बस पेपर दीजिए, नंबर चाहे जितने आएं, पास कराने की पूरी गारंटी है... राजस्थान में भर्ती परीक्षाओं को मजाक बना देने वाला यह जुमला हकीकत बन चुका है. राजस्थान पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) ने राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड की परीक्षाओं की OMR शीट में नंबर बढ़ाकर फेल अभ्यर्थियों को पास कराने वाले एक गिरोह का पर्दाफाश किया है.
गिरोह के कारनामों की एक बानगी देखिए कि कृषि पर्यवेक्षक भर्ती परीक्षा में जिस अभ्यर्थी के माइनस 6 नंबर आए, माफिया ने OMR शीट में उसके 6 नंबर को बढ़ाकर 259 नंबर कर दिया. प्रयोगशाला सहायक भर्ती परीक्षा में दो नंबर लाने वाले अभ्यर्थी की OMR शीट में 206 नंबर कर दिए गए और 9 नंबर लाने वाले को 259 नंबर मिल गए. सुपरवाइजर (महिला अधिकारिता) भर्ती परीक्षा में 63 अंक हासिल करने वाली पूनम माथुर के नंबर बढ़ाकर 182 कर दिए गए.
भर्ती परीक्षाओं में धांधली के ये कोई दो या तीन मामले नहीं हैं बल्कि सैकड़ों लोगों की OMR शीट में नंबर बढ़ाने का खुलासा हुआ है. SOG ने 36 ऐसे लोगों की सूची जारी की है जिनके वास्तविक अंक माइनस 6 से लेकर 15-20 के बीच में थे और गिरोह ने पैसे लेकर उनके अंक 200-250 के पार कर दिए. फिलहाल तीन परीक्षाओं में धांधली का खुलासा हुआ है. SOG की जांच में ओर भी खुलासे होने की उम्मीद है. SOG के एडीजी विशाल बंसल का कहना है, ''पैसे लेकर OMR शीट में नंबर बढ़ाने के इस खेल में दिल्ली की कंपनी के साथ राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड के कर्मचारी भी मिले हुए थे. तीन परीक्षाओं की OMR शीट में धांधली का खुलासा हो चुका है.''
OMR शीट में फेरबदल का यह खुलासा सुपरवाइजर (महिला अधिकारिता) भर्ती 2018, प्रयोगशाला सहायक भर्ती 2018 और कृषि पर्यवेक्षक भर्ती 2018 से जुड़ा है. इन भर्ती परीक्षाओं में कुल 9 लाख 40 हजार 38 अभ्यर्थियों ने आवेदन किया था जिनमें से 3212 अभ्यर्थियों का चयन हुआ. इन परीक्षाओं का परिणाम तैयार करने, OMR शीट की स्कैनिंग और डेटा प्रोसेसिंग के गोपनीय कार्य के लिए दिल्ली की फर्म राघव लिमिटेड को आउटसोर्स के जरिए काम सौंपा गया था. जांच में यह खुलासा हुआ है कि इस फर्म के कर्मचारियों ने OMR शीट स्कैनिंग के बाद कंप्यूटर में वास्तविक डेटा के साथ छेड़छाड़ कर अभ्यर्थियों के नंबर बढ़ा दिए. इसके कारण अयोग्य अभ्यर्थियों का चयन हो गया और योग्य अभ्यर्थी मेहनत करने के बाद भी बाहर हो गए.
कुछ अभ्यर्थियों की आपत्ति के बाद कर्मचारी चयन बोर्ड की ओर से मूल OMR शीट की फिर से स्कैनिंग कराई गई तब यह मामला सामने आया था. इसके बाद बोर्ड की तरफ से इस मामले की जांच के लिए एक प्रशासनिक कमेटी भी गठित की गई. कुछ समय बाद ही SOG ने मामला दर्ज कर इस प्रकरण की जांच की. जांच में यह सामने आया कि राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड के संजय माथुर के पास OMR शीट्स स्कैनिंग व परीक्षा परिणाम तैयार करने की जिम्मेदारी थी और वह खुद इस फर्जीवाड़े में शामिल था. संजय माथुर सिस्टम एनालिस्ट-कम प्रोगामर (उपनिदेशक) और तकनीकी प्रमुख के पद पर कार्यरत था.
उसके अलावा कर्मचारी चयन बोर्ड का प्रोग्रामर प्रवीण गंगवाल भी इस मामले में लिप्त पाया गया है. माथुर और गंगवाल ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए स्कैनिंग टीम और आउटसोर्स फर्म राघव लिमिटेड के कर्मचारियों के साथ मिलकर कई अभ्यर्थियों को फेल से पास कर दिया. माथुर और गंगवाल बोर्ड के उसी कमरे में बैठते थे जहां OMR शीट स्कैन होती थी.
OMR शीट घोटाले के मुख्य सूत्रधार संजय माथुर और प्रवीण गंगवाल राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड की ओर से सुपरवाइजर (महिला अधिकारिता), प्रयोगशाला सहायक और कृषि पर्यवेक्षक भर्ती की जांच के लिए बनाई गई प्रशासनिक समिति में सदस्य के तौर पर शामिल थे. माथुर और गंगवाल ने सबूत मिटाने और जांच को प्रभावित करने की भरपूर कोशिश की मगर SOG के उप महानिरीक्षक परीस देशमुख ने उनके इरादे भांप लिए. इसके बाद SOG ने माथुर और गंगवाल पर कड़ी नजर रखना शुरू किया. SOG टीम ने कड़ी से कड़ी जोड़ी तो माथुर और गंगवाल की मिलीभगत सामने आ गई. SOG सूत्रों का कहना है कि OMR सीट में नंबर बढ़ाने के लिए एक-एक अभ्यर्थी से 10-15 लाख रुपए की राशि ली गई.
आउटसोर्स फर्म राघव लिमिटेड के मामले का सबसे पहले खुलासा उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स ने किया था. इस फर्म का पूरा काम उत्तर प्रदेश से संचालित होता है. राजस्थान में भर्ती परीक्षाओं के दौरान अभ्यर्थियों से पैसा इकट्ठा कर फर्म के दो कर्मचारी शादाब और विनोज जब लखनऊ जा रहे थे तो उत्तर प्रदेश STF ने उन्हें पकड़ लिया था. इनके पास से 60 लाख रुपए और कुछ अभ्यर्थियों के नामों की पर्चियां मिली. उत्तर प्रदेश के गोमती नगर थाने में प्रकरण दर्ज कर नकदी और अभ्यर्थियों के नाम के दस्तावेज जब्त कर लिए गए. उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से भी अपने स्तर पर इस मामले की जांच की जा रही है.
फेल अभ्यर्थियों को पास करने का यह सिर्फ़ परीक्षा घोटाला नहीं बल्कि ईमानदार युवाओं के भविष्य पर डाका और सिस्टम के भीतर जमी सड़ांध का खौफनाक सबूत है. अगर जांच सिर्फ़ कुछ गिरफ़्तारियों तक सिमट गई और पुरानी भर्तियों की परतें नहीं खोली गई तो यह कार्रवाई भी महज़ दिखावा साबित होगी और हर अगली परीक्षा में मेहनत नहीं, सौदेबाज़ी ही पास होती रहेगी.

