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करोड़ों के पुल, कौड़ियों की जान! यूपी में मजदूरों के सुरक्षा इंतजाम कमजोर क्यों?

हमीरपुर में छह मौतों के बाद भी यूपी के निर्माणाधीन पुलों पर मजदूर बिना हेलमेट, सेफ्टी बेल्ट और लाइफ जैकेट के काम करने को मजबूर, जिम्मेदार एजेंसियां केवल निर्देशों तक सीमित

Hamirpur Bridge Incident
हमीरपुर में बन रहे पुल का एक हिस्सा 28 मई को ढह गया
अपडेटेड 1 जून , 2026

हमीरपुर जिले में बेतवा नदी पर 28 मई की रात निर्माणाधीन पुल का पिलर और स्लैब अचानक भरभराकर गिरा तो उसके मलबे में सिर्फ कंक्रीट और सरिया ही नहीं दबे बल्कि निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा को लेकर सरकारी दावों की भी पोल खुल गई. 

इस हादसे में चार मजदूरों और दो सुरक्षा गार्डों की मौत हो गई. प्रारंभिक जांचों में निर्माण संबंधी खामियों और निगरानी की कमी की बात सामने आई है लेकिन इस दुर्घटना ने एक और गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर उत्तर प्रदेश में हजारों करोड़ रुपए की लागत से बन रहे पुलों और फ्लाईओवरों पर काम करने वाले मजदूर कितने सुरक्षित हैं?

हमीरपुर की घटना के बाद कानपुर, बरेली और प्रदेश के अन्य जिलों में निर्माणाधीन पुलों की पड़ताल करने पर जो तस्वीर सामने आई, वह बेहद चिंताजनक है. लगभग हर जगह सुरक्षा मानकों की खुलेआम अनदेखी हो रही है. मजदूर बिना हेलमेट, बिना लाइफ जैकेट, बिना सुरक्षा बेल्ट और बिना सुरक्षा जूतों के ऊंचाई पर काम करते दिखाई दिए. कई स्थानों पर फर्स्ट एड बॉक्स तक मौजूद नहीं था. यानी एक बड़े हादसे के बाद भी निर्माण एजेंसियों और सरकारी विभागों ने कोई सबक नहीं लिया. 

कानपुर में गंगा नदी पर कानपुर-शुक्लागंज के बीच क्षतिग्रस्त पुल के समानांतर 235 करोड़ रुपए की लागत से नया पुल बनाया जा रहा है. इस परियोजना का निर्माण कार्य केकेआर और गॉवर कंस्ट्रक्शन कंपनी के पास है. झाड़ी बाबा पड़ाव की ओर पिछले पांच महीनों से निर्माण कार्य जारी है. यहां अब तक 11 वेल पिलरों का ढांचा तैयार किया जा चुका है और लगभग 32 मीटर गहराई तक कुएं खोदे जा रहे हैं. लेकिन मौके पर काम कर रहे मजदूरों के पास बुनियादी सुरक्षा उपकरण तक नहीं हैं. 

मजदूरों का कहना है कि उन्हें हेलमेट, लाइफ जैकेट, हैंड ग्लव्स और सेफ्टी शूज जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गई हैं. स्थिति और भी चिंताजनक तब दिखती है जब इन्हीं मजदूरों को गंगा के किनारे गहरे पानी और ऊंचाई वाले क्षेत्रों में काम करना पड़ता है. ऐसे कार्यों में अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार लाइफ जैकेट, फुल बॉडी हार्नेस और रेस्क्यू सिस्टम अनिवार्य माने जाते हैं. लेकिन वास्तविकता यह है कि मजदूर अपनी जान जोखिम में डालकर रोजी-रोटी कमाने को मजबूर हैं.

कानपुर के भीतरगांव क्षेत्र के सचौली गांव में पांडु नदी पर बन रहे फोरलेन पुल का दृश्य भी इससे अलग नहीं है. पुल के दोनों छोरों पर एक दर्जन से अधिक मजदूर निर्माण कार्य में लगे हुए हैं. लेकिन किसी ने लाइफ जैकेट नहीं पहन रखी थी. सिर पर हेलमेट नहीं था, शरीर पर रिफ्लेक्टिव जैकेट नहीं थी और पैरों में सुरक्षा जूते भी नहीं थे. 

कई मजदूर ऊंचाई पर काम कर रहे थे लेकिन उनके शरीर पर सुरक्षा बेल्ट तक नहीं बंधी थी. जरा सी चूक किसी बड़े हादसे में बदल सकती थी. कानपुर में राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की महत्वाकांक्षी रिंग रोड परियोजना में भी सुरक्षा मानकों की स्थिति संतोषजनक नहीं है. कानपुर के आसपास नगर, देहात और उन्नाव जिले को जोड़ने वाली 93.20 किलोमीटर लंबी रिंग रोड परियोजना के तहत गंगा पर दो बड़े पुल बनाए जा रहे हैं. रूमा से आटा और मंधना से उन्नाव तक चल रहे निर्माण कार्यों में भी कई स्थानों पर मजदूर बिना पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के काम करते दिखाई दे रहे हैं. जबकि यह परियोजनाएं सीधे एनएचएआई की निगरानी में चल रही हैं.

वहीं बरेली जिले की तस्वीर भी कम चिंताजनक नहीं है. हमीरपुर हादसे के बाद यहां निर्माणाधीन पुलों के कार्य में लगे मजदूरों की सुरक्षा लगभग भगवान भरोसे है. आठ मई को बरेली-मथुरा हाईवे पर चौबारी क्षेत्र में निर्माण कार्य के दौरान जाल गिरने से चालक भगवानदास की मौत हो चुकी है. इसके बावजूद कार्यस्थलों पर सुरक्षा उपायों में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है. फरीदपुर ब्लॉक के टिसुआ और हसनगंज के बीच कैलाश नदी पर बन रहे पुल में मजदूर बिना सुरक्षा उपकरणों के काम कर रहे हैं. 
करीब 17.63 करोड़ रुपए की लागत वाली इस परियोजना में मजदूरों के पास न हेलमेट है और न ही सुरक्षा जूते. 

इसी तरह मीरगंज क्षेत्र में भाखड़ा नदी पर बन रहे पुल और पहुंच मार्ग निर्माण में भी सुरक्षा मानकों को दरकिनार किया जा रहा है. नवाबगंज क्षेत्र में पनथैली नदी पर बन रहे पुल में मजदूरों के हाथों में ग्लव्स तक नहीं हैं, जिससे काम के दौरान उनके हाथ कटने की शिकायत सामने आई हैं. 

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन सुरक्षा उपायों की अनदेखी हो रही है, वे कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं बल्कि कानूनी अनिवार्यता हैं. मजदूर नेता रामअवतार सिंह बताते हैं, “श्रम कानूनों और निर्माण क्षेत्र से जुड़े सुरक्षा नियमों के अनुसार प्रत्येक मजदूर को पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट (पीपीई) उपलब्ध कराया जाना चाहिए. इसमें हेलमेट, रिफ्लेक्टिव जैकेट, गमबूट, सेफ्टी शूज, सेफ्टी बेल्ट, ग्लव्स, वेल्डिंग चश्मा और जरूरत पड़ने पर ईयर प्लग शामिल हैं. जलाशयों और नदियों पर काम करने वाले श्रमिकों के लिए लाइफ जैकेट और आपातकालीन बचाव उपकरण भी अनिवार्य माने जाते हैं. लेकिन किसी भी निर्माणकार्य में मजदूरों को सुरक्षा उपकरण नहीं मुहैया कराए गए हैं.” 

मजदूर संगठनों का आरोप है कि निर्माण एजेंसियां लागत कम करने और काम तेजी से पूरा करने के दबाव में सुरक्षा को सबसे पहले नजरअंदाज करती हैं. भारतीय मजदूर संघ से जुड़े श्रमिक नेता कहते हैं कि सरकारी परियोजनाओं में सुरक्षा मानकों को लेकर कागजों पर बड़ी-बड़ी बातें लिखी जाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका पालन नहीं होता. अधिकांश ठेकेदार सुरक्षा उपकरणों को अतिरिक्त खर्च मानते हैं. बरेली में एक पुल के निर्माण में लगे मजदूर बताते हैं, “कई बार मजदूरों को उपकरण दिए भी जाते हैं तो उनकी नियमित निगरानी नहीं होती. नतीजा यह होता है कि दुर्घटना होने पर पूरा दोष मजदूरों पर मढ़ दिया जाता है.” मजदूरों के मुताबिक इस बात की भी जांच नहीं होती कि उन्हें जो सुरक्षा उपकरण दिए गए हैं वे पूरी तरह दुरुस्त हैं कि नहीं. कई बार बहुत पुराने सुरक्षा उपकरण थमा दिए जाते हैं जो किसी प्रकार की राहत नहीं दे पाते.
 
निर्माण क्षेत्र के जानकार अजय मिश्र बताते हैं कि पुल निर्माण सबसे जोखिम भरे कार्यों में से एक माना जाता है. यहां भारी मशीनों, ऊंचाई, गहरे पानी, कंक्रीट ढलाई और स्टील संरचनाओं के बीच काम करना पड़ता है. ऐसे में सुरक्षा उपकरणों की अनुपस्थिति किसी भी समय जानलेवा साबित हो सकती है. विशेषज्ञों का कहना है कि हमीरपुर जैसी घटनाएं अचानक नहीं होतीं बल्कि लंबे समय से चली आ रही लापरवाही का परिणाम होती हैं. हालांकि सरकारी अधिकारी दावा कर रहे हैं कि सुरक्षा मानकों के पालन के लिए निर्देश पहले से मौजूद हैं. एनएचएआई के प्रोजेक्ट डायरेक्टर पंकज यादव का कहना है कि कानपुर रिंग रोड परियोजना के दोनों पुलों का कार्य अभी जमीनी स्तर पर चल रहा है और सुरक्षा मानकों का पालन कराने के निर्देश दिए गए हैं. साइट इंजीनियर नियमित निरीक्षण भी करते हैं. यदि कहीं कोई कमी पाई जाती है तो उसे दूर कराया जाएगा.

वहीं सेतु निगम के चीफ प्रोजेक्ट मैनेजर विजय कुमार सेन का कहना है कि गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों के पालन को लेकर पहले से दिशा-निर्देश जारी हैं. सभी निर्माण स्थलों पर इनका शत-प्रतिशत अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिए दोबारा निर्देश दिए जाएंगे. उन्होंने कहा कि गुणवत्ता के साथ किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाएगा. हमीरपुर हादसे के बाद बरेली मंडल के मंडलायुक्त भूपेंद्र एस. चौधरी ने भी निर्माणाधीन पुलों की जांच के आदेश दिए हैं. उन्होंने कहा है कि स्लैब और पिलर निर्माण के दौरान अभियंताओं को मौके पर मौजूद रहकर निगरानी करने के निर्देश दिए गए हैं. यदि जांच में किसी प्रकार की खामी पाई जाती है तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी.

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या हर हादसे के बाद सिर्फ जांच और निर्देशों का सिलसिला ही चलता रहेगा? हमीरपुर में छह लोगों की मौत के बाद भी यदि प्रदेश के अन्य जिलों में मजदूर बिना हेलमेट और सुरक्षा बेल्ट के काम करते मिल रहे हैं तो यह केवल किसी एक ठेकेदार की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरी निगरानी व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है. उत्तर प्रदेश इस समय एक्सप्रेसवे, पुलों, रिंग रोड और औद्योगिक परियोजनाओं के बड़े निर्माण दौर से गुजर रहा है. सरकार बुनियादी ढांचे के विकास को अपनी प्रमुख उपलब्धियों में गिनाती है. लेकिन विकास की इस चमक के पीछे उन हजारों मजदूरों की सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है जो दिन-रात इन परियोजनाओं को आकार दे रहे हैं. यदि निर्माण की गति बढ़ाने की होड़ में मजदूरों की जान को दांव पर लगाया जाता रहा तो हमीरपुर जैसी घटनाएं अपवाद नहीं बल्कि एक भयावह प्रवृत्ति बन सकती हैं.

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