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झारखंड में हत्या का एक मामला इतना बड़ा कैसे बना कि 28 पुलिसकर्मी हो गए सस्पेंड!

बोकारो में नौ महीने पहले हुई हत्या का मामला पुलिस सुलझा नहीं पा रही थी, लेकिन रांची हाईकोर्ट के आदेश के बाद गठित SIT ने उसे एक ही दिन में सुलझा दिया. अब राज्य पुलिस सवालों के घेरे में है

Sambhal murder case( Photo: Representational)
सांकेतिक फोटो
अपडेटेड 14 अप्रैल , 2026

बीते एक अप्रैल को BJP ने राष्ट्रीय अपराध नियंत्रण ब्यूरो (NCRB) और झारखंड पुलिस के आंकड़ों के आधार पर दावा किया था कि झारखंड में साल 2020 से जनवरी 2026 तक रेप की 10,113 और हत्या की 9,213 घटनाएं घट चुकी हैं. आंकड़ों के दूसरी तरफ, यानी घटना घटने के बाद आम आदमी के लिए न्याय पाने की प्रक्रिया और भी डरावनी दिख रही है. इसी घटनाक्रम से जुड़ी मिसाल है कि राज्य के एक ही थाने के 28 पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर दिया गया है.

दरअसल बोकारो जिले के खूंटाडीह गांव की रहने वाली रेखा देवी ने 24 जुलाई 2025 को अपनी 18 वर्षीय बेटी पुष्पा महतो के लापता होने की शिकायत पिंडराजोरा थाने में दर्ज कराई थी. करीब नौ महीने तक पुलिस उसे खोजने में असफल रही, जिसके बाद परिवार ने रांची हाई कोर्ट का रुख किया.

सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले में पुलिस की ढीली कार्यप्रणाली पर कड़ी फटकार लगाई. इसके चलते डीजीपी से लेकर जिले के एसपी तक को कोर्ट में पेश होना पड़ा. अदालत के दखल के बाद डीजीपी ने जांच सीआईडी को सौंपी और इसके लिए एक एसआईटी गठन का आदेश दिया. एसआईटी ने एक ही दिन में मामला सुलझा लिया.

रेखा देवी और उनके पति
रेखा देवी और उनके पति

आरोपी दिनेश कुमार महतो की निशानदेही पर पीड़िता के कंकाल के अवशेष बरामद किए गए, जिसके बाद उसे गिरफ्तार कर लिया गया. पूछताछ में उसने स्वीकार किया कि युवती द्वारा शादी के दबाव के कारण वह मानसिक रूप से परेशान था और इसी वजह से उसने हत्या की योजना बनाई.

घटना के दिन आरोपी ने युवती को चास कॉलेज के पास मिलने के बहाने बुलाया और फिर सुनसान जंगल में ले जाकर चाकू से उसकी हत्या कर दी. हत्या के बाद उसने शव को झाड़ियों में छिपा दिया और फरार हो गया. इस मामले में एसपी हरविंदर सिंह ने पिंडराजोरा थाने के थानेदार सहित सभी 28 कर्मियों को एक साथ सस्पेंड कर दिया.

खोजने के बजाय पुलिस ने बेटी पर ही आरोप लगाए

बेटी के घर लौटने की उम्मीद पाले बैठी मां को जब उसके कंकाल के बारे में पता चला, तो वह चीत्कार कर उठी. वे बताती हैं, “गांव का ही एक लड़का बीते कई महीनों से मेरी बेटी को परेशान कर रहा था. मामला ज्यादा बढ़ा तो गांव में पंचायत बुलाई गई, जिसके बाद उस लड़के ने कहा कि अब वह परेशान नहीं करेगा. बीते 21 जुलाई 2025 को मेरी बेटी कॉलेज गई, लेकिन देर शाम तक लौटकर नहीं आई. मैं उसी दिन शाम को थाना गई, लेकिन थानेदार ने केस दर्ज करने से मना कर दिया.”

उनके मुताबिक, “स्थानीय नेताओं के दबाव में तीन दिन बाद आवेदन लिया गया, फिर एफआईआर दर्ज करने में पुलिस ने दस दिन लगा दिए. यही नहीं, जब एफआईआर दर्ज की गई, तो पुलिस ने उसमें से आरोपी का नाम हटा दिया. पुलिस का कहना था कि मेरी बेटी उस लड़के के साथ भाग गई है. बेटी के चरित्र को लेकर थाने में गंदी गालियां दी गईं. इसके बाद मैंने 29 जुलाई को जिलाधिकारी और 31 जुलाई को एसपी के पास आवेदन दिया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई. इसके उलट आरोपी के परिजनों और स्थानीय पुलिस की तरफ से लगातार धमकी दी जाने लगी.”

रेखा देवी ने आरोप लगाया है कि आरोपी थाने के कर्मियों के साथ बैठकर शराब पीता था. साथ ही उसने पुलिस को पैसे देकर किसी भी तरह की कार्रवाई न करने के लिए तैयार कर लिया था. उनके मुताबिक पहली शिकायत दर्ज कराने से लेकर जनवरी 2026 तक वह जिलाधिकारी और एसपी के पास तीन-तीन बार गुहार लेकर गईं.

पुष्पा महतो के लापता होने की पहली शिकायत इसी थाने में दर्ज कराई गई थी
पुष्पा महतो के लापता होने की पहली शिकायत इसी थाने में दर्ज कराई गई थी

रेखा देवी को न्याय दिलाने के लिए बोकारो जिला परिषद की उपाध्यक्ष बबीता लगातार उनके साथ बनी रहीं. वे कहती हैं, “जब कहीं कोई उम्मीद नहीं दिखी तो हमने 14 फरवरी को हाईकोर्ट में रिट दायर कर दी. इसके बाद 27 फरवरी को पहली सुनवाई हुई जिसमें जिले के एसपी वर्चुअली शामिल हुए. फिर बीते 7 मार्च और 9 अप्रैल को डीजीपी भी वर्चुअली शामिल हुईं. इसी दिन कोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई थी, जिसके बाद डीजीपी तदाशा मिश्रा ने सीआईडी को जांच सौंपी थी.”

इधर दूसरी तरफ, थाना प्रभारी समेत 28 पुलिसकर्मियों के निलंबन को लेकर विवाद गहरा गया है. झारखंड पुलिस एसोसिएशन ने इस कार्रवाई को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए बोकारो के पुलिस अधीक्षक हरविंदर सिंह को तत्काल हटाने की मांग की है.

एसोसिएशन के अध्यक्ष राहुल कुमार मुर्मू ने कहा, “पूरे मामले की समीक्षा और कार्रवाई में पुलिस अधीक्षक विफल रहे हैं. अपनी प्रशासनिक कमजोरियों को छिपाने के लिए उन्होंने एक ही थाने के 28 पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया है. अगर निर्दोष पुलिसकर्मियों का निलंबन वापस नहीं लिया गया और ट्रांसफर-पोस्टिंग में पारदर्शिता नहीं बरती गई, तो वे अपने सदस्यों के न्याय के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं.”

न्याय पाने की प्रक्रिया पहुंच चुकी है ऑस्कर तक

झारखंड में न्याय पाने की प्रक्रिया की चर्चा ऑस्कर तक पहुंच चुकी है, वह भी एक बार नहीं बल्कि दो बार. पहली फिल्म ‘कोर्ट’ अप्रैल 2014 में आई थी, जिसमें झारखंड के जीतन मरांडी की भी कहानी थी. दरअसल जीतन मरांडी एक सांस्कृतिक दल के कर्मी थे. इस दल पर माओवादियों के समर्थन का भी आरोप था. साल 2007 में राज्य के पूर्व सीएम बाबूलाल मरांडी के बेटे की माओवादियों ने हत्या कर दी थी.

हत्या का आरोप नक्सली जीतन मरांडी पर लगा. पुलिस ने असली जीतन मरांडी को गिरफ्तार करने के बजाय, मिलते-जुलते नाम की वजह से सांस्कृतिक कर्मी जीतन मरांडी को गिरफ्तार कर लिया. उन्हें निचली अदालत से फांसी की सजा दी गई. बाद में हाईकोर्ट ने फांसी की सजा पर रोक लगा दी, लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में जीतन मरांडी आठ साल तक कोर्ट के चक्कर लगाते रहे.

दूसरी फिल्म ‘टू किल अ टाइगर’ थी. इस फिल्म का मुख्य किरदार रांची के मांडर थाना क्षेत्र के एक पिता का है, जिसकी 13 साल की बेटी के साथ तीन लोगों ने बलात्कार किया था. आरोपी गिरफ्तार तो किए गए, लेकिन गांव-समाज और पुलिस द्वारा लगातार दबाव बनाया जा रहा था कि वह केस वापस ले ले. लेकिन उस पिता ने पूरे आठ साल तक अकेले दम पर कोर्ट में वह लड़ाई लड़ी.

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