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गुजरात के घास के मैदान बनेंगे चीतों का नया घर! लेकिन चरागाहों का क्या होगा?

भारत का दूसरा चीता राज्य बनने की तैयारी कर रहे गुजरात के सामने एक बड़ा सवाल है. क्या दुनिया के सबसे तेज दौड़ने वाले जीव के लिए 500 हेक्टेयर जगह पर्याप्त होगी?

सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 19 जून , 2026

राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) ने बन्नी घास के मैदान में चार चीतों को बसाने की मंजूरी दे दी है. अंतिम स्वीकृति केंद्र सरकार से मिलनी बाकी है. इसके बाद जुलाई या अगस्त में एक-एक नर और मादा के दो जोड़े यहां लाए जाने की उम्मीद है. इसके साथ ही मध्य प्रदेश के बाद गुजरात, चीतों वाला भारत का दूसरा राज्य बन जाएगा.

ये चीते केन्या से लाए जाएंगे. यह फैसला जानबूझकर लिया गया है ताकि मध्य प्रदेश के कूनो-पालपुर वन्यजीव अभयारण्य में लाए गए नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका के चीतों से अलग आबादी विकसित की जा सके. इसकी एक वजह यह भी है कि उत्तरी गोलार्ध के चीतों में सर्दियों के दौरान घना फर नहीं उगता. कूनो में 2023 में इसी घने फर की वजह से रेडियो कॉलर वाली जगह पर त्वचा में गंभीर संक्रमण हुआ था, जिससे कुछ चीतों की मौत हो गई थी.

बन्नी में केन्या से आने वाले चीतों के साथ कूनो के चीते भी लाए जाएंगे. गुजरात वन विभाग अगले एक साल में चरणबद्ध तरीके से यहां 12 चीतों की आबादी तैयार करना चाहता है. इस मानसून में जब दुनिया का सबसे तेज दौड़ने वाला यह जीव कच्छ पहुंचेगा तो यह बन्नी के लिए एक अहम घटना होगी. इससे बन्नी को वैश्विक वन्यजीव संरक्षण के नक्शे पर नई पहचान मिलेगी. साथ ही यह बहस भी फिर तेज होगी कि क्या एशिया का सबसे बड़ा घास का मैदान इस परियोजना की उम्मीदों पर खरा उतर पाएगा.

हालांकि इस योजना तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं रहा. शुरुआत में केन्या ने चीतों के हस्तांतरण पर आपत्ति जताई थी. वहां के पर्यावरणविदों का कहना था कि भारत में अफ्रीका की आनुवंशिक रूप से अलग चीता आबादी को बसाना, अलग-अलग उप-प्रजातियों को मिलाने संबंधी अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के दिशा-निर्देशों के खिलाफ है.

दूसरी ओर दक्षिण अफ्रीका ने भी स्वास्थ्य संबंधी समीक्षा पूरी होने तक नए चीतों को भेजने पर रोक लगा दी थी. वहां के संरक्षण विशेषज्ञों का कहना था कि कूनो में अब तक करीब नौ आयातित वयस्क चीते और भारत में जन्मे नौ शावकों की मौत हो चुकी है इसलिए वहां और चीते भेजना उचित नहीं होगा. बाद में केन्या के साथ समझौता फिर आगे बढ़ा.

बन्नी कोई सामान्य स्थान नहीं है. ग्रेट रण के उत्तरी किनारे पर फैला यह घास का मैदान भूगर्भीय हलचलों के कारण समुद्र से उभरा था. इसका क्षेत्रफल 2,600 वर्ग किलोमीटर से अधिक है. यहां घास की 60 से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं. इसे एशिया का सबसे बड़ा और सबसे समृद्ध घास का मैदान माना जाता है. सदियों से यह क्षेत्र दुग्ध अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी रहा है. यहां की देखभाल मालधारी समुदाय करता है. हिंदू और मुस्लिम पशुपालकों का यह समुदाय 19 पंचायतों में फैला है और पिछले 400 वर्षों से इनके भैंस और कांकरेज नस्ल गाय-बैल यहां चरते आए हैं.

यह पूरा पारिस्थितिकी तंत्र एक समय लगभग नष्ट हो गया था और इसकी वजह एक पेड़ बना. 1961 में वन विभाग ने रण से आने वाले खारे पानी को रोकने के लिए प्रोसोपिस जुलीफ्लोरा के पेड़ लगाए थे. स्थानीय भाषा में इसे 'गांडो बावल' यानी 'पागल पेड़' कहा जाता है. बाद में यह तेजी से फैल गया और उसने लगभग आधे घास के मैदान पर कब्जा कर लिया. इसके कारण चारे के उत्पादन में भारी गिरावट आई. 1960 के दशक में जहां प्रति हेक्टेयर करीब 4,000 किलोग्राम चारा मिलता था, वह 1999 तक घटकर लगभग 620 किलोग्राम रह गया.

बन्नी के पुनरुद्धार में राज्य सरकार के साथ मालधारी समुदाय की भी बड़ी भूमिका रही है. 2,600 वर्ग किलोमीटर में से अब तक करीब 100 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को दोबारा बहाल किया जा चुका है. सामुदायिक वन समितियों ने हजारों हेक्टेयर क्षेत्र से इस विदेशी पेड़ को हटाया. साथ ही पारंपरिक 'वीरदा' जल प्रणालियों को फिर जीवित किया जिससे देसी घास दोबारा उगने लगी. इसी बहाल किए गए क्षेत्र में अब चीतों के लिए 5 वर्ग किलोमीटर का इलाका तैयार किया जा रहा है.

वन विभाग की योजना फिलहाल एक घिरे हुए क्षेत्र से शुरुआत करने की है. करीब 500 हेक्टेयर क्षेत्र को लगभग 9.8 किलोमीटर लंबी चेन-लिंक फेंसिंग से घेरा गया है. इसे भारत का पहला समर्पित चीता संरक्षण और प्रजनन केंद्र बनाया गया है. यहां आने के बाद चीते पहले क्वारंटीन में रहेंगे. फिर इसी बाड़े में नियंत्रित परिस्थितियों में उनका प्रजनन कराया जाएगा. अगर यह मॉडल सफल रहा तो बाद में इन्हें खुले इलाके में छोड़ा जाएगा. यह योजना 2032 तक 17,000 वर्ग किलोमीटर में 60-70 चीतों की ऐसी आबादी विकसित करने के राष्ट्रीय लक्ष्य का हिस्सा है, जो अलग-अलग क्षेत्रों में बसी हो लेकिन एक-दूसरे से जुड़ी रहे.

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 500 हेक्टेयर पर्याप्त है? प्रजनन केंद्र और प्राकृतिक आवास में बड़ा अंतर होता है. जंगली चीते आम तौर पर सैकड़ों वर्ग किलोमीटर में विचरण करते हैं. प्रोजेक्ट चीता के आलोचक पहले भी कहते रहे हैं कि भारत में चीतों के लिए उपयुक्त आवास और शिकार की भारी कमी है.

बन्नी में शिकार की उपलब्धता बढ़ाने के लिए गुजरात के भावनगर स्थित वेलावदर वन्यजीव अभयारण्य से 500 काले हिरण लाए जा रहे हैं. वहां करीब दो-तिहाई काले हिरण आरक्षित वन क्षेत्र के बाहर भी विचरण करते हैं. इसके अलावा बन्नी के घास के मैदान में नीलगाय, चिंकारा और जंगली सूअर जैसे शाकाहारी जीव पहले से मौजूद हैं.

पशुपालक समुदायों से घिरे घास के मैदान में किसी प्रमुख मांसाहारी प्रजाति का प्रजनन केंद्र स्थापित करना बेहद महत्वाकांक्षी परियोजना है. फिलहाल चीता खुले मैदान में नहीं बल्कि एक बाड़े में लौट रहा है. असली परीक्षा यह होगी कि क्या बन्नी उसे खुलकर दौड़ने के लिए वह जगह दे पाएगा जिसके लिए प्रकृति ने उसे बनाया है.

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