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फर्जी डॉक्यूमेंट्स के जरिए सरकारी नौकरी! जांच के दायरे में कैसे आए यूपी के हजारों शि‍क्षक?

हाई कोर्ट के आदेश के बाद यूपी में बेसिक शिक्षा विभाग और सरकार के आदेश से समाज कल्याण विभाग के स्कूलों में शिक्षक नियुक्तियों पर सवाल गहरे हुए हैं

सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 3 फ़रवरी , 2026

देवरिया के सलेमपुर ब्लॉक का उच्चतर प्राथमिक विद्यालय, बर्दीहा दलपत. जुलाई 2010 की एक सुबह यहां एक नई सहायक अध्यापिका ने कार्यभार संभाला था. नाम था गरिमा सिंह. कागज़ पूरे थे, नियुक्ति पत्र वैध दिखता था और स्कूल के रजिस्टर में एक और नाम जुड़ गया. अगले पंद्रह साल तक उन्होंने बच्चों को पढ़ाया, वेतन लिया और सरकारी सेवा के तमाम लाभ भी मिले. लेकिन अगस्त 2025 में एक आदेश आया जिसने इस पूरी कहानी को पलट दिया. 

बेसिक शिक्षा अधिकारी ने उनकी नियुक्ति यह कहते हुए रद्द कर दी कि नौकरी पाने के लिए जिन शैक्षिक प्रमाण पत्रों और डोमिसाइल सर्टिफिकेट का इस्तेमाल किया गया, वे जाली थे. गरिमा सिंह हाई कोर्ट पहुंचीं, लेकिन वहां से जो आदेश आया, उसने सिर्फ उनकी याचिका ही नहीं खारिज की, बल्कि उत्तर प्रदेश में शिक्षकों की नियुक्तियों पर गहराते संदेह को भी केंद्र में ला दिया.

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले में जो टिप्पणी की, वह किसी एक शिक्षक या जिले तक सीमित नहीं है. न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने साफ कहा कि अदालत ने बार-बार एक परेशान करने वाला पैटर्न देखा है. बड़ी संख्या में सहायक शिक्षक जाली और फर्जी प्रमाण पत्र, नकली दस्तावेज़ या महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाकर नौकरी हासिल करते हैं. फिर सालों तक सेवा में बने रहते हैं. कई मामलों में संस्थान प्रबंधन की खुली मिलीभगत होती है और कई बार संबंधित बेसिक शिक्षा अधिकारी की सक्रिय भूमिका या मौन सहमति भी. 

हाई कोर्ट का आदेश इस पूरे विवाद का अहम मोड़ है. अदालत ने बेसिक शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिया है कि पूरे प्रदेश में सहायक शिक्षकों की नियुक्तियों की छह महीने के भीतर व्यापक और समयबद्ध जांच कराई जाए. जिन लोगों ने धोखाधड़ी करके नौकरी हासिल की है, उन्हें कानून के अनुसार हटाया जाए. जहां संभव हो, वहां वेतन की रिकवरी भी शुरू की जाए. इसके साथ ही, जिन अधिकारियों की भूमिका ऐसी नियुक्तियों में संदिग्ध पाई जाए, उनके खिलाफ कड़ी अनुशासनात्मक और दंडात्मक कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए हैं. 


गरिमा सिंह के मामले के तथ्य इस व्यापक समस्या की एक झलक देते हैं. याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट में दलील दी गई कि उनके सभी दस्तावेजों की जांच नियुक्ति के समय हो चुकी थी और वे लगभग 15 वर्षों तक सेवा दे चुकी हैं. दूसरी ओर, बेसिक शिक्षा अधिकारी ने बताया कि सक्षम प्राधिकारी और विशेष टास्क फोर्स द्वारा कराई गई जांच में नियुक्ति के समय प्रस्तुत किए गए सभी दस्तावेज जाली पाए गए. यहां तक कहा गया कि गरिमा सिंह नाम की किसी अन्य उम्मीदवार के शैक्षिक दस्तावेजों और डोमिसाइल सर्टिफिकेट का इस्तेमाल कर नियुक्ति हासिल की गई. याचिकाकर्ता को जुलाई 2025 में नोटिस दिया गया था, लेकिन न तो उसका जवाब दिया गया और न ही कोई ऐसा दस्तावेज पेश किया गया जिससे प्रमाण पत्रों की वास्तविकता साबित हो सके.

यह मामला अकेला नहीं है. यूपी में पिछले कुछ वर्षों में शिक्षक भर्ती से जुड़े कई मामलों ने प्रशासनिक तंत्र की कमजोरी और मिलीभगत की ओर इशारा किया है. कभी TET और भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी की बात सामने आती है, तो कभी दस्तावेज़ों के सत्यापन में भारी लापरवाही उजागर होती है. हाई कोर्ट ने अपने आदेश में इसी पृष्ठभूमि का ज़िक्र करते हुए कहा कि राज्य सरकार समय-समय पर सर्कुलर और निर्देश जारी करती रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका प्रभाव नहीं दिखता. 

संदेह का दायरा तब और बड़ा हो जाता है, जब समाज कल्याण विभाग के अनुदानित विद्यालयों की स्थिति पर नजर डाली जाती है. इन स्कूलों की स्थापना गरीब परिवारों के बच्चों को फ्री प्राथमिक शिक्षा देने के उद्देश्य से की गई थी. निजी प्रबंध तंत्र के तहत चलने वाले इन विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति शासन के अनुमोदन के बाद होनी चाहिए. लेकिन जांच में सामने आया कि कई जगह न तो विद्यालयों की मान्यता सही है और न ही शिक्षकों की नियुक्तियों को विधिवत स्वीकृति मिली है. 

बलिया, मऊ, आजमगढ़ और गाजीपुर जैसे जिलों में अनुदानित विद्यालयों में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियां पकड़ी गईं. बिना मान्यता के स्कूल चलाए जा रहे थे और शिक्षकों की नियुक्तियों में नियमों की अनदेखी हुई. इन मामलों की जांच भले ही चल रही हो, लेकिन इससे पूरे प्रदेश में इस व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं. अब शासन ने प्रयागराज मंडल के प्रयागराज, प्रतापगढ़, कौशांबी और फतेहपुर समेत सभी जिलों के अनुदानित विद्यालयों की जांच कराने का फैसला किया है. समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव एल. वेंकटेश्वर लू ने इस संबंध में बेसिक शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव को पत्र लिखा है. जांच में स्कूलों की मान्यता, नियमों और शर्तों के अनुपालन के साथ-साथ मौजूदा शिक्षकों की नियुक्तियों की भी पड़ताल होगी. यह जिम्मेदारी बेसिक शिक्षा अधिकारियों को दी गई है. 

प्रयागराज मंडल की स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है. यहां समाज कल्याण विभाग के 32 विद्यालय संचालित हैं. इनमें से 26 अकेले प्रयागराज जिले में हैं. प्रतापगढ़ में चार और कौशांबी व फतेहपुर में एक-एक विद्यालय है. इन 32 स्कूलों में 2197 छात्र-छात्राएं पंजीकृत हैं, जिन्हें पढ़ाने के लिए 69 शिक्षक नियुक्त हैं. अब ये सभी विद्यालय और शिक्षक जांच के दायरे में आ गए हैं. समाज कल्याण विभाग के उपनिदेशक सुधीर कुमार के मुताबिक, कई जनपदों में शिक्षकों की नियुक्ति समेत अन्य गड़बड़ियां सामने आने के बाद यह फैसला लिया गया है कि सभी जिलों के अनुदानित विद्यालयों की जांच कराई जाए. यह फैसला अचानक नहीं आया है. वर्षों से इन स्कूलों को लेकर शिकायतें मिलती रही हैं.

वर्ष 2019 में मुंगराबादशाहपुर की विधायक सुषमा पटेल ने विधानसभा में यह मुद्दा उठाया था. इसके बाद आजमगढ़, मऊ, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी और लखनऊ में विभाग के विद्यालयों की जांच हुई. जांच के दौरान गाजीपुर में 13, आजमगढ़ में 42 और मऊ में 40 शिक्षकों की नियुक्तियों में गड़बड़ी पाई गई. कहीं नियुक्तियां बिना शासन अनुमोदन के हुई थीं, तो कहीं नियुक्ति पत्र ही बेसिक शिक्षा विभाग से जारी नहीं हुए थे. 2024 में बलिया का मामला इस पूरे तंत्र की पोल खोलने वाला साबित हुआ. महामना मालवीय अनुसूचित जाति प्राथमिक पाठशाला, जकरिया, रसड़ा के शिक्षकों ने वेतन और अन्य देयकों को लेकर हाई कोर्ट में याचिका दायर की. उन्होंने दावा किया कि उनके विद्यालय को शिक्षा अधिनियम 1772 के तहत मान्यता मिली है. जांच में पता चला कि शिक्षा अधिनियम तो 1972 में अस्तित्व में आया था. गहराई से जांच करने पर सामने आया कि न तो विद्यालय मान्यता प्राप्त था और न ही शिक्षकों की नियुक्तियों का कोई अनुमोदन था. 

इन सभी मामलों का साझा सूत्र है कमजोर निगरानी और जवाबदेही की कमी. शिक्षक भर्ती और नियुक्ति जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में दस्तावेज़ सत्यापन सबसे अहम कड़ी होती है. लेकिन बार-बार यह सवाल उठता है कि अगर प्रमाण पत्र जाली थे, तो वे शुरुआती जांच में कैसे पास हो गए. क्या यह महज लापरवाही है या फिर जानबूझकर आंख मूंद ली गई. इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने आदेश में इसी बिंदु पर सबसे कड़ी टिप्पणी की है. अदालत ने कहा कि अधिकारियों की निष्क्रियता धोखाधड़ी को बढ़ावा देती है. इससे शिक्षा प्रणाली की साख कमजोर होती है और सबसे ज्यादा नुकसान उन बच्चों का होता है, जिनके भविष्य की जिम्मेदारी इन स्कूलों पर है. 

इलाहाबाद हाइकोर्ट के वरिष्ठ वकील पवन कुमार बताते हैं, “इस आदेश का असर आने वाले महीनों में साफ दिख सकता है. एक ओर जहां हजारों शिक्षकों की नियुक्तियां जांच के दायरे में आ सकती हैं, वहीं दूसरी ओर उन अधिकारियों पर भी तलवार लटक सकती है, जिन्होंने या तो नियमों की अनदेखी की या फिर सक्रिय रूप से गड़बड़ियों में हिस्सा लिया. वेतन रिकवरी और नियुक्ति रद्द होने जैसी कार्रवाइयों से कई पुराने मामले फिर से खुल सकते हैं.” हालांकि, इस पूरी प्रक्रिया में यह चुनौती भी होगी कि ईमानदार और योग्य शिक्षकों को बेवजह परेशान न किया जाए. कोर्ट ने अपने आदेश में कानून के अनुसार कार्रवाई की बात कही है. इसका मतलब यह है कि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि सही और गलत के बीच स्पष्ट फर्क किया जा सके.

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