प्रयागराज के छोटा बघाड़ा मुहल्ले में एक छोटे से किराये के कमरे में रहने वाले 28 वर्षीय अमित मिश्र पिछले आठ साल से असिस्टेंट प्रोफेसर बनने की तैयारी कर रहे हैं. अप्रैल 2025 में जब उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग की असिस्टेंट प्रोफेसर परीक्षा हुई, तो उन्हें लगा कि अब लंबा इंतजार खत्म होने वाला है. सितंबर 2025 में परिणाम भी आ गया. इंटरव्यू की तैयारी शुरू हो चुकी थी. लेकिन 7 जनवरी को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर पूरी परीक्षा रद्द कर दी गई.
अमित कहते हैं, “गलत हुआ है, इसमें कोई शक नहीं. लेकिन सजा हर बार हम जैसे ईमानदार अभ्यर्थियों को क्यों मिलती है?” अमित अकेले नहीं हैं. असिस्टेंट प्रोफेसर, टीईटी, टीजीटी और पीजीटी जैसी परीक्षाओं के बार-बार स्थगित होने और रद्द होने से लाखों युवाओं की जिंदगी अधर में लटकी हुई है. सवाल अब सिर्फ एक परीक्षा का नहीं, बल्कि पूरे भर्ती तंत्र की विश्वसनीयता का बन गया है.
परीक्षाएं रद्द होने का सिलसिला
उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग के गठन का उद्देश्य था कि बेसिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा के एडेड कॉलेजों में शिक्षकों की भर्ती एक पारदर्शी और समयबद्ध प्रक्रिया के तहत हो. लेकिन बीते एक साल में आयोग विवादों का केंद्र बन गया. सबसे बड़ा मामला असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा का रहा. 33 विषयों में 910 पदों के लिए नवंबर 16-17 अप्रैल 2025 में यह परीक्षा 52 केंद्रों पर आयोजित की गई थी. परिणाम घोषित हो चुका था और इंटरव्यू बाकी थे. इसी बीच यूपी एसटीएफ की जांच में पेपर लीक, फर्जी प्रश्न पत्र और अवैध धन वसूली के गंभीर आरोप सामने आए. एक आउटसोर्स कर्मचारी की गिरफ्तारी ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए.
जांच में यह बात सामने आई कि एक-एक अभ्यर्थी से 35 लाख रुपये तक की डील की गई थी. मोबाइल डेटा और अभ्यर्थियों की सूची के मिलान से यह स्पष्ट हो गया कि परीक्षा में सेंध लगी थी. इसके बाद पूरी परीक्षा रद्द कर दी गई. इससे पहले शिक्षक पात्रता परीक्षा, जो करीब चार साल बाद जनवरी 2026 में प्रस्तावित थी, अचानक स्थगित कर दी गई थी. 15 लाख से ज्यादा अभ्यर्थियों ने इसके लिए आवेदन किया था. परीक्षा स्थगित होने के बाद अब तक नई तारीख की कोई घोषणा नहीं हुई है.
टीजीटी और पीजीटी परीक्षाओं की कहानी और भी लंबी है. 2022 में विज्ञापन निकला, 13 लाख से ज्यादा आवेदन आए, लेकिन परीक्षा बार-बार टलती रही. 2025 में अकेले चार बार तारीख बदली गई. कभी प्रशासनिक कारण, कभी तकनीकी खामियां और कभी आयोग में नेतृत्व का संकट. नतीजा यह कि तीन साल बाद भी परीक्षा अधर में है.
आयोग के भीतर की उथल-पुथल
परीक्षाओं पर उठे सवालों के बीच आयोग की कार्यप्रणाली भी जांच के घेरे में आई. सितंबर 2024 में बनीं आयोग की पहली अध्यक्ष प्रोफेसर कीर्ति पांडेय का अचानक इस्तीफा भी इसी कड़ी में देखा जा रहा है. आधिकारिक तौर पर कारण नहीं बताए गए, लेकिन बाद में सामने आए तथ्यों से यह साफ हुआ कि असिस्टेंट प्रोफेसर परीक्षा में सामने आई गड़बड़ियों का दबाव था. लिखित परीक्षा के बाद ही पारदर्शिता को लेकर सवाल उठने लगे थे. अभ्यर्थियों ने रेंडमाइजेशन न होने, सीसीटीवी की कमी और सिलेबस से बाहर के प्रश्नों की शिकायतें की थीं. इसके बावजूद आयोग इंटरव्यू कराने पर अड़ा रहा. विरोध बढ़ा, आंदोलन हुए और आखिरकार परीक्षा स्थगित करनी पड़ी.
कुछ ही दिनों बाद अध्यक्ष का इस्तीफा हो गया. पिछले दिसंबर में मुख्यमंत्री योगी ने पूर्व डीजीपी प्रशांत कुमार को शिक्षा सेवा चयन आयोग का नया अध्यक्ष नियुक्त किया. इसके बाद से प्रशांत कुमार ने आयोग की भर्ती प्रक्रियाओं में सुधार के लिए प्रयास तो शुरू किए लेकिन उसके नतीजे अभी दिखने बाकी हैं.
कोई अभ्यर्थी खुश तो कोई नाराज
परीक्षाओं के रद्द होने पर छात्र संगठनों ने जहां इसे अपनी जीत बताया, वहीं बड़ी संख्या में अभ्यर्थी मानसिक थकान की बात कर रहे हैं. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रहीं नेहा सिंह कहती हैं, “हर परीक्षा के साथ हमारी उम्र बढ़ रही है. असिस्टेंट प्रोफेसर बनने की अधिकतम आयु सीमा करीब आती जा रही है. सरकार कहती है कि निष्पक्षता के लिए परीक्षा रद्द की गई, लेकिन हमारे नुकसान की भरपाई कौन करेगा?”
कई अभ्यर्थियों ने बताया कि वे प्राइवेट नौकरियां छोड़कर या पारिवारिक जिम्मेदारियों को टालकर तैयारी कर रहे हैं. बार-बार तारीख बदलने से न सिर्फ आर्थिक बोझ बढ़ता है, बल्कि मानसिक दबाव भी. कोचिंग फीस, किराया और किताबों का खर्च अलग. छात्र संगठनों का कहना है कि आंदोलन के बिना सरकार कोई कदम नहीं उठाती. असिस्टेंट प्रोफेसर परीक्षा को लेकर अप्रैल 2025 से लगातार प्रदर्शन हुए. धरना, वार्ता और दबाव के बाद जाकर परीक्षा रद्द की गई.
सरकार क्या कह रही है
सरकार का कहना है कि परीक्षा रद्द करना मजबूरी थी, विकल्प नहीं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ कहा कि भर्ती प्रक्रियाओं में किसी भी तरह की गड़बड़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी. सरकार के प्रवक्ता के मुताबिक, यह फैसला ईमानदार अभ्यर्थियों के हित में लिया गया ताकि भर्ती प्रक्रिया पर जनता का भरोसा बना रहे. सरकार यह भी दावा कर रही है कि दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा रही है. एसटीएफ की जांच में कई अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की पड़ताल हो रही है. जिनके खिलाफ पुख्ता सबूत मिलेंगे, उनके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे. साथ ही आयोग को निर्देश दिए गए हैं कि दोबारा परीक्षा पूरी पारदर्शिता के साथ कराई जाए. हालांकि सरकार के सामने चुनौती यह है कि भरोसा सिर्फ कार्रवाई से नहीं, बल्कि समयबद्ध और भरोसेमंद परीक्षा आयोजन से लौटेगा.
शिक्षा और प्रशासन के विशेषज्ञ मानते हैं कि समस्या कुछ लोगों की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की है. पूर्व शिक्षा सचिव रहे एक विशेषज्ञ के अनुसार, “आयोगों में आउटसोर्सिंग पर अत्यधिक निर्भरता, तकनीकी निगरानी की कमी और जिम्मेदारी तय न होना सबसे बड़ी खामियां हैं. जब तक परीक्षा संचालन पूरी तरह प्रोफेशनल एजेंसियों और मजबूत आईटी सिस्टम के जरिए नहीं होगा, ऐसे मामले सामने आते रहेंगे.” शिक्षा नीति के जानकारों का कहना है कि बार-बार परीक्षा रद्द होना अंतिम विकल्प होना चाहिए. इसके बजाय दोषी व्यक्तियों और संदिग्ध अभ्यर्थियों को अलग कर प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है. इससे लाखों ईमानदार अभ्यर्थियों का भविष्य अधर में नहीं रहेगा.
चुनाव से पहले बढ़ती बेचैनी
भर्ती परीक्षाओं का मुद्दा अब सिर्फ प्रशासनिक नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक बन चुका है. विधानसभा चुनाव से पहले युवाओं की नाराजगी किसी भी सरकार के लिए खतरे की घंटी होती है. विपक्ष इस मुद्दे को लगातार उठा रहा है और सरकार पर युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ का आरोप लगा रहा है. लखनऊ के शिया कालेज में राजनीति शास्त्र विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर अमित राय कहते हैं, “युवाओं की बेरोजगारी और भर्तियों में देरी पहले से ही संवेदनशील मुद्दा है. उस पर परीक्षाओं का बार-बार रद्द होना सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा सकता है. अगर समय रहते सरकार ठोस सुधार और स्पष्ट टाइमलाइन नहीं देती, तो इसका असर चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है.”
जानकार मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में भर्ती परीक्षाएं रद्द होने का सिलसिला इसलिए नहीं रुक पा रहा क्योंकि समस्या जड़ में है. आयोग की संरचना, परीक्षा संचालन, निगरानी तंत्र और जवाबदेही, हर स्तर पर सुधार की जरूरत है. सिर्फ परीक्षा रद्द कर देना समाधान नहीं है. अमित राय बताते हैं, “सरकार के लिए जरूरी है कि वह एक स्पष्ट रोडमैप पेश करे. नई परीक्षाओं की तारीख, तकनीकी सुधार, निगरानी व्यवस्था और दोषियों पर कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक हो. अभ्यर्थियों को यह भरोसा मिलना चाहिए कि उनकी मेहनत बेकार नहीं जाएगी."
अमित मिश्र जैसे लाखों युवाओं के लिए सवाल आज भी वही है, “क्या अगली परीक्षा वाकई होगी, या फिर एक और तारीख, एक और निरस्तीकरण?” जब तक इस सवाल का भरोसेमंद जवाब नहीं मिलता, तब तक यूपी में भर्ती परीक्षाओं पर संकट बना रहेगा.

