इसी साल जुलाई में झारखंड के धनबाद जिले में 800 बोतल से ज्यादा शराब पीने का आरोप चूहों पर लगा था. हालांकि बाद में यह आरोप खारिज हो गया. अब नया मामला सामने आया है, जिसमें फिर से चूहों पर आरोप लगा है. नया आरोप एक करोड़ रुपए कीमत की 200 किलो गांजा को खाने का है. यह बात किसी और ने नहीं, बल्कि खुद झारखंड पुलिस ने कोर्ट में कही है.
दरअसल साल 2022 में 17 जनवरी को रांची में 200 किलो गांजा बरामद किया गया था. एनडीपीएस एक्ट के तहत केस दर्ज हुए. आरोपी इंद्रजीत राय बिहार के वैशाली जिला के वीरपुर गांव का रहनेवाला था. जांच के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की, लेकिन मुकदमे की सुनवाई के दौरान पुलिस की कहानी सवालों के घेरे में आ गई. गवाहों के बयानों में समय, स्थान और घटनाक्रम को लेकर भारी विरोधाभास सामने आया. कोई यह स्पष्ट नहीं कर सका कि आरोपी को किसने पकड़ा, गाड़ी कहां रोकी गई या तलाशी कितनी देर चली.
सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया, जब अदालत को बताया गया कि ओरमांझी थाना के मालखाना में सुरक्षित रखा गया जब्त गांजा चूहे खा गए. इस संबंध में वर्ष 2024 में पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया. अदालत ने इस दावे को गंभीर लापरवाही मानते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ा सवाल उठाया और फैसले में अदालत ने कहा कि न तो आरोपी को वाहन से जोड़ने के ठोस सबूत पेश किए गए, न ही जब्ती और सैंपलिंग की प्रक्रिया पर भरोसा किया जा सकता है. वाहन के इंजन और चेसिस नंबर तक स्पष्ट नहीं थे, जिससे जांच की विश्वसनीयता कमजोर हो गई. आखिरकार अदालत ने 19 दिसंबर को आरोपी को बरी कर दिया.
यह मामला रांची जिले के ओरमांझी थाना का है. आरोपियों के बरी होने के बाद जब पत्रकारों ने थाने के तत्कालीन थाना प्रभारी आलोक सिंह से चूहों के गांजा खाने का हवाला देकर जब्त माल गायब होने के बारे में पूछा तो उनका कहना था कि उन्हें याद नहीं है कि गिरफ्तारी के दौरान बड़ी मात्रा में मादक पदार्थ बरामद किए गए थे. वहीं वर्तमान थाना प्रभारी राकेश रंजन का कहना है कि इस मामले में उनके पास भी कुछ जानकारी नहीं है.
चूहा पैटर्न क्यों फॉलो करती है झारखंड पुलिस
यह कोई पहल घटना नहीं है, जब लापरवाही या फिर जानबूझकर की गई लापरवाही का ठीकरा चूहों पर फोड़ा गया हो. इससे पहले पिछले साल यानी अप्रैल 2024 में धनबाद में एक ऐसा ही मामला सामने आया था. इसमें राजगंज थाना में जमा 10 किलोग्राम भांग और 9 किलोग्राम गांजा नष्ट होने के पीछे चूहों को जिम्मेदार ठहराया गया था. ऐसे में सवाल ये है कि आखिर झारखंड पुलिस हर बार चूहों को आरोपी क्यों बना कर कैसे बच जा रही है. जांच में न तो कोई पुलिसकर्मी सस्पेंड होता है, न किसी तरह की कार्रवाई होती है.
झारखंड पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि, जब नशीले ड्रग्स की जब्ती होती है तो उसे रखने या फिर नष्ट करने की एक कानूनी प्रक्रिया है. जब्ती के बाद उसे खास पैकेटों में पैक कर मालखाने में सुरक्षित रखा जाता है. कई बार उसे कोर्ट की अनुमति लेकर सरकार को भी सौंप दिया जाता है ताकि सरकार उसका इस्तेमाल दवाई बनाने में कर सके. लेकिन जब जब्त माल लंबे समय तक मालखाने में रखा रहता है तो खासकर अफीम के गुणों का असर कम होने लगता है. आप कह सकते हैं कि एक साल के बाद वह केवल एक सूखा पत्ता भर रह जाता है. ऐसे में फिर कोर्ट से अनुमति लेकर उसे जला दिया जाता है.
इन्हीं अधिकारी के मुताबिक जब ड्रग्स को मालखाने में रखा जाता है, तब उसका प्रभार किसी को दिया जाता है. यानी मालखाने का प्रभारी. अगर उसका तबादला होता है और दूसरे अधिकारी थाने में आते हैं, तो उन्हें पूरी सूची के साथ मालखाने का प्रभार सौंपा जाता है. इन सब के बीच जब्त माल के गायब होने की घटनाएं हो सकती हैं लेकिन खास बात यह है कि चूहा गांजा नहीं खाता है. वह शराब भी नहीं पीता. चूहे पर ऐसे आरोप मढ़ देना बेतुकी बात है.
रांची के पशु चिकित्सक डॉ विश्वरंजन भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि चूहे मादक पदार्थ न तो खाते हैं न ही पीते हैं. वे कहते हैं, "चूहा गांजा कुतर सकता है, लेकिन तभी तक कि जब तक उसका कोई कण उसके पेट में न चला जाए. जैसे ही जाएगा वह तत्काल बेहोश हो जाएगा.” वहीं दूसरे पशु चिकित्सक डॉ विशाल कहते हैं कि इंसानों के लिए जितने भी मेडिसिन बनाए जाते हैं, वे अधिकतर पहले चूहों पर इस्तेमाल होते हैं. ऐसे में चूहों का गांजा कुतरना भी लगभग नामुमिकन सा है. क्योंकि जब भी वह कुतरेगा, उसके दांत में उसके कण लगेंगे और फिर वे जीभ से लगकर पेट में चले जाएंगे. ऐसे में चूहों के बेहोश होने से ज्यादा मरने की संभावना ज्यादा है.” डॉ विशाल का कहना है कि कोर्ट को ऐसे मामलों में किसी पशु चिकित्सक की सलाह लेकर मामले की तह तक जाने के लिए पुलिस को आदेश देना चाहिए.
एक और पुलिस अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि ऐसी घटनाओं के पीछे पुलिस में मैनपावर की कमी जिम्मेदार है. झारखंड के हरेक थाने में 500 से अधिक केस लंबित हैं. वहां 20 पुलिसकर्मी काम कर रहे हैं. ऐसे में एक-एक पुलिसकर्मी पर 25 से 30 केस की जांच का बोझ रहता है. केवल जांच करना हो तब तो कोई मुश्किल काम नहीं. इन पुलिसकर्मियों को पूरे इलाके की सुरक्षा-व्यवस्था, घटना-दुर्घटना आदि से जुड़े काम में भी व्यस्त रहना पड़ता है. ऐसे में कई बार पुलिसकर्मी जब्त माल की निगरानी में लापरवाही बरतते हैं. यही पुलिस अधिकारी आशंका जताते हैं कि पुलिकर्मियों ने मिलकर उस गांजे को या फिर जब्त मादक पदार्थ को कहीं बेच दिया होगा.
बहरहाल झारखंड पुलिस के लिए ऐसे मामलों में बच निकलने के लिए चूहे सबसे सुरक्षित हथियार साबित हो रहे हैं.

