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बिहार में मकर संक्रांति का त्योहार पॉलिटिकल पर्व कैसे बन गया?

बिहार में जैसे-जैसे छोटी पार्टियां बढ़ीं और गठबंधन की राजनीति का दौर आया, मकर संक्रांति जैसे त्योहार राजनीतिक होते गए

तेज प्रताप यादव के दही-चूड़ा भोज में लालू प्रसाद यादव और राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान
तेज प्रताप यादव के दही-चूड़ा भोज में लालू प्रसाद यादव और राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान
अपडेटेड 16 जनवरी , 2026

बुधवार यानी 14 जनवरी को बिहार की राजधानी पटना में लालू राबड़ी के बेदखल पुत्र तेज प्रताप यादव अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाते नजर आए. उन्होंने मकर संक्रांति के मौके पर बड़े पैमाने पर कुछ इस तरह दही-चूड़ा का भोज आयोजित किया, जैसे कभी उनके पिता किया करते थे. 

इस भोज में उन्होंने राज्य की सभी अलग-अलग पार्टियों के नेताओं को बुलाया. उनके इस भोज में BJP की तरफ से उप मुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा थे तो JDU की तरफ से मंत्री अशोक चौधरी. मगर इस भोज के दो चीफ गेस्ट थे, एक राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान तो दूसरे उनके पिता पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव. 

इस भोज का सबसे बड़ा फायदा तेज प्रताप को यह हुआ कि उनके पिता लालू प्रसाद यादव जिन्होंने कुछ माह पहले उन्हें पार्टी और परिवार दोनों से बेदखल कर दिया था, इस भोज के बाद उन्हें माफ कर दिया.

भोज में जहां उनके दोनों मामा भी नजर आए, मगर उनके छोटे भाई तेजस्वी यादव, जिन्हें लालू ने अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है, वे आमंत्रण के बाद भी नहीं आए. वे अपने घर में अकेले चूड़ा-दही खाते दिखे. एक तरह से ऐसा लग रहा था कि वे अलग थलग पड़ गए हैं. इसका असर सिर्फ उन पर नहीं पड़ा बल्कि पूरी राष्ट्रीय जनता पार्टी (RJD) मकर संक्रांति के मौके पर सन्नाटे में रही. पार्टी मुख्यालय से लेकर लालू राबड़ी आवास तक जो कभी दही चूड़ा के भोज के बड़े सेंटर हुआ करते थे, वहां इस बार कोई भोज नहीं हुआ.

दरअसल यह घटना बताती है कि जहां पूरे देश में मकर संक्रांति एक त्योहार भर है, बिहार के लिए यह इससे आगे बढ़कर पॉलिटिकल पर्व का रूप ले चुका है. और हर साल इस भोज के जरिए कई तरह की राजनीति तय होती है. इस बार सिर्फ तेज प्रताप यादव ने ही चूड़ा-दही का भोज आयोजित नहीं किया है. चिराग पासवान भी ऐसा ही भोज आयोजित कर अपने पिता की इस भोज वाली विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. इस बार उनके भोज में दूसरे डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी पहुंचे. 

चिराग पासवान के दही-चूड़ा भोज में पहुंचे डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी
चिराग पासवान के दही-चूड़ा भोज में पहुंचे डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी

JDU की तरफ से हर साल उसके वरिष्ठ नेता वशिष्ठ नारायण सिंह चूड़ा-दही का भोज आयोजित करते थे, इस बार इस भोज का बीड़ा रत्नेश सदा ने उठाया है. BJP दफ्तर में मकर संक्रांति का भोज पार्टी के किसान संगठन के लोगों ने आयोजित किया है तो कांग्रेस दफ्तर में भी यह भोज आयोजित हुआ है. डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा ने अलग से भोज आयोजित किया. वाम दलों को छोड़ दें तो लगभग सभी दलों ने ऐसे आयोजन किए.

वरिष्ठ पत्रकार अरुण अशेष कहते हैं, "मकर संक्रांति के ये भोज अब सिर्फ राजधानी पटना तक सीमित नहीं रह गए हैं, इनका प्रसार जिला मुख्यालयों तक हो गया है. अब हर बड़े नेता और प्रतिनिधि पर चूड़ा-दही का भोज आयोजित करने का दबाव हो गया है. दरअसल बिहार में चूड़ा-दही का यह भोज करीब करीब वैसा ही रूप ले चुका है, जैसा रूप पिछले दिनों इफ्तार पार्टियों ने ले लिया था."

अरुण अशेष जिन इफ्तार पार्टियों का जिक्र करते हैं, वे भी रमजान के महीने में अब पूरे देश में होती हैं और राजनेता इनमें बढ़ चढ़कर भाग लेते हैं. अरुण कहते हैं, "दिलचस्प यह है कि इफ्तार पार्टियों के पॉलिटिकल आयोजनों की भी शुरुआत बिहार से ही हुई थी, सबसे पहले पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय जगन्नाथ मिश्रा ने 1980 के दशक में इसे शुरू किया था, फिर इसका राष्ट्रव्यापी प्रसार हो गया. इसलिए लोग उस जमाने में उन्हें मोहम्मद जगन्नाथ भी कहते थे. हालांकि यह भी दिलचस्प है कि सुशील मोदी BJP के नेता होने के बावजूद इफ्तार पार्टी दिया करते थे."

जगन्नाथ मिश्र जब सत्ता से हटे और बिहार में सत्ता की कमान लालू प्रसाद यादव के हाथों आई, तब उन्होंने मकर संक्रांति के मौके पर बड़े पैमाने पर दही चूड़ा के भोज की शुरुआत की. उनके करीबी सहयोगी और RJD के वरिष्ठ प्रवक्ता चितरंजन गगन कहते हैं, "लालू ने सिर्फ चूड़ा-दही के भोज की ही नहीं बल्कि अपने आवास पर कुर्ता फाड़ होली की भी शुरुआत की. वे लोक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए यह सब करते थे, उन्होंने कई लोक कलाकारों को सरकारी नौकरी भी दी."

लालू के जेल जाने पर और फिर कोविड का दौर छोड़कर लगभग हर साल उनके आवास पर चूड़ा-दही का भोज होता रहा. यह पहला मौका है, जब उनके आवास पर चूड़ा-दही का भोज नहीं हुआ. लालू के समय में दो अन्य नेताओं ने भी चूड़ा-दही के भोज की परंपरा को आगे बढ़ाया- एक रामविलास पासवान तो दूसरे JDU के नेता वशिष्ठ नारायण सिंह.

1998 में जब वशिष्ठ नारायण सिंह सांसद बने तो उन्होंने बिहार की इस परंपरा को देश के सामने लाने के लिए दिल्ली में चूड़ा-दही के भोज का आयोजन करना शुरू किया. अरुण अशेष बताते हैं, "उस वक्त BJP नेता सीपी ठाकुर भी दिल्ली में चूड़ा-दही के भोज का आयोजन करने लगे. बाद में वशिष्ठ नारायण सिंह जब पटना में रहने लगे तो उन्होंने इस परंपरा को यहां जारी रखा. तब एक तरफ लालू जी के यहां चूड़ा-दही खिलाया जाता तो दूसरी तरफ वशिष्ठ नारायण सिंह के घर पर भी यही चलता था."

अरुण अशेष अपना एक निजी अनुभव साझा करते हैं, "शायद 2008 की बात है, लालू जी ने मुझे बुलाकर कहा था, वशिष्ठ के यहां का दही बहुत खराब होता है, मेरे यहां आकर खाया करो. मतलब यह कि तब दोनों खेमों में इस भोज को लेकर प्रतिस्पर्धा होने लगी थी, हालांकि तब भी इसका कोई राजनीतिक गुना गणित नहीं था, यह बाद में शुरू हुआ."

दरअसल बिहार में जैसे-जैसे छोटी पार्टियां बढ़ीं और गठबंधन की राजनीति का दौर आया ऐसे भोज भी बढ़े और इनकी राजनीति भी. वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह कहते हैं, "यह एक तरह की फूड डिप्लोमेसी है, जैसे डिनर डिप्लोमेसी हुआ करती है. बिहार में चूड़ा-दही के आयोजनों को देखकर अब अंदाजा लगाया जाता है कि कौन पार्टी या कौन नेता किधर जा रहा है. दरअसल इस आयोजन से पहले खरमास होता है, जिसमें हर तरह के बड़े राजनीतिक फैसले होल्ड पर रहते हैं. इसलिए लोगों में यह जानने की इच्छा रहती है कि किसको मंत्री बनाया जाएगा, कौन विधायक किधर जाएगा या किसको MLC बनाया जाएगा."

इस बार खरमास से पहले चुनाव हुए हैं और नई सरकार बनी है. अभी मंत्रियों के दस पद खाली हैं, राज्य सभा की पांच सीटों और विधान परिषद की कई सीटों पर फैसला लिया जाना है. JDU में संगठन के स्तर पर भी बड़े बदलाव की चर्चा है और नीतीश के पुत्र निशांत के राजनीति में आने की भी खबरें हैं. इन सब खबरों की पुष्टि के लिए राजनेता, मीडिया और आमलोग इन आयोजनों पर टकटकी लगाते हैं और वहां की गतिविधियों के मायने निकालते हैं.

संतोष सिंह एक और बात की तरफ इशारा करते हैं, "बिहार में सिर्फ चूड़ा-दही की डिप्लोमेसी नहीं होती. यहां ललन सिंह मटन पार्टी देते हैं और मुकेश सहनी मछली पार्टी. अपने जमाने में सुशील मोदी पत्रकारों को चाट पार्टी दिया करते थे. यानी यहां फूड डिप्लोमेसी के कई रूप हैं."

बहरहाल इफ्तार से चूड़ा-दही तक और चाट पार्टी से मछली के भोज तक बिहार में नेताओं के खाने खिलाने के शौक निराले हैं. उनमें सबसे खास चूड़ा-दही का भोज है, आज की तारीख में बिहार के नेताओं ने मकर संक्रांति को पॉलिटिकल पर्व बना डाला है.

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