मकर संक्रांति की सुबह गोरखनाथ मंदिर परिसर में दिखा वह छोटा सा दृश्य पहली नजर में महज एक वायरल वीडियो लगता है, लेकिन उसके भीतर उत्तर प्रदेश की राजनीति और सत्ता की कार्यशैली का एक बड़ा संकेत छिपा है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का एक बच्चे से “और क्या चाहिए” पूछना और जवाब में “चिप्स” सुनकर ठहाका लगाना सिर्फ एक मासूम पल नहीं था.
यह उस सार्वजनिक छवि का हिस्सा है, जिसे योगी बीते कुछ वर्षों से लगातार गढ़ते आए हैं. योगी आदित्यनाथ की पहचान लंबे समय तक एक सख्त, अनुशासनप्रिय और निर्णायक प्रशासक की रही है. अपराधियों के खिलाफ कड़ा रुख, बुलडोजर कार्रवाई और प्रशासनिक सख्ती उनके राजनीतिक व्यक्तित्व का मुख्य आधार मानी जाती रही.
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में, खासकर दूसरे कार्यकाल के दौरान, उनके सार्वजनिक व्यवहार में एक दूसरा पहलू भी उभरकर सामने आया है. बच्चों से संवाद, उनकी समस्याओं पर त्वरित निर्णय और उनके भविष्य को लेकर संवेदनशील पहल ने मुख्यमंत्री की छवि को एक नए आयाम में ढाला है.
गोरखपुर का वायरल वीडियो इस बदलाव का प्रतीक है. मंदिर में पूजा के बाद जब मुख्यमंत्री अपने आवास पर श्रद्धालुओं से मिल रहे थे, तब एक छोटे बच्चे से उनका संवाद पूरे माहौल को हल्का कर देता है. बच्चे की मांग न तो कोई बड़ी योजना थी और न ही कोई शिकायत. वह सिर्फ “चिप्स” चाहता था. योगी आदित्यनाथ का उस पर हंस पड़ना, आसपास मौजूद लोगों का मुस्कुराना और पूरे परिसर में गूंजती हंसी, सत्ता और आमजन के बीच की दूरी को क्षण भर के लिए खत्म कर देती है. राजनीति में ऐसे क्षण बेहद दुर्लभ होते हैं, क्योंकि ये बिना किसी स्क्रिप्ट के, स्वतःस्फूर्त होते हैं.
लेकिन यह कोई अकेला मामला नहीं है. योगी आदित्यनाथ के बच्चों के प्रति स्नेह और संवेदनशीलता के कई उदाहरण हाल के वर्षों में सामने आए हैं. पहली जनवरी को एक मेजर की दिव्यांग और बीमार बेटी अंजना भट्ट का मामला इसका गंभीर और भावनात्मक उदाहरण है. मुख्यमंत्री से मुलाकात के 24 घंटे के भीतर न सिर्फ उनका मकान कब्जा मुक्त कराया गया, बल्कि आरोपियों के खिलाफ एफआईआर और गिरफ्तारी तक हुई. यह घटना प्रशासनिक तत्परता का उदाहरण तो है ही, साथ ही यह संदेश भी देती है कि मुख्यमंत्री बच्चों और कमजोर वर्गों के मामलों में किसी तरह की देरी या औपचारिकता बर्दाश्त नहीं करते.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बच्चों से जुड़ी ऐसी घटनाएं समाज के व्यापक वर्ग को भावनात्मक रूप से प्रभावित करती हैं. लखनऊ के प्रतिष्ठित अवध गर्ल्स कालेज की प्राचार्य बीना राय बताती हैं, “भारतीय समाज में बच्चा सिर्फ एक व्यक्ति नहीं होता, वह पूरे परिवार की भावनाओं का केंद्र होता है. जब कोई मुख्यमंत्री बच्चों के साथ संवेदनशील व्यवहार करता है, तो उसका प्रभाव सिर्फ बच्चे तक सीमित नहीं रहता. वह माता-पिता, परिवार और फिर पूरे समाज तक जाता है.”
26 नवंबर को कानपुर की मूक-बधिर युवती खुशी गुप्ता की कहानी इस बात को और गहराई से समझाती है. मुख्यमंत्री से मिलने की उसकी जिद, अकेले पैदल लखनऊ पहुंच जाना और फिर लोकभवन के बाहर रोते हुए बैठ जाना, एक साधारण प्रशासनिक घटना बन सकती थी. लेकिन जब योगी आदित्यनाथ को इसकी जानकारी मिली, तो उन्होंने इसे एक व्यक्तिगत जिम्मेदारी की तरह लिया.
खुशी को मुख्यमंत्री आवास बुलाया गया, उसके बनाए चित्रों को सम्मानपूर्वक स्वीकार किया गया और उसके भविष्य के लिए शिक्षा, इलाज और स्किल डेवलपमेंट के ठोस आश्वासन दिए गए. यहां मुख्यमंत्री सिर्फ एक शासक नहीं, बल्कि एक संरक्षक की भूमिका में नजर आते हैं. खुशी के माता-पिता के लिए यह अनुभव जीवन भर की पूंजी बन गया. सामाजिक कार्यकर्ता और बाल अधिकार विशेषज्ञ सपना उपाध्याय मानती हैं कि ऐसे उदाहरणों का असर दूरगामी होता है. उनके अनुसार, “जब सत्ता का सर्वोच्च प्रतिनिधि किसी दिव्यांग या कमजोर बच्चे को अपनत्व के साथ स्वीकार करता है, तो वह समाज को यह संदेश देता है कि संवेदना भी शासन का अहम हिस्सा है. इससे सरकार के प्रति भरोसा बढ़ता है, खासकर महिलाओं और गरीब परिवारों में.”
महिलाओं और बच्चों के बीच यह भरोसा राजनीति में बेहद अहम है. उत्तर प्रदेश जैसे बड़े और विविधतापूर्ण राज्य में महिला मतदाता और परिवार आधारित वोटिंग पैटर्न निर्णायक भूमिका निभाते हैं. बच्चों से जुड़ी किसी भी समस्या में मां सबसे पहले प्रभावित होती है. जब मुख्यमंत्री बच्चों की शिक्षा, सुरक्षा और भविष्य को लेकर संवेदनशील नजर आते हैं, तो महिलाओं के मन में उनके प्रति एक सकारात्मक छवि बनती है.
जनता दर्शन में बच्चों का स्कूल में एडमिशन कराना इसी रणनीति का हिस्सा दिखता है. कानपुर की नन्ही मायरा का मामला इसका उदाहरण है. “मैं बड़ी होकर डॉक्टर बनना चाहती हूं” कहने वाली बच्ची को तुरंत एडमिशन दिलाने के निर्देश देना, प्रशासनिक रूप से भले ही एक छोटा फैसला हो, लेकिन राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर इसका संदेश बड़ा है. यह दिखाता है कि सरकार बच्चों के सपनों को गंभीरता से लेती है. मुरादाबाद और अन्य जिलों में भी ऐसे ही मामलों में मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप से बच्चों का एडमिशन हुआ. इन घटनाओं के वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से फैलती हैं. राजनीतिक विश्लेषक इसे योगी सरकार की “सॉफ्ट पावर” रणनीति मानते हैं. गोरखपुर विश्वविद्यालय के शिक्षक महेंद्र सिंह कहते हैं, “योगी आदित्यनाथ को अक्सर एक कठोर प्रशासक के रूप में देखा जाता है. लेकिन बच्चों के साथ उनके ऐसे दृश्य उस छवि को संतुलित करते हैं. यह संतुलन राजनीति में बहुत जरूरी होता है, क्योंकि मतदाता सिर्फ सख्ती नहीं, संवेदना भी देखना चाहता है.”
योगी आदित्यनाथ का बाल प्रेम सिर्फ हिंदू समाज तक सीमित नहीं है. 8 जनवरी 2024 को गोरखपुर में मुस्लिम बच्चे का अन्नप्राशन कराना इस बात का प्रतीक है कि उनकी सार्वजनिक संवेदना धार्मिक सीमाओं से परे जाती है. एक मुस्लिम महिला के बच्चे को गोद में लेकर दुलारना और अन्नप्राशन कराना, उत्तर प्रदेश जैसे संवेदनशील राज्य में एक मजबूत सामाजिक संदेश देता है. यह संदेश कि मुख्यमंत्री के लिए बच्चा पहले है, धर्म बाद में. राजनीति के जानकार मानते हैं कि ऐसे दृश्य खासकर अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं के बीच सकारात्मक असर डालते हैं. राजनीतिक समाजशास्त्री डॉ. फरहत हाशमी के अनुसार, “जब कोई नेता सार्वजनिक मंच पर मुस्लिम बच्चे को उसी सहजता से अपनाता है, जैसे वह अन्य बच्चों को करता है, तो यह भरोसे की एक परत बनाता है. यह भरोसा धीरे-धीरे समुदाय की राजनीति को प्रभावित करता है.”
इन व्यक्तिगत और भावनात्मक घटनाओं के समानांतर योगी सरकार की नीतियां भी बच्चों के मुद्दे पर केंद्रित दिखती हैं. बाल श्रमिक विद्या योजना के तहत हजारों बच्चों को स्कूल से जोड़ना, बाल श्रम मुक्त उत्तर प्रदेश का लक्ष्य और बंधुआ मजदूरी के खिलाफ सख्त कदम, इन सबका राजनीतिक अर्थ सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं है. यह एक नैरेटिव बनाता है कि सरकार बच्चों के भविष्य को लेकर गंभीर है. वित्तीय वर्ष 2017-18 से 2024-25 तक 12,426 बाल श्रमिकों को शिक्षा से जोड़ना और उनके परिवारों को आर्थिक सहायता देना, इस नैरेटिव को मजबूत करता है. यह संदेश देता है कि सरकार सिर्फ दुलार और भावनात्मक क्षणों तक सीमित नहीं है, बल्कि संरचनात्मक बदलाव पर भी काम कर रही है. राजनीतिक रणनीतिकार मानते हैं कि जब भावनात्मक अपील और ठोस नीतियां साथ चलती हैं, तो उनका असर ज्यादा गहरा होता है.
योगी आदित्यनाथ की यह रणनीति खासकर युवा माताओं और पहली बार वोट देने वाली महिलाओं में असर डालती है. बच्चे की शिक्षा, सुरक्षा और स्वास्थ्य हर परिवार की प्राथमिक चिंता होती है. जब मुख्यमंत्री इन मुद्दों पर संवेदनशील और सक्रिय दिखते हैं, तो यह स्वाभाविक रूप से महिलाओं के बीच उनकी स्वीकार्यता बढ़ाता है. हालांकि आलोचक इसे राजनीतिक छवि निर्माण का हिस्सा भी मानते हैं. उनका कहना है कि वायरल वीडियो और भावनात्मक कहानियां सत्ता के कठोर फैसलों से ध्यान हटाने का माध्यम भी हो सकती हैं. लेकिन समर्थक तर्क देते हैं कि राजनीति में छवि और व्यवहार दोनों महत्वपूर्ण होते हैं, और अगर इससे किसी बच्चे या परिवार का जीवन बेहतर होता है, तो इसे नकारात्मक नहीं कहा जा सकता.
कुल मिलाकर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बच्चों से कनेक्ट एक बहुस्तरीय राजनीतिक रणनीति के रूप में उभर रहा है. यह रणनीति सख्त प्रशासन की छवि को मानवीय स्पर्श से संतुलित करती है, महिलाओं और परिवारों के बीच भरोसा बनाती है और समाज के कमजोर वर्गों तक सरकार की पहुंच को दर्शाती है. गोरखनाथ मंदिर में “चिप्स” मांगने वाले बच्चे की मासूम फरमाइश से लेकर खुशी गुप्ता के भविष्य की चिंता तक, ये सभी घटनाएं मिलकर एक कहानी रचती हैं. यह कहानी सिर्फ भावनाओं की नहीं, बल्कि सत्ता और समाज के रिश्ते की है. एक ऐसा रिश्ता, जहां मुख्यमंत्री का कठोर चेहरा भी है और स्नेहिल मुस्कान भी. राजनीति में शायद यही संतुलन योगी आदित्यनाथ को भीड़ से अलग करता है और उन्हें बच्चों, महिलाओं और व्यापक मतदाता वर्ग के बीच एक अलग पहचान देता है.

