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गोवा में शिंदे सेना की एंट्री से BJP को किस बात का डर?

एकनाथ शिंदे की शिवसेना गोवा में 40 में से 30 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है

एकनाथ शिंदे की पार्टी गोवा के सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है
एकनाथ शिंदे की पार्टी गोवा के सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है
अपडेटेड 29 जून , 2026

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना पड़ोसी राज्य गोवा में आगामी विधानसभा चुनाव लड़कर अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराना चाहती है.पार्टी 40 में से 30 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है ताकि महाराष्ट्र के बाहर पहली बार राजनीतिक आधार बना सके.

गोवा विधानसभा चुनाव अगले साल की शुरुआत में हैं लेकिन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि चुनाव 2026 के आखिर में भी कराए जा सकते हैं. गोवा में शिंदे की एंट्री उनकी सहयोगी BJP के सामने ही चुनौती खड़ी करेगी क्योंकि राज्य में BJP की सरकार है.

शिवसेना ने गोवा में चुनावी अभियान की जिम्मेदारी पूर्व लोकसभा सांसद गजानन कीर्तिकर और मुंबई के पूर्व पार्षद दिलीप नाइक व राजू पेडणेकर को दी है.पेडणेकर उत्तर गोवा और नाइक दक्षिण गोवा में पार्टी का काम देख रहे हैं. पार्टी का फोकस 'स्थानीय लोगों के अधिकार' के मुद्दे के साथ-साथ हिंदू और मराठी समर्थक मतदाताओं को आकर्षित करने पर रहेगा.

महाराष्ट्र के बाहर किसी राज्य के विधानसभा चुनाव में शिवसेना उम्मीदवार को सिर्फ एक बार जीत मिली है. 1991 में राम मंदिर आंदोलन के चरम पर पवन कुमार पांडे ने उत्तर प्रदेश की अकबरपुर सीट से जीत दर्ज की थी. इसके अलावा अविभाजित शिवसेना महाराष्ट्र तक ही सीमित रही.

इसकी एक वजह यह रही कि पार्टी नेतृत्व महाराष्ट्र में अपनी मराठी मानुष की राजनीति और 1980 के दशक में हिंदुत्व की ओर हुए झुकाव के बीच संतुलन नहीं बना सका. इसी दौर में पार्टी प्रमुख बाल ठाकरे हिंदुत्व के बड़े चेहरे के रूप में उभरे थे. 2022 के गोवा विधानसभा चुनाव में अविभाजित शिवसेना ने अविभाजित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के साथ गठबंधन कर 10 उम्मीदवार उतारे थे. NCP ने 13 सीटों पर चुनाव लड़ा था. शिवसेना को कुल वोटों का सिर्फ 0.18 फीसद यानी 1,726 वोट मिले थे.

महाराष्ट्र और गोवा के बीच ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध काफी मजबूत हैं. गोवा के मराठी भाषी हिंदू मुंबई और अन्य जगहों पर शिवसेना के समर्थक रहे हैं. शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के नेता जैसे मुंबई दक्षिण मध्य से लोकसभा सांसद अनिल देसाई, विधायक संजय पोटनीस और पूर्व विधायक प्रकाश फातारपेकर मूल रूप से गोवा से हैं. वहीं, शिंदे गुट में दिलीप नाइक और राजू पेडणेकर की जड़ें भी गोवा से जुड़ी हैं.

दिलीप नाइक कहते हैं, "हम गोवा की 30 विधानसभा सीटों पर ध्यान केंद्रित करेंगे." उन्होंने बताया कि पार्टी ने गोवा में कार्यालय खोला है और एम्बुलेंस उपलब्ध कराने तथा छतरियां बांटने जैसे काम शुरू किए हैं.

इसके अलावा पहली बार 16 जून को गोवा के पोरवोरिम में शिवसेना का 60वां स्थापना दिवस मनाया गया. नाइक ने कहा, "पहले हम गोवा में चुनाव से ठीक पहले सक्रिय होते थे. इस बार हमने कई महीने पहले ही काम शुरू कर दिया है."

गजानन कीर्तिकर के मुताबिक, पार्टी जल्द ही बूथ स्तर तक अपना संगठन तैयार कर लेगी और तीन-चार महीने में उम्मीदवार भी तय कर लिए जाएंगे. उन्होंने कहा, "गोवा के लोगों की जरूरतें, स्थानीय लोगों को न्याय, स्थानीय लोगों के साथ हो रहा अपमान और उत्तर भारत से हो रहे लोगों के आक्रमण (आवागमन) को रोका जाना चाहिए." उन्होंने कहा कि पार्टी गोवा में नौकरियों में स्थानीय लोगों को प्राथमिकता दिलाना चाहती है. उन्होंने मुख्यमंत्री डॉ. प्रमोद सावंत के नेतृत्व वाली BJP सरकार पर मनमानी करने का आरोप भी लगाया.

शिवसेना, BJP के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) का हिस्सा होने के बावजूद गोवा में अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है. पार्टी के एक नेता ने कहा कि नेतृत्व उन मजबूत उम्मीदवारों या मुख्यधारा की पार्टियों के नेताओं पर दांव लगा रहा है जो नया राजनीतिक मंच तलाश रहे हैं. उन्होंने कहा, "अगर पिछली बार तृणमूल कांग्रेस (TMC) गोवा में उम्मीदवार उतार सकती है तो शिवसेना क्यों नहीं?"

2022 के चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP), रिवोल्यूशनरी गोअन्स पार्टी (RGP) और TMC जैसे दलों की मौजूदगी से सत्ता विरोधी वोट बंट गए थे जिसका फायदा BJP को मिला. TMC ने पूर्व मुख्यमंत्री चर्चिल अलेमाओ और लुइजिन्हो फलेरो जैसे बड़े नेताओं को अपने साथ जोड़ा था लेकिन चुनाव में उसे एक भी सीट नहीं मिली.

सैंक्वेलिम सीट पर मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत ने कांग्रेस के धर्मेश सगलानी को सिर्फ 666 वोटों से हराया था. इस मुकाबले में RGP के सुजय गाउंस को 742 वोट मिले थे. शिवसेना नेताओं का मानना है कि BJP गोवा में उनकी पार्टी को बढ़ने नहीं देना चाहेगी क्योंकि इससे BJP के वोट प्रभावित होंगे. महाराष्ट्र समर्थक और मराठी समर्थक पार्टी होने के कारण शिवसेना की मौजूदगी गोवा में भाषाई विभाजन को भी तेज कर सकती है.

1967 में गोवा की जनता ने महाराष्ट्र में विलय के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. यह प्रस्ताव तत्कालीन मुख्यमंत्री दयानंद बांदोडकर की महाराष्ट्रीयवादी गोमांतक पार्टी (MGP) ने रखा था. MGP भारत की पहली ऐसी पार्टी थी जो बहुजन समाज के मुद्दे पर सत्ता में आई थी. उसने गोवा के महाराष्ट्र में विलय के लिए जनमत संग्रह की मांग की थी लेकिन जनता ने गोवा को अलग राज्य बनाए रखने के पक्ष में मतदान किया.

MGP का मराठी समर्थक रुख इस आशंका पर आधारित था कि सारस्वत और ब्राह्मण समुदाय, चाहे वे हिंदू हों या कैथोलिक, बहुजन समाज पर हावी हो जाएंगे. यहां एक ओर जहां हिंदू बहुजन समाज का एक वर्ग मराठी का समर्थक था वहीं कैथोलिक समुदाय कोंकणी के पक्ष में था. शिवसेना के एक नेता बताते हैं, "आधिकारिक भाषा कानून बनने के बाद से मराठी और रोमी कोंकणी के समर्थन में दो समानांतर आंदोलन चलते रहे हैं."

गोवा में मराठी और कोंकणी के बीच का विवाद दरअसल जाति, संसाधनों और सत्ता से जुड़े गहरे संघर्षों से जुड़ा है. पुर्तगाली शासन के दौरान मराठी ने हिंदुओं को प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ने में मदद की थी. लेखक और राजनेता विष्णु सूर्य वाघ ने लिखा है कि 20वीं सदी में मराठी ने बहुजन समाज को सामाजिक उन्नति का अवसर दिया, जबकि कोंकणी का इस्तेमाल सारस्वत समुदाय ने अपने सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव को बढ़ाने के लिए किया.

1985 में कोंकणी को गोवा की आधिकारिक भाषा बनाने की मांग को लेकर आंदोलन फिर शुरू हुआ. इसके विरोध में मराठी समर्थकों ने कहा कि कोंकणी कोई अलग भाषा नहीं बल्कि मराठी की एक बोली है. वहीं कोंकणी समर्थकों ने मराठी आंदोलन को महाराष्ट्र के विस्तारवादी एजेंडे का हिस्सा बताया.

भाषा आंदोलन के दौरान हिंसा भी हुई. दिसंबर 1986 में पुलिस फायरिंग में आदिवासी युवक फ्लोरियानो वाज की मौत हो गई. इन आंदोलनों में कुल सात कोंकणी समर्थकों की जान गई. फरवरी 1987 में देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली कोंकणी को गोवा की आधिकारिक भाषा का दर्जा मिला.

गोवा, दमन और दीव आधिकारिक भाषा अधिनियम, 1987 में यह भी प्रावधान किया गया कि मराठी का इस्तेमाल सभी या किसी भी आधिकारिक कार्य के लिए किया जा सकता है. यह फैसला कोंकणी समर्थकों के दो साल लंबे आंदोलन के बाद लिया गया था जिसमें हिंसा और कई लोगों की मौत हुई थी.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व गोवा प्रमुख सुभाष वेलिंगकर ने फिर से मराठी को सह-आधिकारिक भाषा का दर्जा देने की मांग उठाई है. उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर यह मांग पूरी नहीं हुई तो मराठी वोट बैंक BJP के खिलाफ जा सकता है.

2011 की जनगणना के मुताबिक, गोवा में 1.59 लाख लोगों ने मराठी को अपनी मातृभाषा बताया था जबकि 9.64 लाख लोगों ने कोंकणी को मातृभाषा बताया. हालांकि राज्य में मराठी व्यापक रूप से बोली और पढ़ी जाती है. गोवा के कई हिंदू घर में कोंकणी बोलते हैं लेकिन लिखित काम मराठी में करते हैं और मराठी अखबार भी पढ़ते हैं.

कोंकणी और मराठी समर्थक संगठनों की यह लामबंदी BJP सरकार के लिए पुराने दौर की याद दिला रही है. 2016 में भारतीय भाषा सुरक्षा मंच से जुड़े वेलिंगकर ने BJP सरकार के उस फैसले का विरोध किया था, जिसमें अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को अनुदान देने की अनुमति दी गई थी. इनमें आर्चडायोसीज के जरिए संचालित स्कूल भी शामिल थे. यह पहले की उस नीति से अलग था, जिसमें क्षेत्रीय भाषाओं को शिक्षा का माध्यम बनाने को बढ़ावा दिया जाता था.

इसके बाद वेलिंगकर को गोवा BJP अध्यक्ष पद से हटा दिया गया. 2017 के विधानसभा चुनाव में उनकी गोवा सुरक्षा मंच (GSM) ने MGP, शिवसेना और अन्य छोटे दलों के साथ गठबंधन किया. उस चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर और पांच अन्य मंत्री हार गए थे. माना जाता है कि GSM के अभियान ने BJP कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराया, जिससे पार्टी को नुकसान हुआ.

अब वेलिंगकर और उनकी मराठी राजभाषा निर्धार समिति ने मांग की है कि अगली विधानसभा बैठक में सरकार मराठी को कोंकणी के साथ आधिकारिक भाषा का दर्जा देने का प्रस्ताव पारित करे.उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे मराठी और हिंदू वोट बैंक तैयार कर BJP को सत्ता से बाहर कर देंगे.

मराठी समर्थक संगठनों की इस मांग के जवाब में कोंकणी समर्थक संगठनों ने कोंकणी को एकमात्र आधिकारिक भाषा बनाए रखने की मांग दोहराई है. इन संगठनों ने चेतावनी दी है कि जो राजनीतिक दल मराठी को सह-आधिकारिक भाषा बनाने का समर्थन करेंगे, उनका बहिष्कार किया जाएगा. कार्यकर्ताओं का कहना है कि चुनाव के दौरान इस बहस के सांप्रदायिक रूप लेने का भी खतरा है.

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