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अब दुधारू पशु क्यों नहीं दिखते एशिया के सबसे बड़े पशु मेले में?

बिहार के सोनपुर मेले की पहचान युद्ध और खेती में इस्तेमाल होने वाले पशुओं के सबसे बड़े मेले के तौर पर थी, लेकिन आज मेले में इन पशुओं की संख्या दहाई में भी नहीं होती

इस बार सोनपुर मेले के गाय बाजार में बिकने के लिए बची इकलौती गाय (फोटो : पुष्यमित्र)
अपडेटेड 29 नवंबर , 2025

सोनपुर मेला के बीचों-बीच एक जगह गाय बाजार का बोर्ड लगा है. इस साल सोनपुर मेला आने वाले सैलानियों की खास निगहबानी इस बाजार की तरफ है, क्योंकि यहां रोहतास से आए एक पशुपालक ब्रहमदेव सिंह कुशवाहा अपने साथ एक मोटा-ताजा भैसा लेकर आए हैं और उन्होंने इसकी कीमत एक करोड़ लगाई है. यह भैंसा बिक तो नहीं रहा है, मगर इस भारी-भरकम कीमत की वजह से उनके स्टॉल के सामने उसे देखने और वीडियो बनाने वालों की खूब भीड़ उमड़ रही है. 

हैरत की बात है कि यह भैंसा जिसका नाम ब्रह्मदेव सिंह ने प्रधान बाबू रखा है, इस मेले में बिकने आया इकलौता भैंसा है और 27 नवंबर, 2025 को जब हम उस मेले में पहुंचे उस भैंसे के ठीक पड़ोस में एक ही गाय बंधी नजर आई, वह भी बाजार की इकलौती गाय थी. अभी मेला खत्म होने में लगभग दो हफ्ते बाकी हैं.

जो लोग सोनपुर मेले के इतिहास को जानते हैं, उनके लिए यह परेशान करने वाला दृश्य हो सकता है क्योंकि सोनपुर मेले के साथ जो पहचान जुड़ी है, वह एशिया के सबसे बड़े पशु मेले की है. मगर उस पशु मेले में अब दुधारू पशु न के बराबर नजर आते हैं. यहां घोड़े दिख जाते हैं, बकरियां नजर आ जाती हैं, कुत्ते और चिड़िया भी बड़ी संख्या में बिक रहे होते हैं. मगर डेयरी उद्योग से जुड़े ये जानवर नहीं के बराबर दिखते हैं.

अपनी इकलौती गाय के साथ स्टॉल लगाकर बैठे रमाकांत राय उदासी भरे स्वर में कहते हैं, “कभी यहां दूर-दूर से गायें आती थीं. हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, गोरखपुर. गाय बाजार गायों से भरा रहता था, हम यहां बीस-बीस हजार गायों को देखे हैं. पुराने लोग बताते हैं कि पहले 50 हजार तक गायें आती थीं. मगर अब मेले में 20-25 गाय आ गईं तो बहुत.”

ऐसा नहीं है कि यहां गायें बिकती नहीं. खुद रमाकांत राय की नौ गायें इस बार के मेले में बिक गई हैं. यह इकलौती गाय बची है. मगर उनकी उदासी की वजह दूसरी है. वे कहते हैं, “कीमत सही नहीं मिलती, क्योंकि अब यहां गाय खरीदने वाले आते ही नहीं. जो आते हैं, वे मोलभाव में लग जाते हैं.”

मेले में बिकने आया यह इकलौता भैंसा, इसके मालिक ने इसकी कीमत एक करोड़ रखी है. यह मेले की सुर्खियां बटोर रहा है.

रमाकांत राय सोनपुर के ही रहने वाले हैं. जब हम उऩसे पूछते हैं कि अब दूर-दराज से गाय खरीदने-बेचने वाले क्यों नहीं आते तो वे कहते हैं, “गाय लेकर सफर करना अब आसान कहां रहा? आप गाय लेकर चलिये तो रास्ते में दस आदमी घेर कर पूछेगा, बांग्लादेश ले जा रहे हो, काटने ले जा रहे हो? हुज्जत करेगा. इस हुज्जतबाजी से बचाने वाला कोई नहीं है. ऐसे में लोग क्यों खतरा लें.” साथ में बैठे उनके ही पड़ोस के रहने वाले बुजर्ग जगन राय कहते हैं, “यह सब आज से थोड़े ही हो रहा है, 15-20 साल से हो रहा है. जब से नीतीश जी की सरकार बनी यहां हल्ला होने लगा कि यहां से गाय ले जाके सब बांग्लादेश में बेच आता है. तभी से यहां गाय-भैंस आना बंद होने लगा.”

ये बातें काफी हद तक सच्चाई के करीब लगती हैं. आंकड़े गवाह हैं कि नीतीश कुमार के कार्यकाल के दौर से ही सोनपुर मेले में दुधारू पशुओं की बिक्री में गिरावट दर्ज की गई. इस मेले में 2012 में 107 और 2013 में 94 गायें बिकी थी. उसके बाद यह बिक्री लगातार घटती चली गई. कभी तीन अंकों में नहीं पहुंच पाई. 

2019 में सोनपुर मेले का उद्घाटन करते हुए तत्कालीन उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने कहा था, “मेले में पशुओं की खरीद-बिक्री पर रोक नहीं है. लेकिन कुछ कानून हैं,  उनका उल्लंघन करने वाले जेल जाएंगे. पहले यहां से ट्रेन में भैंस, गाय भर-भर कर कटने के लिए असम भेजी जाती थीं. गाय काटने के लिए खरीद-बिक्री की इजाजत नहीं दी जाएगी. पशुपालक खरीद-बिक्री करते हैं, तो कोई रोक नहीं है.”

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान भी सुशील मोदी ने भी इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था. इससे पहले जब वे सरकार में डिप्टी सीएम थे तो उन्होंने बिहार से पशुओं के निर्यात पर रोक लगा दी थी. मगर इसके उलट 2015 में मेले के दौरान पूजा करने सोनपुर पहुंचे RJD सुप्रीमो लालू प्रसाद ने कहा था, “भाजपा नेताओं के हंगामे की वजह से सोनपुर मेले में पंजाब और हरियाणा से पशुओं की आवक बंद हो गई है. उनकी सरकार मेले के गौरव को लौटाने के लिए कानून में बदलाव करेगी.”

दरअसल, सोनपुर मेले में कथित पशु तस्करी के मामले को लेकर पहले भी कई कदम उठाए गए हैं. अटल बिहारी बाजपेयी सरकार के दौरान तात्कालिक पर्यावरण मंत्री मेनका गांधी के दखल देने पर रेलगाड़ियों में दुधारू पशुओं के आवागमन पर रोक लगा दी गई थी, जिसे बाद में तब हटा लिया गया जब यूपीए-1 की सरकार में लालू प्रसाद रेलमंत्री थे.

ये उदाहरण बताते हैं कि इस मेले में दुधारू पशु आएं या न आएं, यह सवाल एक जमाने में राजनीतिक रूप ले चुका था. उसके बाद से यहां दुधारू पशु आने बंद हो गए.

हालांकि सरकारी महकमा अब इन बातों से इनकार करता है. वह मेले में दुधारू पशुओं की आवक में कमी की दूसरी ही वजह बताता है. सोनपुर मेला का प्रबंधन सारण जिला प्रशासन देखता है. सारण के डीएम अमन समीर कहते हैं, “यह सच है कि सोनपुर मेले में पहले हरियाणा और पंजाब से बड़ी संख्या में अच्छी नस्ल की गायें आती थीं. पिछले कुछ वर्षों में उनकी आवक कम हो गई. 2023 और 2024 में हमारी टीम ने वहां के पशुपालकों से संपर्क किया था. मगर उनका कहना था कि डेयरी उद्योग के विकास के साथ अब उनकी गायें स्थानीय लोग ही खरीद लेते हैं, उन्हें इतनी दूरी तय करके बिहार आने की जरूरत नहीं होती. वैसे भी आने-जाने में अच्छे पैसे खर्च हो जाते हैं. हम कोशिश कर रहे हैं कि वे फिर भी आएं. अगर उन्हें किसी और तरह की परेशानी हो तो हम उसे दूर करने के लिए तैयार हैं.”

यह पूछने पर कि क्या ये पशुपालक गौरक्षकों के 'आतंक' या बांग्लादेश भेजे जाने को लेकर यहां हो रहे विरोध के कारण नहीं आते? वे कहते हैं, “ऐसा नहीं है. ऐसा होता तो सारण के रउजा में पशुओं की बिक्री कैसे होती.” वहां आज भी हजारों की संख्या में गायों की खरीद बिक्री होती है.

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