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शिंदे की शिवसेना में उद्धव के सांसदों की एंट्री से BJP हुई बेचैन!

उद्धव ठाकरे की शिवसेना के छह सांसदों के टूटने के बाद अब सबकी नजर शरद पवार की NCP पर है लेकिन ऐसा लगता नहीं कि BJP एकनाथ शिंदे की पार्टी को एक हद से ज्यादा ताकतवर होने देगी

एकनाथ शिंदे (फाइल फोटो)
एकनाथ शिंदे (फाइल फोटो)
अपडेटेड 24 जून , 2026

22 जून को महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और शिवसेना प्रमुख एकनाथ शिंदे ने कहा, "ऑपरेशन टाइगर सफल रहा है." इस मौके पर शिंदे के साथ वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री रामदास कदम, गजानन कीर्तिकर तथा उद्धव ठाकरे की पार्टी के छह बागी लोकसभा सांसद मौजूद थे.

इन छह सांसदों में संजय उर्फ बंडू जाधव, संजय देशमुख, नागेश पाटिल आष्टीकर, भाऊसाहेब वाकचौरे, ओमराजे निंबालकर और संजय दिना पाटिल शामिल हैं. उद्धव ठाकरे की पार्टी के कुल नौ लोकसभा सांसदों में से इन छह सांसदों ने बगावत कर शिंदे की शिवसेना में शामिल होने का फैसला किया है.

बीते चार साल में शिवसेना में यह दूसरी बड़ी टूट है. जून 2022 में एकनाथ शिंदे ने पार्टी में बगावत कर उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महाविकास अघाड़ी (MVA) सरकार गिरा दी थी. इसके बाद BJP ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया था जबकि देवेंद्र फडणवीस उपमुख्यमंत्री बने थे.

उस समय शिंदे और उनके समर्थकों का कहना था कि उद्धव ठाकरे ने सत्ता के लिए कांग्रेस और NCP जैसी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों से हाथ मिलाकर हिंदुत्व और बाल ठाकरे की विचारधारा से समझौता किया है. हालांकि अब शिंदे के साथ आए सांसदों ने अलग तर्क दिया है. उनका कहना है कि विपक्ष में होने के कारण उनके क्षेत्रों को विकास के लिए पर्याप्त फंड नहीं मिल रहा था. यह तर्क संवैधानिक नैतिकता और राजनीतिक मर्यादा को लेकर नए सवाल खड़े करता है.

अब उद्धव ठाकरे के पास केवल तीन लोकसभा सांसद बचे हैं. इनमें अरविंद सावंत (मुंबई दक्षिण), अनिल देसाई (मुंबई दक्षिण मध्य) और पराग उर्फ राजाभाऊ वाजे (नासिक) हैं. आशंका है कि शिंदे अब शिवसेना (UBT) के 20 विधायकों और बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) के 65 पार्षदों में भी बड़ी सेंध लगा सकते हैं. जिस दिन छह सांसदों ने अलग होने की घोषणा की, उसी दिन उद्धव की तरफ से बुलाई एक अहम बैठक में चार विधायकों की गैरमौजूदगी ने अटकलों को और बढ़ा दिया.

इस दलबदल के बाद महाराष्ट्र से शिंदे गुट के सांसदों की संख्या 13 हो गई है जबकि उसकी सीनियर पार्टनर BJP के केवल 9 सांसद हैं. इससे दोनों दलों के रिश्तों का समीकरण कुछ हद तक बदल गया है और दिल्ली में शिंदे की ताकत बढ़ी है. चर्चा है कि शरद पवार की NCP (SCP) के आठ में से छह सांसद भी शिंदे के संपर्क में हैं लेकिन सूत्रों का कहना है कि BJP शिंदे की पार्टी को एक सीमा से ज्यादा मजबूत नहीं होने देगी.

NCP (SCP) के कुछ नेताओं, जिनमें पश्चिम महाराष्ट्र के एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से जुड़े सांसद भी शामिल हैं. उनके बारे में कहा जा रहा है कि वे स्थानीय स्तर पर BJP के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए शिंदे के करीब जा रहे हैं.

उनका दावा है कि महाराष्ट्र BJP का एक वर्ग चाहता था कि शिंदे का 'ऑपरेशन टाइगर' असफल हो जाए लेकिन पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व के समर्थन के कारण उसे पीछे हटना पड़ा. BJP के कुछ नेता भी मानते हैं कि पार्टी के भीतर चल रही 'शीत युद्ध' जैसी स्थिति के कारण उद्धव गुट में टूट देर से हुई.

शिंदे को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का करीबी माना जाता है. शिवसेना (UBT) के एक वरिष्ठ नेता ने माना कि BJP के भीतर खींचतान की वजह से उनकी पार्टी के सांसदों की पिछले साल ही होने वाली टूट आगे टल गई थी. बताया जाता है कि शिंदे अब भी मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं.

शिवसेना (UBT) के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने आरोप लगाया है कि दलबदल करने वाले नेताओं को भारी रकम दी गई. उन्होंने 'ऑपरेशन तुडवा' के तहत कार्यकर्ताओं के सड़क पर उतरने की बात कही थी लेकिन जमीनी स्तर पर ऐसा कुछ खास नहीं हुआ.

यह उस दौर से बिल्कुल अलग है जब शिवसेना अपने ताकतवर संगठन के दम पर मुंबई और आसपास के इलाकों को ठप कर सकती थी. एक वरिष्ठ राजनेता जो पहले खुद भी शिवसेना छोड़ चुके हैं, कहते हैं, "शिवसेना में पहले जैसी धार नहीं रही. उद्धव ठाकरे संभावित बागियों को खुलकर कह देते हैं कि जाना है तो चले जाओ. इससे पार्टी में भरोसा पैदा नहीं होता."

शिंदे गुट के एक नेता का कहना है कि शिवसेना (UBT) में उथल-पुथल की वजह कार्यकर्ताओं का यह विश्वास खोना है कि उद्धव ठाकरे और उनके बड़े बेटे आदित्य ठाकरे निकट भविष्य में पार्टी को फिर से खड़ा कर पाएंगे. अविभाजित शिवसेना के एक पूर्व छात्र नेता का कहना है कि नेतृत्व तक कार्यकर्ताओं की सीमित पहुंच, उद्धव और आदित्य के आसपास मौजूद गेटकीपर की मौजूदगी टूट की असल वजह है. इन गेटकीपरों का मुंबई से बाहर की राजनीति को ठीक से न समझ पाना और जातीय-सामाजिक समीकरणों को नजरअंदाज करना भी पार्टी की कमजोरी के कारण हैं.

उनके मुताबिक शिवसेना (UBT) कुछ इलाकों तक सिमटने का खतरा झेल रही है. मुंबई में बदलती जनसांख्यिकी भी शिवसेना (UBT) के लिए चुनौती है. पार्टी का पारंपरिक वोट बैंक, यानी मराठी भाषी हिंदू, लगातार घट रहा है. यह बदलाव विडंबना यह है कि पार्टी के लंबे प्रभाव वाले दौर में ही हुआ.

पार्टी को कोंकण क्षेत्र में भी नुकसान हुआ है, जबकि मुंबई में रहने वाले बड़ी संख्या में मराठी लोग इसी क्षेत्र से आते हैं. BMC चुनावों में शिवसेना (UBT) को सिर्फ 65 सीटें मिलीं जबकि उद्धव ठाकरे ने अपने चचेरे भाई और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) प्रमुख राज ठाकरे से भी समझौता कर लिया था.

इसके बावजूद ठाकरे बंधुओं का गठबंधन महंगे आवास, मराठी लोगों के लिए घर और नौकरियों में अवसरों की कमी तथा कुछ लोगों के अनुसार गैर-मराठी व्यापारी समुदायों, खासकर जैन समुदाय, के बढ़ते सांस्कृतिक और खान-पान संबंधी प्रभाव जैसे मुद्दों पर सड़क पर उतरता नहीं दिखा.

BJP ने अपनी नेता ऋतु तावड़े को मुंबई का महापौर बनवाने में सफलता हासिल की. अगर शिंदे BMC में भी शिवसेना (UBT) को तोड़ने में सफल होते हैं तो उनकी पार्टी बाकी बचे ढाई साल के कार्यकाल के लिए महापौर पद पर दावा कर सकती है.

एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता का कहना है कि शिवसेना (UBT) इस वजह से भी घिरी हुई है कि बड़ी संख्या में मराठी मतदाता अब भाषाई पहचान के बजाय धार्मिक आधार पर वोट कर रहे हैं. इसका असर यह हुआ कि BJP और शिंदे से अलग हुई शिवसेना (UBT) को हिंदुत्व समर्थक मराठी वोटों का बड़ा हिस्सा गंवाना पड़ा.

दिलचस्प बात यह है कि आज शिवसेना (UBT) के कई विधायक मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन से चुने गए हैं, जबकि कभी यही समुदाय पार्टी का सबसे बड़ा राजनीतिक विरोधी माना जाता था. जैसे-जैसे शिवसेना (UBT) मुंबई और महाराष्ट्र के कुछ इलाकों तक सीमित होती जा रही है कांग्रेस अपने लिए नए अवसर देख रही है.

राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि अगर जरूरत पड़ी तो BJP शिंदे गुट को भी तोड़ने से नहीं हिचकेगी, क्योंकि पार्टी के एक बड़े वर्ग की निष्ठा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के साथ है. महेश शिंदे (कोरेगांव), निलेश राणे (कुडाल) और मुरजी पटेल (अंधेरी ईस्ट) जैसे कुछ BJP नेता शिवसेना के टिकट पर चुनाव जीत चुके हैं.
 

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