केरल चुनाव के आंकड़े अपनी एक कहानी बयान करते हैं लेकिन उनके पीछे की राजनीति बिल्कुल अलग बात कहती है. युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) की चुनावी जीत के बाद वी.डी. सतीशन का केरल का मुख्यमंत्री बनना ऊपरी तौर पर एक आदर्श लोकतांत्रिक सत्ता हस्तांतरण जैसा दिखता है.
यह चुनाव परिणाम जाहिर करता है कि एक विपक्षी नेता को मतदाताओं ने समर्थन दिया और उसने अपनी मेहनत से यह पद हासिल किया. हालांकि केरल की जटिल राजनीतिक संस्कृति में सत्ता हस्तांतरण का तरीका अक्सर इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है.
इस बार सरकार बदलने के बाद तिरुवनंतपुरम से लेकर कोझीकोड तक राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF में अब असली सीनियर पार्टनर कौन है? कोई भी केरल से जुड़ा गंभीर राजनीति विश्लेषक भारतीय यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) की चुनावी क्षमता पर सवाल नहीं उठा रहा है.
इस पार्टी की सफलता दर, बूथ स्तर का अनुशासन और वोट ट्रांसफर की मजबूत व्यवस्था पूरे देश की अन्य पार्टियों के लिए मिसाल बन गई है. IUML ने 24 सीटों पर चुनाव लड़ा और गठबंधन की औसत जीत दर से कहीं बेहतर प्रदर्शन किया. मलप्पुरम में अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखते हुए उसने उन इलाकों में भी अपनी संगठनात्मक पहुंच बढ़ाई जहां पहले वह बहुत कमजोर थी.
ऐसा माना जाता है कि मलप्पुरम जिले में IUML की सबसे मजबूत पकड़ है. यह क्षेत्र इस बार सबसे ज्यादा मतदान फीसद वाले जिलों में शामिल रहा. यह बात कांग्रेस और BJP दोनों के वॉर रूम में नजर अंदाज नहीं की गई. 2026 के नतीजों ने IUML की इस सफलता को राजनीतिक पूंजी में बदल दिया है. गठबंधन की राजनीति में जब किसी दल का प्रदर्शन इस तरह उभर कर सामने आता है तो गठबंधन का समीकरण ही बदल जाता है.
IUML का सतीशन के समर्थन में खड़ा होना बिल्कुल तर्कसंगत राजनीति थी. सतीशन कांग्रेस के उन वरिष्ठ नेताओं में रहे हैं जिन्होंने IUML की CPI(M) और BJP दोनों के हमलों से रक्षा की. उन्होंने गठबंधन धर्म को ध्यान में रखकर जब भी मौका मिला, IUML के पक्ष में मजबूती से खड़े होने का काम किया. यही कारण है कि IUML ने बिना देर किए उन्हें अपना समर्थन दे दिया.
UDF के भीतर IUML की अब मजबूत पकड़ बन जाने के कारण BJP को ईसाई तथा हिंदू समुदायों के बीच अपनी पहुंच तेजी से बढ़ाने का अच्छा मौका दिख रहा है. BJP के एक शीर्ष नेता का कहना है, “केंद्र में मजबूत NDA (राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन) सरकार होने के कारण हमें उम्मीद है कि केरल के ईसाई और हिंदू समुदाय जल्द ही यह महसूस करेंगे कि BJP अब CPI(M) और कांग्रेस के मुकाबले उनके अधिकारों की रक्षा करने की बेहतर स्थिति में है.”
BJP नेता ने इसके आगे तर्क दिया कि पिछले एक दशक में उनकी पार्टी ने सीरियन क्रिश्चियन समूहों के साथ-साथ कुछ रोमन कैथोलिकों के बीच भी अपनी पैठ बनाई है. अब आने वाले समय में BJP इन दलों के बीच अपनी पैठ और मजबूत करना चाहती है. BJP नेता का मानना है कि लीग की बढ़ती लोकप्रियता का इतिहास उसके वर्तमान चुनावी प्रदर्शन से कहीं अधिक लंबा और जटिल है.
दशकों से IUML का केरल के कई ईसाई समुदायों के साथ संबंध खराब रहा है. हालांकि, दोनों समूह UDF के सदस्य रहे हैं. कई निर्वाचन क्षेत्रों में एक-दूसरे के खिलाफ होने के बावजूद उनके चुनावी हित प्रतिस्पर्धी होने के बजाय पूरक हैं. हालांकि. पिछले कुछ समय में यह समझ अब कमजोर हो गई है. इनके बीच संस्थागत नियंत्रण के मुद्दों को लेकर बार-बार टकराव देखने को मिला है.
खासकर शिक्षा क्षेत्र में, जहां दोनों समुदाय सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेजों और स्कूलों के बड़े नेटवर्क को चलाते हैं. अल्पसंख्यक संस्थानों की स्वायत्तता, सरकारी नियामक निगरानी और सरकारी सहायता को लेकर हुए विवादों ने कई बार लीग समर्थक हितों और चर्च समर्थित प्रबंधनों को परस्पर एक-दूसरे के खिलाफ खड़ा कर दिया है.
उदाहरण के लिए, 2010 के अंत में सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेजों में पदों को लेकर जो विवाद हुए, उनमें ईसाई प्रबंधन और IUML से जुड़े संस्थानों ने एक ही अल्पसंख्यक अधिकारों के तहत सुरक्षा मांगी. इससे UDF के अंदर ही कभी-कभी खुली राजनीतिक असहमति सामने आई. इसके अलावा, केरल में जमीन और डेमोग्राफी को लेकर एर्नाकुलम, थ्रिसूर और कोट्टायम के कुछ हिस्सों में सीरियन क्रिश्चियन समुदाय ने बार-बार असहजता जताई है. चर्च के लोगों ने अपने इलाके में मुस्लिमों की आबादी बढ़ने और घुसपैठ को लेकर चिंता जाहिर की है. उनका मानना है कि इन लोगों को गल्फ देशों से फंड मिल रहा है.
हालांकि, ये विचार मुख्यधारा के ईसाई राजनीतिक नेतृत्व के जरिए समर्थित नहीं हैं. संस्थागत चर्च ने आमतौर पर लीग (IUML) के साथ सीधे टकराव से बचने की कोशिश की है. फिर भी ईसाई समुदाय में ये चिंताएं दिख रही हैं. इस तरह की चिंताएं खासतौर पर डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और पैरिश (चर्च) नेटवर्कों में देखने को मिल रहा है. पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) जैसे संगठनों के उदय ने इन चिंताओं को और गहरा कर दिया है. बता दें कि केंद्र सरकार ने 2022 में PFI पर बैन लगा दिया था.
PFI और IUML की राजनीतिक परंपराएं पूरी तरह से अलग हैं. IUML ने PFI की विचारधारा और तरीकों से खुद को लगातार दूर रखा लेकिन केरल के मध्य भाग में ईसाई समुदायों के बीच सार्वजनिक चर्चा में यह फर्क हमेशा साफ नहीं देखने को मिला. केरल के मुस्लिम समाज में बढ़ती दबदबे वाली प्रवृत्ति की धारणा, चाहे वह किसी भी संगठन के रूप में हो, अब एक राजनीतिक हकीकत बन गई है. इसने सभी पार्टियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है.
समस्या नजरिये की है, उस राज्य में जहां समुदायों की भावनाओं और धारणाओं को लेकर बहुत संवेदनशीलता होती है. जब सत्ता हस्तांतरण की कहानी, आंशिक रूप से ही सही जब IUML के समर्थन से जुड़ जाती है तो राजनीतिक विरोधियों को ठीक वैसा हथियार मिल जाता है जिसकी उन्हें जरूरत है.
केरल के मौजूदा माहौल में ये विरोधी बहुत सावधानी और ध्यान से सब कुछ देख रहे हैं. पहले की तरह अब BJP केरल में कोई छोटी-मोटी ताकत नहीं रह गई है. अब उसके राज्य में असली पकड़ बन चुकी है. पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार के गिरने के बाद BJP के कार्यकर्ताओं को यहां भी हौसला बढ़ाने वाला सबक मिला है. कार्यकर्ताओं को अब लगने लगा है कि केरल, पंजाब, तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी उनकी सरकार बन सकती है.
ऐसे लोग जो केरल में BJP की संभावनाओं को हल्के में लेते रहे हैं, उन्हें अब यह सच्चाई स्वीकार करनी होगी. BJP की केरल में रणनीतिक प्रगति वास्तविक है, भले ही उसके चुनावी लक्ष्य अभी काफी दूर हों. 2024 के लोकसभा चुनाव में NDA को केरल में करीब 19 फीसद वोट मिले. साथ ही सुरेश गोपी के त्रिशूर से जीतने के साथ BJP को राज्य में अपनी पहली लोकसभा सीट मिली.
2026 के विधानसभा चुनाव में BJP ने अपनी सीटों की संख्या में तीन सीटें और जोड़ीं, जो राज्य विधानसभा चुनाव में उसका अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन है. महत्वपूर्ण बात यह है कि पूरे राज्य में सिर्फ 12 फीसद से थोड़ा ज्यादा वोट पाने के बावजूद BJP ने 22 से ज्यादा विधानसभा क्षेत्रों में पहला या दूसरा स्थान हासिल किया. यह भौगोलिक फैलाव 2016 में लगभग असंभव लगता था, जब BJP के पास सिर्फ एक सीट थी और उसका वोट 11 फीसद से कम था.
राज्य में BJP अब उस पुरानी छवि से बाहर निकल चुकी है जिसकी वजह से पहले उसकी जीतों की अहमियत कम हो जाती थी. जिन कार्यकर्ताओं को सालों तक यह बताया जाता रहा कि उनके प्रयास सिर्फ प्रतीकात्मक हैं, अब उन्हें यह बताया जा रहा है कि उनके प्रयास बुनियादी और आधारभूत हैं. कार्यकर्ताओं के लिए यह पूरी तरह से अलग राजनीतिक ऊर्जा है.
पार्टी नेतृत्व के लिए चुनाव नतीजों का विश्लेषण कर रहे BJP के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा, “करीब 7 फीसद ऐसे मतदाता हैं जो BJP को वोट देने से परहेज नहीं करते लेकिन उन्होंने विधानसभा चुनाव में वोट नहीं दिया. हमें इनमें से बहुत से मतदाताओं को अपने पक्ष में लाने के लिए और ज्यादा गहराई से काम करना होगा और उनके मन में विश्वास पैदा करना होगा."
त्रिशूर की लोकसभा सीट पर BJP की जीत ठहरकर विचार करने लायक है क्योंकि यह सिर्फ एक सेलिब्रिटी उम्मीदवार का प्रभाव नहीं था. त्रिशूर ऐतिहासिक तौर पर केरल का सबसे ज्यादा सांप्रदायिक और राजनीतिक रूप से प्रतिस्पर्धी जिला रहा है. यहां हिंदू, ईसाई और मुस्लिम आबादी अच्छी-खासी संख्या में हैं.
BJP का इन अलग-अलग समुदायों के बीच पर्याप्त वोटों को एकजुट करके सीट जीतना यह दिखाता है कि कम से कम मध्य केरल के कुछ इलाकों में पार्टी का सामाजिक गठबंधन रणनीतिक तौर पर सफल है. सीटें जीतने से भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि संघ परिवार के अंदर बंगाल मॉडल की चर्चा तेजी से बढ़ रही है. चाहे पश्चिम बंगाल केरल के लिए सही मिसाल हो या नहीं (संरचनात्मक कारणों से इस तुलना पर सावधानी बरतने की जरूरत है) लेकिन यह कार्यकर्ताओं के आंतरिक विश्वास को मजबूत करने के लिए काफी है. साथ ही पार्टी के अंदर गहरी जड़ें जमाए पुराने राजनीतिक ढांचे को तोड़ने के लिए भी काफी है.
केरल की जनसंख्या में ईसाई समुदाय की हिस्सेदारी करीब 18 फीसद है इसलिए BJP इन समुदायों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है. BJP यहां पहले के दशक की तरह हिंदुत्व वाली भाषा नहीं बल्कि बारीक, मुद्दा-आधारित बातें कर रही हैं. इसका कई विधानसभा क्षेत्रों में साफ तौर पर असर देखने को मिल रहा है.
किसानों की परेशानी, शिक्षा की स्वायत्तता की चिंता, कट्टरवाद-विरोधी भावना, इन मामलों के जरिए BJP राजनीतिक रूप से फायदा उठा रही है. पिनराई विजयन ने अपने दो कार्यकाल में मजबूत गवर्नेंस और वैचारिक स्पष्टता के सहारे एक राजनीतिक पहचान बनाई थी. 2026 की हार ने दोनों को जटिल बना दिया है. LDF का वोट शेयर 38 फीसद से नीचे गिर गया. यह 2006 के बाद उसका सबसे खराब प्रदर्शन है.
BJP अगर लीग (IUML) पर बहुत आक्रामक हमला करें तो मुस्लिम वोट UDF के पीछे मजबूती से एकजुट हो जाएगा जिससे CPI(M) की वापसी और भी मुश्किल हो जाएगी. दूसरी ओर अगर आलोचना नरम रखी और BJP का यह नैरेटिव बनाने में सफल रही कि दोनों पार्टियां अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की शिकार हो चुकी हैं तो इससे पार्टी हिंदू और ईसाई मतदाताओं के बीच विश्वसनीय बन जाएगा. ऐसा हुआ तो वामपंथ से यह वोट बैंक अलग हो जाएगा जिसे उन्होंने लंबे समय से अपने पास बनाए रखा है.
मतलब साफ है कि केरल अब स्थिर द्विध्रुवीय राजनीति से निकलकर अधिक अस्थिर त्रिकोणीय (triangular) मुकाबले की तरफ जा रहा है. त्रिकोणीय लड़ाई में अक्सर वह पार्टी जीत जाती है जिसका अपना कोर वोट बैंक सबसे अधिक केंद्रित और मजबूत होता है. भले ही वह तीसरे स्थान पर हो.
देश के दूसरे हिस्सों में BJP ने न सिर्फ नैरेटिव बनाने में, बल्कि उन्हें जमीन पर ले जाने में भी कमाल कर दिखाया है. कांग्रेस IUML की ज्यादा तेजी से रक्षा करके इस नजरिये की समस्या को नहीं मिटा सकती बल्कि जितना ज्यादा बचाव का रुख अपनाएगी, उतना ही यह पुष्टि करेगी कि जिस नैरेटिव को वह खारिज करना चाहती है, वही सही है.
सतीशन की सरकार का मूल्यांकन हर सरकार की तरह उसके शासन पर होगा. केरल की मशहूर राजनीतिक परिपक्वता ने इन तनावों को हमेशा संस्थागत समझौतों और आर्थिक एकीकरण के जरिए संभाला है. अब सवाल यह है कि क्या यह परिपक्वता मौजूदा समय के लिए पर्याप्त है?
BJP केरल में लंबी पारी खेलने के लिए तैयारी कर रही है. उसका दांव यह है कि कांग्रेस-नेतृत्व वाला UDF, जिसकी अब IUML पर ज्यादा निर्भरता है वह धीरे-धीरे इतना झुकेगा कि उसके अंदर का विरोधाभास छिपाना नामुमकिन हो जाएगा. बकरीद इसका ताजा उदाहरण है. सतीशन सरकार ने 27 और 28 मई दोनों दिन छुट्टी घोषित कर दी. इसकी वजह भी साफ है कि 2025 में जब राज्य ने बकरीद की तारीख बदली थी, तब IUML ने LDF सरकार की आलोचना की थी. इस बार कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार इस तरह की किसी भी आलोचना से बचना चाहती है. इसी का फायदा आने वाले समय में BJP को मिलने वाला है.
BJP-शासित बंगाल इसके ठीक उलट तस्वीर पेश करता है. शुभेंदु अधिकारी सरकार ने पुरानी दो दिन की छुट्टी की परंपरा को खत्म कर दिया और केवल 28 मई को ही छुट्टी घोषित की, जो केंद्र सरकार के साथ मेल खाती है. केरल BJP को कोई जल्दी नहीं है. वह इंतजार कर रही है कि UDF में इतने सारे विवाद पैदा हो जाएं कि अपने आप BJP के लिए जगह बन जाए.

