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उत्तर प्रदेश में CGST का भ्रष्टाचार कैसे एक संगठित रैकेट में बदल रहा है?

झांसी में सेंट्रल GST के वरिष्ठ अफसरों की गिरफ्तारी ने टैक्स सिस्टम के भीतर चल रहे संगठित भ्रष्टाचार को बेनकाब कर दिया है

He further said that corruption in India "runs on targets". (Image generated by AI)
झांसी केस से GST अफसरों के भ्रष्टाचार का एक तय पैटर्न सामने आया
अपडेटेड 6 जनवरी , 2026

झांसी में केंद्रीय वस्तु एवं सेवा कर (CGST) के वरिष्ठ अफसरों की गिरफ्तारी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि GST व्यवस्था, जो “वन नेशन वन टैक्स” के सपने के साथ लाई गई थी, उसमें भ्रष्टाचार की जड़ें आखिर इतनी गहरी क्यों होती जा रही हैं. 

यूपी में अब तक राज्य GST अफसरों पर घूस, सेटिंग और टैक्स चोरी में मिलीभगत के आरोप सामने आते रहे हैं, लेकिन इस बार सेंट्रल GST के अफसरों की भूमिका ने पूरे सिस्टम की साख पर सवालिया निशान लगा दिया है. 

झांसी प्रकरण महज 70 लाख रुपये की रिश्वत पर रंगे हाथ पकड़े जाने की कहानी नहीं है. यह एक ऐसी केस स्टडी है, जो बताती है कि टैक्स चोरी, कानूनी दबाव, दलालों की भूमिका और अफसरों की आपसी सांठगांठ कैसे एक “सिस्टम” बन चुकी है. साथ ही यह भी सामने लाता है कि CBI जैसी जांच एजेंसियां इस सिस्टम को तोड़ने के लिए किस तरह परत-दर-परत घेरेबंदी करती हैं.

वह फोन कॉल, जिसने पूरा खेल खोल दिया

18 दिसंबर 2025 को CGST की टीम ने झांसी के दो बड़े कारोबारियों- जय अंबे प्लाईवुड और जय दुर्गा हार्डवेयर- के गोदामों पर छापा मारा. जांच में अघोषित स्टॉक, टैक्स चोरी और दस्तावेजों की गड़बड़ियां सामने आईं. विभागीय आकलन के मुताबिक टैक्स चोरी की रकम 20 से 23 करोड़ रुपये तक पहुंच सकती थी. कानून के हिसाब से यह कार्रवाई आगे बढ़ती तो कारोबारियों पर भारी टैक्स डिमांड, पेनल्टी और आपराधिक कार्रवाई तय थी. यहीं से “डील” का खेल शुरू हुआ. 

छापेमारी के तुरंत बाद अधिवक्ता नरेश कुमार गुप्ता सक्रिय हुए. उन्होंने कारोबारियों को भरोसा दिलाया कि “ऊपर तक बात हो सकती है” और मामला सेटल कराया जा सकता है. जांच एजेंसियों के मुताबिक यही वह मोड़ था, जहां सरकारी कार्रवाई निजी सौदे में बदल गई. CBI की एफआईआर के अनुसार, CGST की डिप्टी कमिश्नर प्रभा भंडारी ने साफ संदेश भिजवाया कि रिश्वत की रकम डेढ़ करोड़ रुपये से एक पैसा भी कम नहीं होगी. सुपरिटेंडेंट अनिल तिवारी और अजय शर्मा इस डील के फील्ड ऑपरेटर बने. 18 से 25 दिसंबर के बीच कई बैठकें हुईं. कभी कारोबारी अफसर के घर पहुंचे, कभी वकील के जरिए संदेश गया. हर बार यही कहा गया कि सबूत मजबूत हैं और राहत सिर्फ “सेटिंग” से ही मिलेगी. 

एफआईआर में दर्ज है कि 30 लाख रुपये पहले ही दिए जा चुके थे और बाकी रकम किश्तों में तय हुई. 70 लाख रुपये पहली बड़ी किश्त के तौर पर तय किए गए. झांसी के एक कारोबारी को जब इस डील की भनक लगी, तो मामला CBI तक पहुंच गया. इसके बाद जांच एजेंसी ने चुपचाप झांसी में डेरा डाल दिया. 30 दिसंबर को CBI ने जाल बिछाया. CGST कार्यालय में ही अनिल तिवारी और अजय शर्मा को 70 लाख रुपये नकद लेते हुए रंगे हाथ पकड़ लिया गया. 

पूछताछ में दोनों टूट गए और उन्होंने सीधे अपने सीनियर, डिप्टी कमिश्नर प्रभा भंडारी का नाम लिया. लेकिन CBI सिर्फ कबूलनामे पर भरोसा नहीं करती. एजेंसी को ठोस सबूत चाहिए था. यहीं से जांच का सबसे अहम और नाटकीय हिस्सा शुरू हुआ. CBI अधिकारियों की मौजूदगी में एक सुपरिटेंडेंट से प्रभा भंडारी को स्पीकरफोन पर कॉल करवाया गया. फोन उठा. “पार्टी ने 70 लाख दे दिए हैं,” सुपरिटेंडेंट ने कहा. CBI के मुताबिक, दूसरी तरफ से जवाब आया, “बहुत बढ़िया.” इसके बाद नकदी को सोने में बदलने और आगे की डील को लेकर निर्देश दिए गए. पूरी बातचीत रिकॉर्ड हो गई. यही कॉल बाद में केस का सबसे मजबूत सबूत बनी. उस वक्त प्रभा भंडारी दिल्ली में थीं. CBI की एक टीम ने 31 दिसंबर को उन्हें वहीं से गिरफ्तार किया, जबकि दूसरी टीम ने झांसी में उनके बंद फ्लैट का ताला तोड़कर करीब चार घंटे तक तलाशी ली. 

अफसरों का निलंबन और विभागीय कार्रवाई

तलाशी में नकद, सोना, जेवर और संपत्ति के दस्तावेज बरामद हुए. कुल नकदी और जेवरात की कीमत करीब 1.6 करोड़ रुपये आंकी गई. CBI ने डिप्टी कमिश्नर प्रभा भंडारी, सुपरिटेंडेंट अनिल तिवारी और अजय शर्मा के साथ कारोबारी राजू मंगतानी और वकील नरेश कुमार गुप्ता को गिरफ्तार किया. बाद में दो अन्य कारोबारियों के नाम भी केस में जुड़े. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत केस दर्ज हुआ और सभी आरोपित जेल भेजे गए. 

मामला सामने आने के बाद केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) ने सख्त कदम उठाए. डिप्टी कमिश्नर को निलंबित किया गया और दोनों सुपरिटेंडेंट पर भी कार्रवाई हुई. विभागीय जांच शुरू कर दी गई है. साथ ही यह भी तय हुआ कि जिन पुराने मामलों में इन अफसरों की भूमिका रही है, उनकी भी दोबारा समीक्षा होगी.

कैसे चलता है GST में भ्रष्टाचार

झांसी केस से GST अफसरों के भ्रष्टाचार का एक तय पैटर्न सामने आता है. एक सेवानिवृत्त अधिकारी के मुताबिक पहले छापेमारी या जांच के दौरान बड़े पैमाने पर अनियमितताओं को हाइलाइट किया जाता है, ताकि कारोबारी दबाव में आ जाए. इसके बाद वकील या बिचौलिये के जरिए “सेटिंग” का संदेश दिया जाता है. फिर रकम कई किश्तों में तय होती है, जिसमें फील्ड अफसर, सीनियर अफसर और कभी-कभी अन्य कर्मचारियों का हिस्सा बंटा होता है. कुछ मामलों में घूस की रकम ऊपर तक पहुंचाई जाती है, ताकि शिकायत या जांच की गुंजाइश खत्म हो जाए. CBI की ताजा पूछताछ में यह भी संकेत मिले हैं कि झांसी कार्यालय में कई और अधिकारी और कर्मचारी इस रैकेट से जुड़े हो सकते हैं. कुछ को घूस की रकम का तय प्रतिशत मिलता था.

केंद्र और राज्य, दोनों में क्यों नहीं थम रहा भ्रष्टाचार

यह सवाल अहम है कि GST जैसे टेक्नोलॉजी-आधारित सिस्टम में भ्रष्टाचार क्यों कायम है. विशेषज्ञ बताते हैं कि GST में अफसरों के पास अब भी आकलन, छापेमारी और नोटिस जारी करने की बड़ी विवेकाधीन शक्ति है. जहां विवेक है, वहां दुरुपयोग की गुंजाइश भी रहती है. दूसरी वजह, टैक्स कानून की जटिलता. कारोबारी अक्सर लंबे विवाद और कानूनी लड़ाई से बचना चाहते हैं. इसी डर का फायदा उठाकर अफसर “सेटलमेंट” का रास्ता दिखाते हैं. तीसरी वजह, निगरानी तंत्र की कमजोरी. केंद्र और राज्य दोनों स्तर पर इंटरनल विजिलेंस अक्सर तभी सक्रिय होती है, जब मामला बाहर आ जाए. एक वरिष्ठ टैक्स विशेषज्ञ कहते हैं, “जब तक छापेमारी और आकलन की प्रक्रिया पूरी तरह ऑटोमेटेड और ट्रैक नहीं होगी, तब तक मानवीय हस्तक्षेप से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा.”

CBI के सामने अब चुनौती सिर्फ इस केस को कोर्ट में साबित करने की नहीं है, बल्कि यह पता लगाने की भी है कि यह नेटवर्क कितना बड़ा है. पूछताछ में कुछ ऐसे नाम सामने आए हैं, जिन तक जांच अभी पहुंचनी बाकी है. एजेंसी जेल में बंद आरोपियों से दोबारा पूछताछ की तैयारी कर रही है. उम्मीद है कि आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां हो सकती हैं.

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