेला निरीक्षण के दौरान डीएम आश्रम पहुंचे थे. वहां उन्होंने साधु-संतों से कुशलक्षेम पूछा और व्यवस्थाओं का जायजा लिया. उसी दौरान वे कोट पहने हुए चूल्हे पर रोटी बनाते नजर आए, जबकि सतुआ बाबा उन्हें तरीका बता रहे थे. इसे भक्ति और सेवाभाव का प्रतीक बताया गया, लेकिन प्रशासन और संतों के रिश्तों पर सवाल भी उठे.

छह दिन बाद डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य प्रयागराज पहुंचे. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर डीएम को नसीहत दी कि आश्रम में रोटियां मत सेंकिए, फील्ड में काम करिए. यह टिप्पणी सीधे तौर पर उसी घटना से जुड़ी मानी गई. इसके बाद सतुआ बाबा का नाम राजनीति और प्रशासन की बहस में और गहराई से जुड़ गया.

सतुआ बाबा की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से नजदीकियां भी इस चर्चा का बड़ा कारण हैं. वे अक्सर योगी आदित्यनाथ के साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों में नजर आते हैं. कुंभ और माघ मेले के दौरान संगम स्नान हो या कोई धार्मिक आयोजन, कई मौकों पर वे मुख्यमंत्री के साथ दिखे हैं. महाकुंभ 2025 में उन्हें जगतगुरु की पदवी दी गई थी और उस कार्यक्रम में योगी आदित्यनाथ खुद मौजूद थे. 10 जनवरी को प्रयागराज में जगद्गुरु रामानंदाचार्य के 726वें जन्मोत्सव समारोह में योगी आदित्यनाथ ने मंच से सतुआ बाबा का जिक्र किया. उन्होंने कहा कि सतुआ बाबा समाज को जोड़ने का काम कर रहे हैं और जो नहीं जुड़ेगा, वह अंतिम समय में उनकी शरण में जाएगा. योगी का यह बयान संत समाज में सम्मान का प्रतीक माना गया, लेकिन राजनीतिक नजरिए से इसे सत्ता और संत के रिश्तों के तौर पर भी देखा गया.

सतुआ बाबा को लेकर उठने वाले सवाल यहीं खत्म नहीं होते. उनकी महंगी गाड़ियां, रे-बैन सनग्लास और हेलिकॉप्टर या हवाई जहाज के साथ सामने आती तस्वीरें साधु-संतों की पारंपरिक छवि से अलग दिखाई देती हैं. यही वजह है कि कुछ संतों और शंकराचार्यों ने इसे मर्यादा से जोड़कर देखा और सवाल उठाए. दूसरी तरफ उनके समर्थक कहते हैं कि यह वैभव व्यक्तिगत नहीं, बल्कि आश्रम और भक्तों की सुविधाओं से जुड़ा है.

इन सबके बीच यह भी सच है कि सतुआ बाबा आज केवल एक धार्मिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति और प्रशासन से जुड़े एक प्रभावशाली नाम बन चुके हैं. उनकी मौजूदगी माघ मेले में साधु-संतों की बदलती छवि, राजनीति और धर्म के रिश्ते और आधुनिक दौर में संतों की भूमिका पर बहस को जन्म देती है.

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